सही समय पर गलत अनुपात में दवा के प्रयोग का नतीजा
माइक्रोबायोलॉजी के एक विशेषज्ञ ने कहा कि जिस तरह से कोरोना के इलाज में बेतहाशा तरीके से स्टेरॉयड का इस्तेमाल हुआ है, ब्लैक फंगस का संक्रमण उसी का नतीजा है। वह बताते हैं कि ब्लैक फंगस मिट्टी, हवा, भोजन आदि में हो सकता है। जिन लोगों की इम्यूनिटी कमजोर होती है, उनका शुगर लेवल अनियंत्रित रहता है या फिर उन्हें कोरोना के इलाज के दौरान अंधाधुंध स्टेरॉयड दिए गए, उन्हीं में इसके संक्रमण का खतरा है। केजीएमयू के वरिष्ठ फेफड़ा रोग विशेषज्ञ का कहना है कि कोरोना के इलाज में लोगों की जान बचाने के लिए स्टेरॉयड दिए गए, लेकिन इसके लिए कोई गाइडलाइन पहले जारी ही नहीं की गई। सूत्र का कहना है कि प्लाज्मा थेरेपी भी कोरोना संक्रमित का इलाज नहीं है, लेकिन इसे लेकर गाइडलाइन बहुत देरी से जारी हुई।
ब्लैक फंगस के 7500 से अधिक मामले
बनारस की एक महिला ब्लैक फंगस से संक्रमित हो गई। उनकी आंख को आपरेशन करके निकालने के बाद जान नहीं बची। बीएचयू के वरिष्ठ चिकित्सक का कहना है कि इसकी कोई प्रिसक्राइब्ड दवा अभी देश में नहीं है। महाराष्ट्र में ब्लैक फंगस के मामले काफी मिले हैं। पहले नंबर पर चल रहा है। गुजरात, मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, समेत करीब नौ राज्यों में इसके संक्रमितों के मिलने की सूचना है। प्राप्त जानकारी के अनुसार करीब 7500 संक्रमित ब्लैक फंगस से पीड़ित हैं और लगभग 250 लोगों की देश में इससे मृत्यु हो चुकी है। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के सूत्रों की मानें तो अगले सप्ताह तक संक्रमितों की संख्या 10 हजार के आंकड़े को पार कर सकती है।
अमेरिका समेत दुनिया में नहीं हैं ब्लैक फंगस के मामले
केजीएमयू के चिकित्सक का कहना है कि देश के आठ-नौ राज्यों में ब्लैक फंगस का प्रकोप बढ़ रहा है, लेकिन यह अमेरिका, यूरोप समेत दुनिया के तमाम देशों में नहीं हैं। सूत्र का कहना है कि इसके तीन प्रमुख कारण हैं। पहला तो यह कि कोरोना महामारी के दौर में उन्होंने अपने यहां के संक्रमितों के इलाज में बरती जाने वाली सावधानियों पर अधिक फोकस किया। समय पर और सही तथा उचित मात्रा में दवा के इस्तेमाल को महत्व दिया। इसकी तुलना में हमारे यहां ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। सूत्र का कहना है कि हमारे यहां लोगों की शुगर अनियंत्रित रहती है। स्टेरॉयड देने के बाद यह और बढ़ जाती है। खून में शुगर के बढ़ने का अर्थ है कि हम बैक्टीरिया, वायरस, फंगस को पोषण सामग्री दे रहे हैं। अब यह लापरवाही भारी पड़ रही है।
क्या होना चाहिए?
डा. एनके अरोड़ा एक सवाल पूछते हैं कि आखिर कोरोना की दवा क्या है? फिर वह जवाब देते हैं कि इसकी दवा केवल पेरासिटामोल की गोली, विटामिन बी-कांप्लेक्स, विटामिन सी, विटामिन डी ही है। सर्दी, खांसी, जुकाम की स्थिति में उसके लिए कोई कफ सिरप। वह कहते हैं कि जब तक मरीज का ऑक्सीजन लेवेल 92-93 तक है, तब तक इसके अलावा किसी और दवा की जरूरत नहीं है और न ही अस्पताल जाने की आवश्यकता। लेकिन लोग पहले ही अस्पताल पहुंच जाते हैं। डा. अरोड़ा कहते हैं कि बहुत से मरीजों के लिए रेमडेसिविर, स्टेरॉयड आदि की जरूरत नहीं है, लेकिन उन्हें यह दवाएं दी गईं। कुछ भी बेमेल होगा तो उसका नुकसान होगा।
डा. अरोड़ा के इस सवाल और जवाब पर नाम न छापने की शर्त पर केजीएमयू लखनऊ के चिकित्सक कहते हैं कि जिला अस्पताल से लेकर बड़े शहरों के चिकित्सकों को इसके बारे में क्या पता? महामारी नई है तो आखिर यह किसकी जिम्मेदारी है। सूत्र का कहना है कि जैसे अमेरिका, यूरोप जैसे देशों ने दवा के इस्तेमाल पर काम किया, हम भी कर सकते थे। जैसे हमने महामारी के 11 महीने बाद फेबीफ्लू, रेमडेसिविर, प्लाज्मा थेरेपी और स्टेरॉयड के इस्तेमाल पर एडवाइजरी जारी की, यह पहले भी किया जा सकता था। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।