राज्यसभा सदस्य राघव चड्ढा ने शुक्रवार को सियासी हलकों में खलबली मचा दी। उन्होंने आम आदमी पार्टी के दो और राज्यसभा सदस्यों के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस की और संवैधानिक प्रावधानों का हवाला देते हुए आप के दो तिहाई सांसदों के भाजपा में विलय का एलान कर दिया। यह वही चड्ढा हैं, जिन्हें आम आदमी पार्टी ने कुछ ही दिन पहले राज्यसभा में उप नेता के पद से हटाया था। आप ने चड्ढा पर सरकार के खिलाफ मुद्दे न उठाने और 'सॉफ्ट PR' करने का आरोप लगाया था। दिलचस्प बात यह है कि उनकी जगह उप नेता बनाए गए अशोक मित्तल भी आज उनके साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद थे। मित्तल वही सांसद हैं, जिनके खिलाफ हाल ही में प्रवर्तन निदेशालय ने छापे की कार्रवाई थी।
आम आदमी पार्टी के पास राज्यसभा में कितने सांसद हैं और दो-तिहाई का गणित क्या है?
- AAP के वर्तमान में राज्यसभा में 10 सदस्य हैं।
- सात सदस्य पंजाब से
- तीन सदस्य दिल्ली से
दल-बदल विरोधी कानून के तहत किसी दल के संसदीय दल के विलय के लिए कम से कम दो-तिहाई सदस्यों का साथ होना जरूरी है। 10 सदस्यों के दो-तिहाई यानी कम से कम सात सदस्यों को विलय के पक्ष में होना होगा। तभी यह विलय कानूनी रूप से वैध माना जाएगा और किसी की सदस्यता नहीं जाएगी। चड्ढा ने दावा किया है कि राज्यसभा में AAP के दो-तिहाई सदस्य उनके साथ हैं। उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में आए संदीप पाठक, अशोक मित्तल के अलावा चार अन्य सांसदों के भी अपने साथ होने का दावा किया। इनमें पंजाब से राज्यसभा सांसद हरभजन सिंह, विक्रजीत सिंह साहनी और राजेंद्र गुप्ता के अलावा दिल्ली से आप की राज्यसभा सांसद स्वाती मालिवाल के नाम शामिल हैं।
दल-बदल विरोधी कानून क्या है और आया राम गया राम की कहानी क्या है?
इस कानून को समझने के लिए पहले 1967 की एक कहानी जाननी होगी। हरियाणा के विधायक गया लाल ने एक ही दिन में तीन बार पार्टी बदली और भारतीय राजनीति को एक नया और कड़वा मुहावरा मिला- "आया राम गया राम।" यह बेलगाम दल-बदल लोकतंत्र के लिए खतरा बन गया। इसी को रोकने के लिए 1985 में संविधान में 10वीं अनुसूची जोड़ी गई, जिसे दल-बदल विरोधी कानून कहते हैं। यह कानून उन राजनीतिक दल-बदलों को रोकने के लिए लाया गया जो पद या अन्य लाभ के लालच में होते थे। यह कानून संसद और राज्य विधानसभाओं, दोनों पर समान रूप से लागू होता है। कानून के तहत कोई विधायक या सांसद अयोग्य माना जाएगा अगर वह स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ दे या पार्टी नेतृत्व के निर्देशों की अवज्ञा करे यानी किसी मतदान में पार्टी व्हिप का उल्लंघन करे, चाहे वह वोटिंग से अनुपस्थित रहे या विरोध में वोट करे। अयोग्यता का फैसला सदन के पीठासीन अधिकारी करते हैं।
क्या दल-बदल विरोधी कानून में कोई अपवाद है?
1985 के दल-बदल कानून आने के बाद भी बड़े पैमाने पर दल-बदल होता रहा। 1990 दशक में ऐसे कई ऐसी सरकारें आईं। उत्तर प्रदेश में तो दल-बदल करके ऐसी सरकारें बनीं जिनमें 90 से अधिक विधायक मंत्री बना दिए गए। इसके बाद दल-बदल कानून को और सख्त किया गया। इसमें यह शर्त जोड़ी गई कि किसी पार्टी के संसदीय दल को दूसरी पार्टी में विलय की इजाजत तभी होगी जब उसके कम से कम दो-तिहाई विधायक या सांसद विलय के पक्ष में हों। ऐसा होने पर संसदीय दल का विलय करने वाले सदस्यों पर दल-बदल कानून नहीं लगता है और वो अयोग्यता से बच जाते हैं। राघव चड्ढा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में संविधान के इसी प्रावधान का हवाला देते हुए भाजपा में विलय का एलान किया।
राघव चड्ढा की आप में क्या भूमिका थी?
