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एक्सप्लेनर: क्या है मीर जाफर के विश्वासघात की कहानी, देश की सियासत में क्यों गद्दारी की पर्याय बन गया ये नाम?

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: रिया दुबे Updated Sun, 11 Oct 2026 11:32 AM IST

सार

एक ऐसा सेनापति, जिसने अपने ही नवाब का साथ छोड़ दिया। सत्ता की चाह में अंग्रेजों से हाथ मिलाया और 1757 की प्लासी की लड़ाई में इतिहास बदलने वाली भूमिका निभाई। आखिर मीर जाफर ने ऐसा क्या किया कि उनका नाम सदियों बाद भी गद्दारी का प्रतीक बना हुआ है? आइए जानते हैं।
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मीर जाफर - फोटो : lacma.org

भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और सांसद संबित पात्रा ने स्टारलिंक को लेकर विपक्षी नेताओं के बयानों पर निशाना साधते हुए इसे 'मोदी बनाम मीर जाफर' की लड़ाई बताया है। पात्रा ने आरोप लगाया कि विपक्षी नेता सत्ता के लिए देश को गिरवी रखने तक को तैयार हैं। उन्होंने कहा कि ये नेता बिना चुनाव लड़े और बिना जीत हासिल किए प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं। भारतीय इतिहास में मीर जाफर का नाम विश्वासघात के प्रतीक के तौर पर लिया जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर वह कौन थे और उनका इतिहास क्या है?

मीर जाफर आखिर थे कौन?

मीर जाफर का पूरा नाम सैयद मीर मोहम्मद जाफर अली खान था। वह सैयद अहमद नजाफी के दूसरे बेटे थे। भारत में उन्हें 'गद्दार-ए-हिंद' के नाम से भी जाना जाता है। वह सिराजुद्दौला के बाद बंगाल के नवाब बने। उन्हें नजाफी वंश का पहला नवाब भी माना जाता है। उनका शासन भारत में ब्रिटिश सत्ता के विस्तार का एक अहम पड़ाव साबित हुआ।

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मीर जाफर - फोटो : lacma.org
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और सांसद संबित पात्रा ने स्टारलिंक को लेकर विपक्षी नेताओं के बयानों पर निशाना साधते हुए इसे 'मोदी बनाम मीर जाफर' की लड़ाई बताया है। पात्रा ने आरोप लगाया कि विपक्षी नेता सत्ता के लिए देश को गिरवी रखने तक को तैयार हैं। उन्होंने कहा कि ये नेता बिना चुनाव लड़े और बिना जीत हासिल किए प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं। भारतीय इतिहास में मीर जाफर का नाम विश्वासघात के प्रतीक के तौर पर लिया जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर वह कौन थे और उनका इतिहास क्या है?

मीर जाफर आखिर थे कौन?

मीर जाफर का पूरा नाम सैयद मीर मोहम्मद जाफर अली खान था। वह सैयद अहमद नजाफी के दूसरे बेटे थे। भारत में उन्हें 'गद्दार-ए-हिंद' के नाम से भी जाना जाता है। वह सिराजुद्दौला के बाद बंगाल के नवाब बने। उन्हें नजाफी वंश का पहला नवाब भी माना जाता है। उनका शासन भारत में ब्रिटिश सत्ता के विस्तार का एक अहम पड़ाव साबित हुआ।

मीर जाफर ने कैसे दिया था रॉबर्ट क्लाइव का साथ? - फोटो : NCERT

मीर जाफर की कहानी कहां से शुरू हुई?

मीर जाफर ने नवाब की सेना में नौकरी शुरू की और धीरे-धीरे तरक्की की। नवाब अलीवर्दी खान ने अपनी सौतेली बहन शाह खानम का विवाह उनसे कराया और उन्हें 7,000 घोड़ों की कमान सौंपी। उनका शुरुआती सैन्य करियर अच्छा रहा। उन्होंने कटक में मिर्जा बाकिर के कब्जे से अलीवर्दी खान के भतीजे सौकत जंग को छुड़ाने में मदद की। उन्होंने मराठों के खिलाफ अलीवर्दी खान के सैन्य अभियानों और मुर्शिद कुली खान के पोते के खिलाफ अभियान में भी अहम भूमिका निभाई।

