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पूर्व डकैत को भाई गांधीगिरी, गली, चौराहों पर मारता है झाड़ू

Fri, 15 Apr 2016 06:52 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली
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सुरेश सर्वोदय
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कभी अपने नाम से लोगों में खौफ पैदा कर देने वाले बुदेलखंड के डकैत का मन अब गांधीगिरी में रम गया है। वह दुनिया की भलाई-बुराई छोड़कर अब स्वेच्छा से इलाके के गली चौराहों में झाड़ू मार रहा है।
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सुरेश सर्वोदय पर हत्या और डकैती के दो दर्जन मामले दर्ज थे, जिन पर उन्हें दशकों जेल में रहने पड़ा लेकिन जेल से छूटने के बाद अब उनका जीवन बिल्कुल ही बदल गया है। महोबा जिले के एक छोटे से गांव के रहने वाले सुरेश आजकल गांधीगिरी में डटे हैं।

64 साल के हो चुके सुरेश आजकल झांसी जिले के मऊरानीपुर कस्‍बे में रह रहे। उन्होंने 12 लोगों का एक गैंग बनाकर जिस तरह से एक अपराध किए वह किस्सा भी हैरान करने वाला है।
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चंद्रशेखर आजाद से प्रभावित होकर बनाया गैंग

भगत सिंह व चंद्रशेखर आजाद
12वीं पास के बाद सुरेश (उस वक्त के) सोनी ने देश स्वतंत्रता संग्राम सेनानी जैसे भगत सिंह और चंद्र शेखर आजाद से इतना ज्यादा प्रभावित हुए कि वह भी उनके जैसे अपने इलाके का हीरो बनने की ठानी और इसके लिए उन्होंने 10 लोगों का एक गैंग बनाकर इलाके के अमीर लोगों पर रौब गांठने लगे।

महोबा जिले के आस पास के इलकों में सुरेश सोनी और उनके सा‌थियों ने करीब 10 साल तक कई लूट, डकैती और हत्याओं को अंजाम दिया। डकैती जैसे कई अपराध करने के दौरान उन्होंने ध्यान रखा कि गरीब लोगों को किसी भी प्रकार की तकलीफ न होने पाए।

सोनी से जब पूछा गया कि उन्होंने ऐसा खतरनाक रास्ता क्यों अपनाया तो उन्‍होंने बताया कि उन्होंने देखा कि अंग्रेजों से तो देश को मुक्ति मिल चुकी थी लेकिन बड़े जाति के संपन्न लोग गरीबों पर अत्याचार कर रहे थे और इसी ऊंच नीच को खत्‍म करने के लिए उन्होंने हथियार उठाया। डकैत रहने के दौरान सुरेश ने जालौन, उरई और हमीरपुर जिलों में उगाही और डकैती का काम किया।

'कुछ साल बाद जेल से भाग निकला'

सुरेश बताते हैं कि 1973 में वह गिरफ्तार हो गए थे लेकिन कुछ सालों बाद जेल से भागने में कामयाब रहे। सुरेश के मुताबिक जेल से भागने के बाद उन्होंने फिर से अपने गैंग के लोगों को इकट्ठा किया और 1977 तक फिर से अपना धंधा जारी रखा।

इस बार 1977 में गिरफ्तार होने के बाद उनके साथ बहुत ही सख्त व्यवहार किया गया। उसे हमीरपुर जेल की स्पेशल सेल में रखा गया और इस दौरान पैरों में लोहे की रॉड बांध दी गई ताकि वह दोबारा न भाग सके।

यही वह वक्त था जब सुरेश की जिंदगी बदल गई और उसके मन में अपराध की दुनिया छोड़ने का विचार आया। सुरेश ने बताया कि हमीरपुर की जेल में गांधी जी और स्वामी विवेकानंद के जीवन पर लिखी गई किताबें, गीता रामायण समेत 100 से ज्यादा किताबें पढ़ीं।

हमीरपुर जेल में करीब 23 साल रहने के बाद 1999 में अच्छे व्यवहार के लिए रिहा किए गए ‌थे। उन्होंने बताया कि वह 1980 के बाद से ही जेल में समाज सेवा के काम करने लगे थे। इस बार जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने सोचा कि वह गांधी के तरीके से बुराइयों को दूर करने का प्रयास करेंगे।
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रोज तीन घंटे करते हैं सफाई

उन्होंने कहा कि वह अब न तो किसी धर्म को मानते हैं और न ही किसी जाति को। इसील‌िए अपने नाम के आगे अब सर्वोदय लगाते हैं। सुरेश खुद को दुनिया का घुमक्कड़ बताते हैं। उनके खादी के बैग में सफाई से जुड़ी सामग्री ही मिलेगी।

सुरेश के अनुसार, रोज कम से कम तीन घंटे सार्वजनिक स्‍थानों की सफाई करते हैं। वह सार्वजनिक स्‍थानों जैसे बस स्टैंड पर बने शौचालय भी साफ करते हैं।

उनके मुताबिक ऐसा काम वह दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, वाराणासी और इलाहाबाद में भी घूम-घूमकर किया है। उनके काम से प्रभावित कोकर लोग भी उनके साथ लग जाते हैं।
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