राघव चड्ढा 37 साल के हैं। वे आप के सबसे प्रमुख चेहरों में से एक रहे हैं। वे पार्टी की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था पॉलिटिकल अफेयर्स कमेटी के सदस्य हैं और पार्टी के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष भी रह चुके हैं। वे पहले दिल्ली से विधायक थे, फिर उन्हें राज्यसभा भेजा गया। वे सदन के सबसे युवा सदस्यों में से एक बने। वे विपक्षी INDIA गठबंधन के समन्वय में भी अहम भूमिका निभाते रहे और पंजाब के सह-प्रभारी भी थे। जब पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार बनी तो अक्सर दावा किया गया कि राघव पंजाब के सुपर सीएम हैं।
फूट क्यों पड़ी?
कुछ ही दिन पहले AAP ने चड्ढा को राज्यसभा में उप नेता पद से हटा दिया। आरोप था कि वे सरकार के खिलाफ अहम मुद्दे नहीं उठा रहे और 'सॉफ्ट PR' कर रहे हैं। उनकी जगह जिसे उप नेता बनाया गया, वही अशोक मित्तल आज उनके साथ भाजपा में विलय की प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद थे। पार्टी संसदीय दल का उप नेता बनाए जाने के बाद अशोक मित्तल के ठिकानों पर ईडी की छापेमारी हुई थी। छापेमारी को अभी दस दिन भी नहीं हुए हैं और आज मित्तल ने भी भाजपा में शामिल होने का एलान कर दिया।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में क्या कहा गया?
संदीप पाठक और अशोक मित्तल के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए राघव चड्ढा ने कहा, "हमने फैसला किया है कि राज्यसभा में AAP से संबद्ध दो-तिहाई सदस्य भारत के संविधान के प्रावधानों का उपयोग करते हुए खुद का भाजपा में विलय करेंगे।''
पार्टी छोड़ने का फैसला क्यों किया?
चड्ढा ने अपनी बात बेहद भावुक लहजे में कही। उन्होंने कहा, "जिस AAP को मैंने अपने खून और पसीने से सींचा और अपनी जवानी के 15 साल दिए, वह अपने सिद्धांतों, मूल्यों और नैतिकता से भटक गई है। अब यह पार्टी राष्ट्र के हित में नहीं बल्कि अपने निजी फायदे के लिए काम करती है। पिछले कुछ वर्षों से मुझे महसूस हो रहा था कि मैं सही इंसान हूं, लेकिन गलत पार्टी में। इसलिए आज हम कहना चाहते हैं कि हम AAP से दूर और जनता के करीब जा रहे हैं। राजनीति में आने से पहले मैं एक प्रैक्टिसिंग चार्टर्ड अकाउंटेंट था। मेरे साथ इस मंच पर अलग-अलग क्षेत्रों के लोग हैं। कुछ वैज्ञानिक थे, कुछ शिक्षाविद। आज AAP छोड़ने वालों में एक विश्वस्तरीय क्रिकेटर, एक पद्मश्री सम्मानित व्यक्ति और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं।"
उन्होंने कहा, "इन सभी लोगों ने सब कुछ छोड़कर भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाने के संकल्प के साथ यह पार्टी बनाई थी। मैं इसका संस्थापक सदस्य था और शायद बहुत कम लोग इसे मुझसे बेहतर जानते हैं। हमने दिल्ली में पार्टी बनाई। पंजाब में स्थापित की और अन्य राज्यों में फैलाने की कोशिश की, लेकिन आज बड़े दुख, पीड़ा और शर्म के साथ कहता हूं कि जो पार्टी भ्रष्टाचार खत्म करने के संकल्प के साथ बनी थी, वह अब भ्रष्ट और समझौता परस्त लोगों के हाथों में बुरी तरह फंसी है। इसीलिए राष्ट्र की सेवा के लिए AAP में शामिल हुआ हर देशभक्त व्यक्ति या तो पहले ही जा चुका है या एक-एक करके जा रहा है।"
चड्ढा और केजरीवाल में दूरियां कैसे आईं?
राघव चड्ढा अरविंद केजरीवाल के काफी नजदीकी माने जाते थे। आंदोलन के समय से दोनों साथ थे। चड्ढा ने आम आदमी पार्टी से अपनी राजनीति शुरू की थी। दरअसल, केजरीवाल और राघव चड्ढा में दूरियां उसी दिन से नजर आने लगी थीं जब केजरीवाल जेल में थे और राघव अपनी पत्नी परणिति के साथ लंदन चले गए थे। तब उन्होंने कहा था कि वो अपनी आंख का इलाज कराने के लिए लंदन गए हुए हैं। राघव को लोकसभा चुनाव में भी पंजाब से दूर रखा गया। औपचारिक तौर पर वे श्री आनंदपुर साहब सीट पर नजर आए थे। पिछले कुछ समय से राघव चड्ढा पार्टी के अहम मुद्दों पर अपेक्षाकृत शांत नजर आ रहे थे।
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