हालांकि, मीर जाफर महत्वाकांक्षी थे और सत्ता हासिल करना चाहते थे। उन पर राजमहल के फौजदार अताउल्लाह के साथ मिलकर अलीवर्दी खान की हत्या की साजिश रचने का आरोप लगा था। साजिश का खुलासा होने के बाद उनकी अधिकांश शक्तियां छीन ली गईं। बाद में वह मुर्शिदाबाद लौट आए और सिराजुद्दौला का विश्वास जीतने में सफल रहे।

सिराजुद्दौला का विरोध - फोटो : NCERT

सिराजुद्दौला और अंग्रेजों के बीच क्यों बढ़ा टकराव?

एनसीईआरटी की कक्षा आठवीं की इतिहास की किताब के मुताबिक, 18वीं सदी में बंगाल मुगल साम्राज्य का एक समृद्ध प्रांत था। 1756 में अलीवर्दी खान की मृत्यु के बाद सिराजुद्दौला बंगाल के नवाब बने। उनके नवाब बनने के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी उनकी ताकत से चिंतित थी। कंपनी ऐसा शासक चाहती थी, जो उसे व्यापार में छूट और दूसरी सुविधाएं देने के लिए तैयार हो। सिराजुद्दौला के दरबार में कई प्रभावशाली लोग उनसे नाराज थे। मीर जाफर भी सिराजुद्दौला से असंतुष्ट थे और खुद बंगाल का नवाब बनना चाहते थे। इसी राजनीतिक असंतोष का फायदा ईस्ट इंडिया कंपनी ने उठाया और सिराजुद्दौला के खिलाफ दरबार के असंतुष्ट लोगों से संपर्क किया।

सिराजुद्दौला ने कंपनी से अपने राज्य के राजनीतिक मामलों में दखल देना बंद करने, किलेबंदी रोकने और राजस्व चुकाने को कहा। बातचीत विफल होने के बाद नवाब ने करीब 30 हजार सैनिकों के साथ कासिमबाजार स्थित अंग्रेजी फैक्ट्री पर हमला किया। उन्होंने कंपनी के अधिकारियों को पकड़ लिया, गोदाम बंद कर दिया, अंग्रेजों को निहत्था कर दिया और अंग्रेजी जहाजों की आवाजाही रोक दी। इसके बाद वह कलकत्ता में कंपनी के किले पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए आगे बढ़े।

कलकत्ता पर कब्जे की खबर मिलने के बाद मद्रास में मौजूद कंपनी के अधिकारियों ने रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में सेना भेजी। इस सेना को नौसैनिक बेड़े की मदद भी मिली। नवाब और कंपनी के बीच लंबे समय तक बातचीत चली, लेकिन अंततः 1757 में दोनों के बीच प्लासी की लड़ाई हुई।

प्लासी की लड़ाई में मीर जाफर ने क्या किया?

23 जून 1757 को बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला और ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना के बीच प्लासी की लड़ाई हुई। इस युद्ध में मीर जाफर ने अंग्रेजों के साथ समझौता कर लिया था। सिराजुद्दौला की हार की एक प्रमुख वजह यह थी कि मीर जाफर के नेतृत्व वाली सेना ने युद्ध में हिस्सा नहीं लिया। रॉबर्ट क्लाइव ने सिराजुद्दौला को हराने के बाद मीर जाफर को बंगाल का नवाब बनाने का वादा किया था, जिसके बदले उन्हें मीर जाफर का समर्थन मिला।

सत्ता हासिल करने की महत्वाकांक्षा में मीर जाफर ने सिराजुद्दौला का साथ छोड़ दिया। उनकी सेना के युद्ध से दूर रहने के कारण नवाब की स्थिति कमजोर हुई और ईस्ट इंडिया कंपनी को जीत हासिल करने का मौका मिला। प्लासी की लड़ाई कंपनी के इतिहास में एक अहम मोड़ साबित हुई, क्योंकि भारत में यह उसकी पहली बड़ी सैन्य जीत थी। युद्ध में सिराजुद्दौला की हार के बाद उनकी हत्या कर दी गई और मीर जाफर को बंगाल का नवाब बना दिया गया।

प्लासी की लड़ाई - फोटो : npg.org

नवाब बनने के बाद मीर जाफर को क्यों हटाया गया?

