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अर्धसैनिक बलों की तैनाती: चुनावी ड्यूटी के लिए बॉर्डर गार्ड फोर्स को मोर्चे से हटाना ठीक नहीं, 'चौकसी व ट्रेनिंग' का चक्र टूटने का जोखिम

सार

उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में चुनावों का शेड्यूल जारी हो चुका है। कम से कम तीन माह तक सीएपीएफ के जवानों को चुनावी ड्यूटी पर रहना होगा। इसमें बॉर्डर गार्ड फोर्स जैसे बीएसएफ, आईटीबीपी व एसएसबी को अपने मोर्चों से चुनाव में आना पड़ता है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में बीएसएफ की 120 कंपनियां तैनात की गई हैं...
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चुनाव ड्यूटी - फोटो : PTI (File Photo)
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देश में शांतिपूर्वक एवं निष्पक्ष चुनाव संपन्न कराने के लिए केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की बड़े स्तर पर तैनाती होती है। सीआरपीएफ के अलावा बीएसएफ, आईटीबीपी, एसएसबी व दूसरे बलों की कंपनियां भी चुनावी ड्यूटी पर पहुंचती हैं। इनमें भारत-पाकिस्तान व भारत-बांग्लादेश सीमा पर तैनात बीएसएफ और भारत-चीन बॉर्डर की चौकसी करने वाली आईटीबीपी के जवान, बॉर्डर आउट पोस्ट 'बीओपी' से चुनाव में बुलाए जाते हैं। स्थानीय पुलिस के साथ चुनावी रैलियों, रोड शो, फ्लैग मार्च व मतदान बूथ पर सीएपीएफ जवानों को देखा जा सकता है। बीएसएफ के पूर्व एडीजी संजीव कृष्ण सूद, जिन्होंने 'बीएसएफ: द आइज एंड ईयर्ज ऑफ इंडिया' किताब लिखी है, उनका कहना है कि चुनावी ड्यूटी के लिए बॉर्डर गार्ड फोर्स को मोर्चे से हटाना ठीक नहीं है। इससे जवानों को कई तरह की दिक्कतें झेलनी पड़ती हैं। कई बार तो तनाव की स्थिति बन जाती है। इतना ही नहीं, बीओपी से जवानों को बुलाकर उन्हें चुनावी ड्यूटी पर भेजना, इससे बल की 'चौकसी व ट्रेनिंग' का चक्र भी टूट जाता है। जवान कम होने के कारण, बॉर्डर आउट पोस्ट पर कई तरह की परेशानियां सामने आती हैं। बेहतर होगा कि सभी बलों में ऐसी ड्यूटी के लिए रिजर्व बटालियन खड़ी कर दी जाएं।

तीन माह तक मोर्चे से दूर रहते हैं सीएपीएफ जवान

उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में चुनावों का शेड्यूल जारी हो चुका है। कम से कम तीन माह तक सीएपीएफ के जवानों को चुनावी ड्यूटी पर रहना होगा। इसमें बॉर्डर गार्ड फोर्स जैसे बीएसएफ, आईटीबीपी व एसएसबी को अपने मोर्चों से चुनाव में आना पड़ता है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में बीएसएफ की 120 कंपनियां तैनात की गई हैं। इनमें से 67 कंपनी उत्तर प्रदेश, 32 पंजाब और मणिपुर में 12 कंपनी चुनावी ड्यूटी पर हैं। करीब दस कंपनियां गोवा और उत्तराखंड में भेजी गई हैं। इन कंपनियों में जितने भी जवान होते हैं, उन्हें किसी न किसी मोर्चे से ही बुलाया जाता है। विधानसभा चुनाव के अलावा लोकसभा चुनाव में इन्हीं बलों की तैनाती होती है। इतना ही नहीं, कई राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों जैसे जम्मू कश्मीर, पश्चिम बंगाल, मणिपुर व त्रिपुरा आदि में तो स्थानीय निकाय चुनाव के दौरान भी केंद्रीय सुरक्षा बलों को तैनात किया जाता रहा है।

