कावेरी नदी के पानी को लेकर तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच दशकों से विवाद चलता आ रहा है। अब इसी नदी पर प्रस्तावित मेकेदातु बांध परियोजना को लेकर दोनों राज्यों के बीच नया विवाद खड़ा हो गया है। कर्नाटक इस परियोजना को जल्द शुरू करना चाहता है, जबकि तमिलनाडु इसका लगातार विरोध कर रहा है। तमिलनाडु का कहना है कि इस बांध से राज्य को मिलने वाले कावेरी के पानी पर असर पड़ेगा और किसानों को नुकसान होगा।
क्या है मेकेदातु परियोजना?
मेकेदातु का अर्थ है 'बकरी की छलांग'। यह कावेरी और अर्कावती नदियों के संगम पर स्थित एक गहरी घाटी है। यह जगह कर्नाटक के रामनगर जिले के कनकपुरा तालुक में है और बंगलूरू से करीब 100 किलोमीटर दूर स्थित है। कर्नाटक सरकार ने वर्ष 2013 में यहां बहुउद्देश्यीय जलाशय बनाने की योजना पेश की थी। शुरुआत में इसकी अनुमानित लागत करीब 5,912 करोड़ रुपये थी, जो बाद में बढ़कर लगभग 9,000 करोड़ रुपये हो गई। इस परियोजना के तहत करीब 67.16 टीएमसी (हजार मिलियन घन फुट) पानी संग्रह करने की क्षमता वाला जलाशय बनाया जाना प्रस्तावित है।
परियोजना का उद्देश्य क्या है?
कर्नाटक सरकार का कहना है कि इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य बंगलूरू, रामनगर और आसपास के इलाकों में बढ़ती आबादी के लिए पेयजल उपलब्ध कराना है। इसके अलावा इस परियोजना से 400 मेगावाट बिजली भी पैदा की जाएगी। सरकार का दावा है कि इसमें सिंचाई की कोई नई योजना शामिल नहीं है और तमिलनाडु को उसके हिस्से का पानी देने के बाद ही अतिरिक्त पानी संग्रह किया जाएगा।
बांध पर क्यों है विवाद?
इस विवाद को सुलझाने के लिए कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने पानी के बंटवारे का फैसला दिया था। तमिलनाडु का कहना है कि यदि कर्नाटक मेकेदातु बांध बनाता है, तो वह पानी रोक सकता है, जिससे राज्य के कावेरी डेल्टा में खेती प्रभावित होगी। वहीं कर्नाटक का कहना है कि वह तमिलनाडु के हिस्से का पानी नहीं रोकेगा।
तमिलनाडु क्यों कर रहा है विरोध?
तमिलनाडु का मानना है कि मेकेदातु बांध बनने से कावेरी नदी का प्राकृतिक प्रवाह प्रभावित होगा। इससे राज्य के किसानों के लिए उपलब्ध पानी कम हो सकता है और सिंचाई पर असर पड़ेगा। तमिलनाडु का यह भी कहना है कि यह परियोजना कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण के अंतिम फैसले की भावना के खिलाफ है। न्यायाधिकरण ने दोनों राज्यों के बीच पानी के बंटवारे का स्पष्ट फार्मूला तय किया था। पूर्व मुख्यमंत्री जे. जयललिता ने 2013 में तत्कालीन प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर इस परियोजना को मंजूरी नहीं देने की मांग की थी। उनका तर्क था कि कोई भी ऊपरी धारा वाला राज्य, निचली धारा वाले राज्य की सहमति के बिना अंतरराज्यीय नदी पर ऐसा निर्माण नहीं कर सकता।
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला
तमिलनाडु सरकार ने 2013 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर मेकेदातु और शिवनासमुद्र परियोजनाओं पर रोक लगाने की मांग की थी। राज्य का कहना था कि इन परियोजनाओं का निर्माण केंद्र सरकार की एजेंसी के माध्यम से और सभी राज्यों की सहमति से होना चाहिए।
विवाद पर नई राजनीति?
अब तमिलनाडु की विपक्षी पार्टी पीएमके (पट्टाली मक्कल काची) ने राज्य सरकार से इस मुद्दे पर तुरंत सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की है। पार्टी का कहना है कि कर्नाटक तेजी से बांध परियोजना को आगे बढ़ा रहा है, जबकि तमिलनाडु सरकार प्रभावी कदम नहीं उठा रही है। इससे कावेरी डेल्टा के किसानों में चिंता बढ़ गई है।
पीएमके नेता ने क्या कहा?
नए ट्रिब्यूनल की मांग पर किसानों की आपत्ति
हाल ही में तमिलनाडु विधानसभा ने मेकेदातु विवाद के समाधान के लिए नया ट्रिब्यूनल बनाने की मांग वाला प्रस्ताव पारित किया था। अंबुमणि रामदास का कहना है कि किसान इस प्रस्ताव से सहमत नहीं हैं। उनका मानना है कि नया ट्रिब्यूनल बनाने से मामला और लंबा खिंच सकता है और इससे कर्नाटक को फायदा मिल सकता है।