सिराजुद्दौला को हराने के बाद कंपनी का उद्देश्य सीधे शासन संभालना नहीं, बल्कि स्थानीय शासकों के जरिए व्यापारिक सुविधाएं और विशेषाधिकार हासिल करना था। कंपनी को लगा कि इस तरीके से उसे सीधे क्षेत्रों पर कब्जा किए बिना अपने हित पूरे करने का मौका मिलेगा।

लेकिन स्थानीय नवाब हमेशा कंपनी की सभी मांगें पूरी करने को तैयार नहीं रहते थे। उन्हें अपनी प्रजा के बीच सम्मान बनाए रखने के लिए अपनी सत्ता और प्रतिष्ठा भी कायम रखनी पड़ती थी। जब मीर जाफर ने कंपनी की मांगों पर आपत्ति जताई, तो उन्हें सत्ता से हटा दिया गया और उनकी जगह मीर कासिम को नवाब बनाया गया।

मीर कासिम ने भी कंपनी की मांगों का विरोध किया। 1764 में बक्सर की लड़ाई में उनकी हार हुई और उन्हें बंगाल से बाहर कर दिया गया। इसके बाद मीर जाफर को दोबारा नवाब बनाया गया। नवाब को कंपनी को हर महीने पांच लाख रुपये देने पड़ते थे। इसके बावजूद कंपनी को युद्धों, व्यापार और अन्य खर्चों के लिए और अधिक धन चाहिए था। उसकी नजर अधिक क्षेत्रों और राजस्व पर थी।

कैसे कंपनी व्यापार से शासन तक पहुंची?

प्लासी की लड़ाई के बाद बंगाल के नवाबों को कंपनी के अधिकारियों को जमीन और बड़ी रकम व्यक्तिगत उपहार के रूप में देनी पड़ती थी। कंपनी के अधिकारियों ने भारत में काफी संपत्ति भी जुटाई। इसी दौरान कंपनी की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को इंग्लैंड में संदेह की नजर से देखा जाने लगा।

7 जनवरी 1759 को रॉबर्ट क्लाइव ने इंग्लैंड के प्रमुख सचिवों में से एक विलियम पिट को कलकत्ता से पत्र लिखा। क्लाइव ने पत्र में कहा कि इतनी बड़ी संप्रभुता किसी व्यापारिक कंपनी के लिए बहुत बड़ा विषय हो सकती है। उन्होंने तीन समृद्ध प्रांतों पर अधिकार और सालाना 20 लाख पाउंड की आय की संभावना का उल्लेख करते हुए इस विषय पर विचार करने को कहा।

1765 में मीर जाफर की मृत्यु के बाद कंपनी की नीति और स्पष्ट हो गई। रॉबर्ट क्लाइव ने कहा कि कंपनी को खुद नवाब बन जाना चाहिए। इसी वर्ष मुगल सम्राट ने कंपनी को बंगाल का दीवान नियुक्त किया। दीवानी मिलने से कंपनी को बंगाल के राजस्व का इस्तेमाल करने का अधिकार मिल गया।

इससे कंपनी की एक बड़ी आर्थिक समस्या हल हो गई। अठारहवीं सदी की शुरुआत से भारत के साथ उसका व्यापार बढ़ रहा था, लेकिन भारत में सामान खरीदने के लिए उसे ब्रिटेन से सोना और चांदी लाना पड़ता था, क्योंकि उस समय ब्रिटेन के पास भारत में बेचने के लिए पर्याप्त सामान नहीं था। प्लासी की लड़ाई के बाद ब्रिटेन से सोने के बाहर जाने की मात्रा कम हुई और दीवानी मिलने के बाद यह पूरी तरह रुक गई। अब कंपनी भारत से मिलने वाले राजस्व से यहीं सूती और रेशमी कपड़े खरीद सकती थी, अपनी सेना का खर्च उठा सकती थी और कलकत्ता में किले व कार्यालय बनाने का खर्च पूरा कर सकती थी।

अंग्रेजी कंपनी के खिलाफ नवाबों की शिकायत क्या थी?

