नोटबंदी के एक साल बाद भी उसके अच्छे और बुरे असर को लेकर बहस जारी है। हालांकि यह आर्थिक सुधार का एक बहुत बड़ा कदम था लेकिन इसके असर को सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक चश्मे से ही देखा गया।
समर्थकों की नजर में यह क्रांतिकारी फैसला है, तो आलोचकों की निगाह में किसी बुरे सपने की तरह, जिसके असर से देश अब तक नहीं उबर पाया है। इसके मद्देनजर ‘अमर उजाला’ ने विशेषज्ञों से जानने की कोशिश की कि आखिरकार इस फैसले को किस नजरिए से देखा जाए:
----------
नसबंदी की तरह राजनीतिक भूल साबित होगी नोटबंदी
नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा एक साल पहले लागू की गई नोटबंदी का सबसे ज्यादा असर देश के सर्वाधिक कमजोर तबके पर पड़ा है। रोज कमाने-खाने वाले दिहाड़ी मजदूर, छोटे व्यापारी, दुकानदार, किसान, महिलाएं और वरिष्ठ नागरिकों को इससे अकथनीय परेशानियों का सामना करना पड़ा। सबसे दुख की बात यह है कि केंद्र सरकार अभी भी झूठ बोल रही है।
नोटबंदी लागू करते समय कहा गया कि इससे काले धन पर लगाम लगेगी, आतंकी फंडिंग की रीढ़ टूट जाएगी, जाली नोटों का धंधा ठप पड़ जाएगा, देश की नकदी पर निर्भरता खत्म होगी और कैशलेस अर्थव्यवस्था का उदय होगा। लेकिन एक साल के बाद इनमें से कोई भी उद्देश्य पूरा नहीं हुआ है। हालांकि सभी चाहते हैं कि काले धन पर अंकुश लगे और आतंकियों को वित्तीय मदद देने वालों पर शिकंजा कसा जाए लेकिन इसके लिए जो तरीका अपनाया गया, वह ठीक नहीं था।
इन उद्देश्यों की पूर्ति के दूसरे तरीके भी हो सकते थे, लेकिन उन पर विचार किए बिना अचानक नोटबंदी लागू कर दी गई। अब सरकार कह रही है कि लोगों के पास जमा एक-एक रुपया बैंकों के पास पहुंच गया है और उससे जो आंकड़े प्राप्त हुए हैं, उनसे काले धन के कारोबारियों के खिलाफ कार्रवाई का बड़ा आधार मिला है। सरकार ऐसे लोगों को नोटिस भेज रही है।
लेकिन यह काम तो नोटबंदी के बिना भी हो सकता था। सरकार का आयकर विभाग ऐसे संदिग्ध लोगों के खिलाफ पहले भी कार्रवाई करता रहा है। इसलिए सरकार के इस तर्क में दम नहीं है। सरकार लगभग तीन लाख शेल कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई को भी बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रचारित कर रही है, लेकिन इसके लिए भी नोटबंदी लागू करने की जरूरत नहीं थी।
केंद्र सरकार का नोटबंदी का फैसला उसकी बड़ी भूल साबित होगा। यह ठीक उसी तरह का फैसला साबित होगा जैसा 1975 में आपातकाल में इंदिरा गांधी द्वारा लागू किया गया नसबंदी का कार्यक्रम। जब उसे लागू किया गया था तब किसी ने नहीं सोचा था कि इसके कारण श्रीमती गांधी को सत्ता गंवानी पड़ेगी। मोदी सरकार को भी नोटबंदी के फैसले की कीमत चुकानी पड़ेगी।
आप कह सकते हैं कि अगर नोटबंदी इतना ही खराब कदम था, तो इसका उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव पर क्यों नहीं असर पड़ा। दरअसल, उत्तर प्रदेश के चुनाव में सिर्फ नोटबंदी ही एक मुद्दा नहीं था। इसके अलावा तब मोदी राज्य की जनता को भ्रमित करने में कामयाब रहे थे कि 500 और 1000 के नोट बंद करने का उनका यह फैसला गरीबों के हित में है क्योंकि काले धन पर कार्रवाई से हासिल धन को गरीबों के कल्याण की योजनाओं में लगाया जाएगा, जिससे उनका जीवन स्तर ऊंचा होगा। लेकिन जनता को एक बार भ्रमित किया जा सकता है, बार-बार नहीं।
(परंजय गुहा ठाकुरता, वरिष्ठ पत्रकार)