सीआरपीएफ के टेलर ने डीआईजी के कपड़ों की सिलाई, पसंद नहीं आई तो साहब ने मारा थप्पड़
शिकायत में लिखा है कि सिपाही (टेलर) विश्वजीत घोष को डीआईजी के निजी कपड़ों की सिलाई का काम सौंपा गया था। डीआईजी बीडी दास को सिलाई पसंद नहीं आई तो उन्होंने टेलर को अपने सरकारी आवास पर बुलाया और उसे थप्पड़ दे मारा। आरोप है कि एएसआई राजेश लाल से अनुचित वित्तीय फायदा न मिलने के कारण उस पर गलत आरोप लगाए गए। बाद में उसे अर्दली कक्ष में प्रस्तुत कर निंदा की सजा दी गई। इसी तरह दूसरे एएसआई एसपी सिंह को भी निंदा की सजा मिली। कवार्टर गार्ड में सही तरह से ड्रिल न कर पाने के कारण डीआईजी ने एक हवलदार को सबके सामने इतनी जोर से घूंसा मारा कि उस जवान को अस्पताल में दाखिल कराना पड़ा।
डॉक्टरों ने ईलाज के बाद उसे कई दिन तक बिस्तर पर रहने की सलाह दी। इसी तरीके से अन्य जवानों के साथ भी ऐसा ही व्यवहार होने की बात कही जा रही है। एक अन्य मामले में डीआईजी ने स्टेशनरी लेने के लिए सिलचर से कोलकाता, एक सरकारी वाहन भेजा था।इसके साथ दस कर्मचारी भी रवाना कर दिए गए। आरोप है कि उन्होंने अपने निजी आवास पर काम कराने के लिए सरकारी वाहन एवं सभी कर्मियों को एक माह तक कोलकाता में ही रखा।
शिकायत में दूसरे पेज के पैरा नंबर चार में लिखा है कि सहायक कमांडेंट बीके देउरी और एसके हलदार को डीआईजी की कथित प्रताड़ना के चलते स्वैच्छिक रिटायरमेंट लेनी पड़ी। बताया गया है कि सीआरपीएफ के इतिहास में मिनिस्टीरीयल कर्मियों के राजपत्रित अधिकारी बनने के बाद इन दोनों को छोड़कर किसी ने वीआरएस नहीं ली। कथित तौर पर दोनों को वित्तीय परेशानी का भय दिखाकर इनसे वीआरएस के आवेदन में घरेलू समस्या लिखवा लिया।
छुटृटी न मिलने के कारण हवलदार तरूण कुमार घोष ने आत्महत्या का प्रयास किया। सब-इंस्पेक्टर नरेश कुमार ने जुलाई में छुट्टी के मामले को लेकर खुद को कई गोलियां मार ली थीं। खास बात है कि ग्रुप सेंटर पर सीआरपीएफ का मैन्यू नहीं चलता, वहां जो डीआईजी कहते हैं, वहीं खाना बनता है। यहां तक कि कर्मियों को पीने का पानी भी अपने पैसे से खरीद कर पीना पड़ता है।