एनसीईआरटी की किताब में 1733 में बंगाल के नवाब की ओर से अंग्रेज व्यापारियों के बारे में की गई शिकायत का भी उल्लेख है। नवाब के मुताबिक, जब अंग्रेज पहली बार देश में आए थे, तब उन्होंने विनम्रता से फैक्ट्री बनाने के लिए जमीन मांगी थी। अनुमति मिलने के बाद उन्होंने मजबूत किला बना लिया, उसके चारों ओर खाई खोदी, नदी से उसका संपर्क बनाया और दीवारों पर बड़ी संख्या में तोपें लगा दीं।

शिकायत में कहा गया कि अंग्रेजों ने कई व्यापारियों और दूसरे लोगों को अपनी शरण में आने के लिए प्रोत्साहित किया। वे राजस्व वसूलने लगे और नवाब के राज्य के लोगों को लूटने, उनका सामान छीनने तथा स्त्री-पुरुषों को पकड़कर अपने देश में गुलामी के लिए ले जाने के आरोपों का भी सामना कर रहे थे।

रॉबर्ट क्लाइव ने भारत में कितनी दौलत कमाई?

रॉबर्ट क्लाइव 1743 में 18 साल की उम्र में इंग्लैंड से मद्रास आया था। जब वह 1767 में भारत से लौटा, तब उसकी भारत में कमाई गई संपत्ति का मूल्य 4,01,102 पाउंड था। 1764 में बंगाल का गवर्नर नियुक्त किए जाने पर उसे कंपनी के प्रशासन में भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए कहा गया था। लेकिन उसकी अपनी संपत्ति भी सवालों के घेरे में आ गई।

1772 में ब्रिटिश संसद ने उसकी बड़ी दौलत को लेकर उससे पूछताछ की। हालांकि, उसे आरोपों से बरी कर दिया गया, लेकिन 1774 में उसने आत्महत्या कर ली।

कंपनी के सभी अधिकारी क्लाइव की तरह अमीर नहीं बन पाए। कई अधिकारियों की भारत में बीमारी और युद्ध के कारण जल्दी मृत्यु हो गई। उनमें से कई साधारण पृष्ठभूमि से आए थे और भारत में पर्याप्त पैसा कमाकर ब्रिटेन लौटना चाहते थे, ताकि वहां आरामदायक जीवन जी सकें। जो अधिकारी भारत से धन लेकर ब्रिटेन लौटे और अपनी दौलत का दिखावा करने लगे, उन्हें ‘नबॉब’ कहा जाने लगा। यह शब्द भारतीय शब्द 'नवाब' से बना था।

नमक हराम ड्योढ़ी - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

क्या है मीर जाफर की नमक हराम ड्योढ़ी?

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद के लालबाग इलाके में एक हवेली है, जिसे मीर जाफर की हवेली माना जाता है। इसे नमक हराम ड्योढ़ी कहा जाता है। इस नाम को मीर जाफर के विश्वासघात से जोड़ा जाता है।

बताया जाता है कि मीर जाफर की इसी हवेली में उनके बेटे मीर मीरन ने सिराजुद्दौला की हत्या का आदेश दिया था। प्रचलित विवरणों के मुताबिक, जुलाई 1757 में सिराजुद्दौला को इसी 'नमक हराम ड्योढ़ी' में फांसी पर लटकाया गया था। अगले दिन उनके शव को हाथी पर रखकर पूरे मुर्शिदाबाद में घुमाया गया था।

मीर जाफर को क्यों कहा जाता है गद्दार?

मीर जाफर को गद्दार कहे जाने की वजह यह है कि उन्होंने सत्ता के लालच में सिराजुद्दौला का साथ छोड़कर अंग्रेजों से हाथ मिला लिया। 1757 की प्लासी की लड़ाई में उनकी भूमिका ने ईस्ट इंडिया कंपनी की जीत का रास्ता आसान किया। इस जीत के बाद अंग्रेजों को बंगाल में अपनी राजनीतिक और आर्थिक पकड़ मजबूत करने का मौका मिला, जिसने भारत में उनके शासन के विस्तार की नींव रखी। आगे चलकर अंग्रेजों ने करीब 200 साल तक भारत पर शासन किया।
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