गांव में माहौल ठीक न होने के तर्क की ढाल के सहारे लखाईखास गांव में भी बेटियों की शादी 13-16 साल में कर दी जाती रही है। बड़ी बहन की तरह ही दिव्या मिश्रा का भी यही हश्र होने वाला था। संगीत और गृह सज्जा में थोड़ा-बहुत दखल रखने वाली दिव्या ने किसी तरह से 12वीं की पढ़ाई के दौरान ही हो रही अपनी शादी रुकवाई।
आज वह बी.ए. प्रथम वर्ष की छात्रा के रूप में अपने सपने सच करने की राह पर बढ़ रही है। श्रावस्ती के जमुनहा ब्लॉक के लखाईखास गांव की दिव्या अच्छी पढ़ाई करके शिक्षिका बनना चाहती है। इस राह पर आगे बढ़ने की चुनौती पिछले साल एकाएक बहुत बड़ी हो गई थी जब उसे पता चला कि माता-पिता उसकी भी शादी करने की बात कर रहे हैं।
देश सेवा का हौसला रखने वाली दिव्या ने अपने अभिभावकों को समझाने की पुरजोर कोशिश की कि वह बाल विवाह करवा कर अपने जीवन से खिलवाड़ नहीं होने देना चाहती, पढ़-लिख कर आगे बढ़ना चाहती है। उसके तर्क जीत गए। स्मार्ट बेटियां अभियान से जुड़ी इंटरनेट साथी सुमन देवी ने यह वीडियो कथा बनाकर अमर उजाला को भेजी है।
अमर उजाला फाउंडेशन, यूनिसेफ, फ्रेंड, फिया फाउंडेशन और जे.एम.सी. के साझा अभियान स्मार्ट बेटियां के तहत श्रावस्ती और बलरामपुर जिले की 150 किशोरियों-लड़कियों को अपने मोबाइल फोन से बाल विवाह के खिलाफ काम करने वालों की ऐसी ही सच्ची और प्रेरक कहानियां बनाने का संक्षिप्त प्रशिक्षण दिया गया है। इन स्मार्ट बेटियों की भेजी कहानियों को ही हम यहां आपके सामने पेश कर रहे हैं।