बढ़ जाता है घुसपैठ और तस्करी का खतरा

बॉर्डर गार्ड फोर्स के चुनाव में आने से घुसपैठ और तस्करी का खतरा बढ़ जाता है। एक बीओपी से दूसरी बीओपी के बीच गश्त के समय में अंतर आ सकता है। पूर्व एडीजी संजीव कृष्ण सूद ने बताया, चुनाव एक बड़ी एक्सरसाइज होती है। सभी केंद्रीय बलों से थोड़े-थोड़े जवान निकाल लेते हैं। पाकिस्तान बॉर्डर पर ज्यादा चौकसी रहती हैं, इसलिए यहां से कम जवानों को बुलाया जाता है। पूर्वी बॉर्डर से ज्यादा संख्या में जवान निकलते हैं। खास बात ये है कि इन्हीं इलाकों में घुसपैठ, पशु तस्करी, अवैध हथियार, ड्रग और दूसरे अपराध होते रहते हैं। अगर तीस-चालीस फीसदी जवान भी वहां से हटते हैं, तो बॉर्डर की सुरक्षा में सेंध लगने की संभावनी बनी रहती है। ऐसे में मोर्चे से जवानों को चुनाव में भेजना ठीक नहीं है। इससे बॉर्डर की सुरक्षा पर असर पड़ता है। ट्रेनिंग सेंटर से भी जवान चुनावी ड्यूटी पर आते हैं। इससे वहां पर चलने वाले नियमित ट्रेनिंग कोर्स या रिफ्रेशर कोर्स प्रभावित होते हैं। बतौर संजीव कृष्ण सूद, एक बटालियन में सात कंपनी होती हैं। छह बॉर्डर पर और एक ट्रेनिंग पर रहती है। डेढ़ से दो माह की ट्रेनिंग होती है। ये प्रक्रिया हमेशा चलती रहती है। चुनाव के दौरान इस प्रक्रिया में बाधा पहुंचती है।

छुट्टी और प्रमोशन कोर्स को लेकर भी दिक्कतें आती हैं

चुनावी ड्यूटी के कारण जवानों को पर्याप्त छुट्टी नहीं मिल पाती। तकरीबन सभी बलों में छुट्टी को लेकर जवानों के बीच तनाव की खबरें आती रहती हैं। अगर किसी यूनिट से तीस फीसदी जवान निकलते हैं, तो वहां बाकी जवानों के लिए छुट्टी पर जाना आसान नहीं होगा। पहले जो काम सौ बटालियन करती थी, अब 70 कर रही हैं। चुनावी ड्यूटी में जवान को समय पर आराम भी नहीं मिलता। रैली या रोड शो का भरोसा नहीं है कि वह समय पर शुरू और खत्म होगा। ट्रेनिंग सेंटर से जो कंपनी चुनाव में भेजी जाती है, वहां नए कोर्स या नियमित कोर्स चालू करने में परेशानी आती है। अगर किसी अधिकारी या जवान का प्रमोशन कोर्स है तो उसमें भी देरी हो सकती है। कोर्स समय पर नहीं होगा तो प्रमोशन की फाइल आगे नहीं बढ़ेगी। पूर्व एडीजी संजीव कृष्ण सूद कहते हैं कि इन सब दिक्कतों से निजात पाने के लिए जरूरी है कि सभी फोर्स में रिजर्व बटालियन खड़ी की जाएं। उन्हें बॉर्डर ड्यूटी से दूर रखें। सीआरपीएफ में भी ऐसा ही किया जाए। बीएसएफ और आईटीबीपी में भी रिजर्व बटालियन सृजित हो सकती हैं। देश में चुनाव तो चलते रहते हैं, पर्याप्त संख्या में रिजर्व बटालियन होने के बाद यहीं से जवानों को चुनावी ड्यूटी पर भेजा जा सकेगा। बॉर्डर से संबंधित ड्यूटी पैटर्न पहले की भांति चलता रहे।

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