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36 साल पहले केरल विधानसभा चुनाव में लगी थी ईवीएम पर रोक

Thu, 18 Apr 2019 05:43 AM IST
गौरव द्विवेदी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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ईवीएम (सांकेतिक)
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चुनावों के दौरान ईवीएम की विश्वसनीयता सवालों के घेरे में रही है। भाजपा के केंद्र और कुछ राज्यों में प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आने पर विपक्ष ने ईवीएम से छेड़छाड़ के आरोप लगाए थे। कुछ हैकर्स भी ईवीएम को हैक करने का दावा करते रहे हैं। यह पूरा बवाल 5-10 सालों से ही नहीं चल रहा। 36 साल पहले केरल के विधानसभा चुनाव में भी ईवीएम को कठघरे में खड़ा किया जा चुका है। उस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने ईवीएम से हुए चुनाव को रद्द करते हुए चुनाव आयोग को बैलट पेपर से फिर चुनाव करवाने के निर्देश दिए थे। 

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चुनाव आयोग ने देश में सबसे पहले केरल के एर्नाकुलम जिले में ईवीएम का परीक्षण किया था, लेकिन इसके लिए संसदीय स्वीकृति नहीं ली गई थी। परवूर निर्वाचन क्षेत्र के 84 बूथों में से 50 पर ईवीएम से वोटिंग कराई गई। 19 मई 1982 को मतदान हुए। बैलट पेपर की तुलना में ईवीएम वाले बूथों पर मतदान जल्दी समाप्त हो गया। वोटों की गिनती भी बैलट पेपर की तुलना में जल्दी पूरी हो गई। सीपीआई के सिवन पिल्लई को 30,450 वोट मिले जबकि कांग्रेस के पूर्व विधानसभा अध्यक्ष एसी जोस को 30,327 मत। पिल्लई ने जोस को 123 मतों से शिकस्त दी थी। 

बैलट से हुआ चुनाव  बदल गया परिणाम

चुनाव परिणाम आने के साथ ही कांग्रेस ने ईवीएम की तकनीक पर सवाल खड़ा कर दिया। जोस ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर बताया कि चुनाव आयोग ने बिना संसदीय स्वीकृति के ईवीएम का इस्तेमाल किया है। उन्होंने जनप्रतिनिधि अधिनियम 1951 और चुनाव अधिनियम 1961 का हवाला भी दिया, लेकिन हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। जोस सुप्रीम कोर्ट पहुंचे तो फैसला उनके पक्ष में आया। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को ईवीएम वाले 50 बूथों पर फिर से बैलट पेपर के जरिए चुनाव कराने के निर्देश दिए। इसके बाद हुई मतगणना में जोस 2000 मतों के अंतर से जीते। शीर्ष अदालत ने चुनावों के दौरान इस तरह के 'अभिनव प्रयोग' करने से भी चुनाव आयोग को रोक दिया था।
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ईवीएम के उपयोग के लिए अधिनियम में संशोधन

सुप्रीम कोर्ट के 1984 में आए आदेश के बाद चुनाव आयोग ने ईवीएम के उपयोग को रोक दिया था। सन् 1992 में संसद ने ईवीएम के उपयोग को वैध बनाने के लिए दोनों अधिनियम में संशोधन किया। वर्ष 1998 के बाद से लोकसभा और विधानसभा दोनों चुनावों में ईवीएम का उपयोग किया जाने लगा। हाल ही में ईवीएम पर फिर से सवाल उठे तो चुनाव आयोग ने वोटर वेरिफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपेट) पेश किया, ताकि चुनावों में पारदर्शिता बनी रहे।

निम्न और मध्यमवर्ग तय करेगा सरकार आर्थिक वर्गों में जानिए कौन-किसे कर रहा वोट

वर्ष 2014 में हुए चुनाव में शहरी क्षेत्र के 71 प्रतिशत 


मध्यमवर्गीय मतदाताओं ने अपने मताधिकार का उपयोग किया था। यह देश के औसत मतदान से करीब 5 फीसदी और 2009 के इसी वर्ग के मतदान से 10 फीसदी अधिक था। चुनाव आयोग द्वारा जारी अलग-अलग रिपोर्ट्स और विभिन्न संस्थाओं के अध्ययन बताते हैं कि 2009 के मुकाबले ग्रामीण और मेट्रोपोलिटिन क्षेत्रों में यह वृद्धि क्रमश: 7 और 5 प्रतिशत थी। इस वर्ग का मत  प्रतिशत कांग्रेस व उसके सहयोगियों से शिफ्ट होकर बड़ी संख्या में भाजपा व उसकी सहयोगी पार्टियों की ओर से गया, जिसने परिणामों को बदला।

लालू के बड़े बेटे तेज प्रताप भाजपा में शामिल नहीं 

सोशल मीडिया पर लालू यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव को लेकर वायरल पोस्ट में उनके भाजपा में शामिल होने का दावा किया जा रहा है। पोस्ट में तेज प्रताप की फोटो के साथ मैं भी चौकीदार हूं... भी लिखा हुआ है।

फर्जी है पोस्ट

वायरल पोस्ट फोटो से छेड़छाड़ कर बनाई गई है। तेज प्रताप ने अलग पार्टी बनाने की चेतावनी दी थी और कहा था कि उनका मोर्चा लालू-राबड़ी मोर्चा होगा। 5 अप्रैल को उन्होंने ट्वीट कर खंडन किया कि वह किसी पार्टी में शामिल हुए हैं। उन्होंने कहा था कि मेरी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल है, थी और रहेगी।

जानते हैं, झुकाव कैसे बदला

सभी आर्थिक वर्ग के मतदाताओं का कांग्रेस से भाजपा व समर्थक दलों की ओर झुकाव दर्ज किया गया। निम्न, मध्यम और उच्च वर्ग में यह वृद्धि गरीब वर्ग से दो से पांच गुना तक अधिक दर्ज की गई।

आर्थिक आधार पर मतदाताओं की वर्ग संरचना, मतदान

मतदाताओं का बड़ा वर्ग गरीब तबके का है। इस वर्ग की मतदान में भागीदारी 2014 में बढ़ी, लेकिन अन्य वर्गों से कम रही। बाकी तीन वर्गों में 9 से 10 प्रतिशत वृद्धि हुई, वहीं गरीब वर्ग में यह 3 प्रतिशत रही।
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2014 में आर्थिक वर्गों के हिसाब से विभिन्न आयु वर्गों का झुकाव

गरीब वर्ग के युवा कांग्रेस और भाजपा को लगभग बराबर वोट दे रहे हैं, लेकिन जैसे-जैसे आर्थिक स्थिति बेहतर होती है, झुकाव भाजपा की ओर बढ़ता है। 

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