बात अगस्त 1959 की है। एक दावे के मुताबिक, तब पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने लोकसभा में पूर्वी और उत्तर-पूर्वी लद्दाख पर कहा था कि देश में एक ऐसा इलाका है, जो न सिर्फ बेहद ठंडा, बल्कि निर्जन और बंजर है। वहां एक घास तक नहीं उगती। संयोग से बयान के तीन साल बाद ही इस इलाके में भारत को चीन से जंग लड़नी पड़ी।
इस लड़ाई के बाद कई देशों ने तो पहली बार लद्दाख का नाम सुना था। लेकिन भारत और चीन के लिए इस इलाके की अहमियत कई सदियों से ही रही है, जिसकी भौगोलिक और सामरिक स्थिति के कारण दोनों देशों की सेनाओं का आमना-सामना होता रहा है। 1950 में तिब्बत पर कब्जे के बाद से ही चीन लद्दाख की ओर लालची निगाह से देखने लगा था।
1834 : डोगराराज से पहले आजाद था लद्दाख
1834 में डोगरा शासकों के आने से पहले तक यह हिमालयी क्षेत्र आजाद था। उस वक्त इसकी राजनीतिक स्थिति भूटान और सिक्किम की तरह ही थी। सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से लद्दाख का अपने पड़ोसी क्षेत्र तिब्बत से गहरा जुड़ाव था।