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गुजरात : पूर्व आईएएस अधिकारी प्रदीप शर्मा को पांच साल की सजा, मनी लॉन्ड्रिंग मामले में दोषी करार

Sat, 06 Dec 2025 10:21 PM IST
राहुल कुमार पीटीआई, अहमदाबाद

सार

पूर्व आईएएस अधिकारी प्रदीप शर्मा को मनी लॉन्ड्रिंग मामले में पांच साल की सजा और 50,000 रुपये जुर्माना लगाया है। यह मामला 2003 से 2006 के दौरान कच्छ कलेक्टर रहते हुए सरकारी भूमि को वेलस्पन इंडिया लिमिटेड को रियायती दरों पर देने से जुड़ा है।
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सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी प्रदीप शर्मा (फाइल फोटो) - फोटो : (फाइल फोटो)
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विस्तार
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सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी प्रदीप शर्मा को 2003 से 2006 के बीच एक निजी कंपनी को रियायती दर पर सरकारी जमीन देने से संबंधित धन शोधन के एक मामले में एक विशेष अदालत ने शनिवार को पांच साल कैद की सजा सुनाई। उक्त अवधि के दौरान शर्मा कच्छ जिला कलेक्टर थे। अदालत ने उन पर 50,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया। जज के एम सोजीत्रा ने शर्मा को पीएमएलए की धारा 3 और 4 के तहत दोषी ठहराया और उनकी जब्त संपत्तियों को केंद्र सरकार के पास ही रहने का आदेश दिया।

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मामले की पृष्ठभूमि और आरोप:
ईडी के अहमदाबाद क्षेत्रीय कार्यालय ने मार्च 2012 में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के प्रावधानों के तहत प्रदीप शर्मा और अन्य के खिलाफ एक आपराधिक मामला दर्ज किया था। जांच से पता चला कि शर्मा ने तत्कालीन जिला भूमि मूल्य निर्धारण समिति के अध्यक्ष के रूप में नियमों का उल्लंघन करते हुए वेलस्पन इंडिया लिमिटेड को रियायती दरों पर सरकारी भूमि का एक बड़ा हिस्सा आवंटित किया।

ईडी ने दावा किया कि शर्मा ने वेलस्पन इंडिया और उसकी समूह कंपनियों से प्राप्त अपराध की आय को लेयरिंग (शोधन) करने के लिए अपनी पत्नी के बैंक खाते का इस्तेमाल किया। अपराध की आय का उपयोग हाउसिंग लोन चुकाने और कृषि भूमि खरीदने आदि में किया गया था।
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अभियोजन पक्ष ने कहा कि शर्मा को कंपनी को अनुचित लाभ पहुंचाने के लिए अवैध परितोषण मिला था और 29.5 लाख रुपये उनके अमेरिका में रहने वाली पत्नी के खाते में जमा किए गए थे। इसके अलावा, शर्मा पर आरोप था कि उन्हें कंपनी से एक मोबाइल सिम कार्ड मिला, जिसके लिए 2004 से 2009 के बीच 2.24 लाख रुपये का भुगतान किया गया।

ईडी ने आरोप पत्र में कहा था कि रिश्वत की राशि को विदेश भेजने के लिए 2004 से 2007 के बीच उनकी पत्नी को एक सहयोगी फर्म, वैल्यू पैकेजिंग प्राइवेट लिमिटेड में 30 प्रतिशत भागीदार बनाया गया था। संघीय एजेंसी ने जोर दिया कि यह साझेदारी वास्तव में एक विशेष प्रयोजन वाहन थी जिसके माध्यम से अपराध की आय को उनके एनआरओ खाते में भेजा गया था।

राजकोट की सीआईडी (क्राइम) ने मार्च 2010 में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराओं के तहत शर्मा के खिलाफ पहली एफआईआर दर्ज की थी। सितंबर 2010 में आईपीसी के तहत एक और मामला दर्ज किया गया। आरोप था कि शर्मा ने सरकार को 1.20 करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचाया।

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सितंबर 2014 में एंटी-करप्शन ब्यूरो  ने भी शर्मा के खिलाफ मामला दर्ज कर आरोप था कि उन्होंने वेलस्पन समूह की कंपनी के लिए कृषि भूमि को केवल 40 दिनों में गैर-कृषि दर्जा प्रदान कर दिया, जबकि उनकी पत्नी उस संबंधित कंपनी में साझेदार थीं और इसके बदले उन्हें 29.5 लाख रुपये प्राप्त हुए। 2010 की एफआईआर के आधार पर ईडी ने मार्च 2012 में शर्मा और अन्य के खिलाफ मामला दर्ज किया और जांच के दौरान गांधीनगर जिले में स्थित भूमि और एक मकान सहित उनकी संपत्तियां अस्थायी रूप से अटैच कीं। इसी साल अप्रैल में भुज की अदालत ने भूमि आवंटन अनियमितताओं के एक अन्य मामले में उन्हें पांच साल की सजा सुनाई थी। शर्मा वर्तमान में जेल में हैं।

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