सुप्रीम कोर्ट ने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न को महिलाओं की समानता, गरिमा के साथ जीने और किसी भी पेशे को अपनाने के उनके मौलिक अधिकारों का अपमान बताया है। शीर्ष अदालत ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के एक आदेश को बरकरार रखते हुए ये टिप्पणियां कीं जिसने एक बैंक की महिला कर्मचारी के तबादला आदेश को रद्द कर दिया था। महिला ने अपने वरिष्ठ अधिकारी पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे।
न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़़ और न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी की पीठ ने कहा कि कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न अधिनियम, 2013 कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न से बचाव के अलावा ऐसी शिकायतों के निपटान के लिए लागू किया गया था।
पीठ ने 25 फरवरी को दिए अपने आदेश में कहा, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 15 के तहत समानता के महिलाओं के मौलिक अधिकार और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त गरिमापूर्ण जीवन जीने के उसके अधिकार तथा किसी भी पेशे, व्यापार या कारोबार को अपनाने के अधिकार का अपमान है।
पीठ ने कहा कि उसके सामने रखा गया मामला दिखाता है कि महिला अधिकारी ने बैंक की इंदौर शाखा में अपनी तैनाती के दौरान अधिकारियों को कई बार पत्र लिखकर शराब ठेकेदारों के खातों के प्रबंधन में गड़बड़ी की तरफ ध्यान खींचा था और भ्रष्टाचार के खास आरोप लगाए थे।
पीठ ने कहा, इसमें कोई संदेह नहीं है कि प्रतिवादी (महिला अधिकारी) को प्रताड़ित किया गया है। शाखा में अनियमितता की उनकी रिपोर्ट पर बदला लिया गया है। उनका स्थानांतरण कर दिया गया और ऐसी शाखा में भेजा गया जिसमें स्केल-1 के अधिकारी को जगह मिलनी चाहिए थी।