दिल्ली के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने बड़ी जीत दर्ज कराई है। इस जीत में केंद्र सरकार के कर्मचारियों का भी योगदान बताया जा रहा है। क्या चुनाव से पहले दिल्ली में सरकारी 'बाबू' भाजपा की नाव में सवार हो चुके थे, इस बाबत ऑल इंडिया एनपीएस एम्पलाइज फेडरेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ मंजीत सिंह पटेल बताते हैं, पूरे देश में सबसे अधिक कर्मचारी और पेंशनर, दिल्ली में रहते हैं। आठवें वेतन आयोग की घोषणा कर भाजपा ने दिल्ली चुनाव में एक बड़ा दांव चल दिया था। उसके बाद केंद्रीय बजट में 12 लाख रुपये तक की आय को इनकम टैक्स से छूट देना, इस निर्णय ने सरकारी कर्मियों को भाजपा के पक्ष में मतदान करने के लिए प्रेरित किया है। केंद्रीय कर्मियों ने नई दिल्ली सहित 22 सीटों पर दम दिखाया है।
बता दें कि दिल्ली में 5-6 लाख पेंशनर और करीब दो लाख सरकारी कर्मी हैं। करीब दो दर्जन सीटों पर जीत हार तय करने में बाबूओं की खास भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। डॉ. पटेल के मुताबिक, पोस्टल बैलेट रिजल्ट में सरकारी कर्मचारियों और पेंशनर्स ने केंद्र सरकार को रिटर्न गिफ्ट दिया है। बजट में 12 लाख रुपये तक की इनकम पर जीरो टैक्स का प्रावधान और 8वें वेतन आयोग के गठन की घोषणा, केंद्र सरकार के इन निर्णयों ने कर्मचारियों और पेंशनर्स को भाजपा के पक्ष में मतदान करने के लिए प्रेरित किया है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट 2025 में वेतनभोगियों को खुश कर दिया था। 12 लाख रुपये तक की सालाना आमदनी वालों को कोई टैक्स नहीं देना होगा, सरकारी कर्मियों ने इस घोषणा का स्वागत किया था। आयकर दाताओं को यह राहत न्यू टैक्स रिजीम के तहत देने की बात कही गई है। न्यू टैक्स रिजीम में टैक्सपेयर्स को 75000 रुपये के स्टैंडर्ड डिडक्शन का भी फायदा मिलेगा।
दिल्ली विधानसभा का चुनाव पांच फरवरी को हुआ था। मतदान से 72 घंटे पहले वेतन पाने वाले कर्मियों को 12 लाख रुपये तक टैक्स में छूट, यह घोषणा भाजपा के लिए दूसरा मास्टर स्ट्रोक साबित हो गई। डॉ मंजीत सिंह पटेल बताते हैं, निश्चित तौर पर भाजपा को दिल्ली विधानसभा चुनाव में टैक्स छूट की घोषणा का फायदा मिला है। वजह, दिल्ली में सबसे ज्यादा सरकारी और निजी क्षेत्र के कर्मचारी रहते हैं। इनके अलावा पेंशनर की संख्या भी लगभग पांच लाख है। इससे पहले सरकार ने गत माह सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए 8वें वेतन आयोग के गठन को मंजूरी दी थी। इसे भाजपा का पहला मास्टर स्ट्रोक बताया गया था।
केंद्र और राज्यों के कर्मचारी संगठन, लंबे समय से आठवें वेतन आयोग के गठन की मांग कर रहे थे। यह मुद्दा, संसद सत्र के दौरान भी उठाया गया था। संसद में भी सरकार ने दो टूक शब्दों में कह दिया था कि आठवें वेतन आयोग के गठन का अभी कोई विचार नहीं है। जनवरी में सरकार ने एकाएक इसकी घोषणा कर दी थी। केंद्र सरकार में बड़े कर्मचारी संगठनों के वरिष्ठ नेताओं का कहना था, जब सभी कर्मचारी संगठनों ने सरकार से आठवां वेतन आयोग गठित करने की मांग की थी तो सरकार ने इस पर कोई विचार नहीं किया। दरअसल, वेतन आयोग की घोषणा, दिल्ली विधानसभा चुनाव के मद्देनजर की गई।
दिल्ली में सात लाख से अधिक सरकारी कर्मचारी और पेंशनर हैं। इनमें पेंशनर की संख्या पांच छह लाख बताई जा रही है। दिल्ली के 22 विधानसभा क्षेत्रों में सरकारी कर्मचारी और पेंशनर, जीत हार के सूत्र बताए गए हैं। यानी इतने विधासभा क्षेत्रों में सरकारी कर्मचारियों और पेंशनरों का प्रभाव बताया जा रहा है। दिल्ली चुनाव से पहले आठवें वेतन आयोग की घोषणा कर भाजपा ने एक बड़ा दांव चल दिया था।
इससे पहले जब कभी कर्मचारी संगठनों ने आठवें वेतन आयोग के गठन की मांग की तो उन्हें निराशा हाथ लगी थी। यहां तक कि गत वर्ष संसद के शीतकालीन सत्र में सांसदों द्वारा केंद्र सरकार के कर्मचारियों और सशस्त्र बलों के लिए आठवें वेतन आयोग का गठन कब होगा, यह सवाल पूछा गया था। पिछले माह ने सरकार ने इसकी घोषणा कर दी। इसके बाद केंद्रीय बजट में 12 लाख रुपये तक की सालाना आमदनी वालों को टैक्स में छूट दी गई। दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा को इन दोनों घोषणाओं का भी फायदा मिला है।
कॉन्फेडरेशन ऑफ सेंट्रल गवर्नमेंट एम्प्लाइज एंड वर्कर्स के महासचिव एसबी यादव का कहना था, देखिये इस तरह की घोषणाओं का कुछ फायदा सरकार को मिलने की संभावना बनी रहती है। हालांकि इस तरह की छूट से यह मान लेना कि सभी कर्मचारी एक पार्टी विशेष के पक्ष में हो जाएंगे, ऐसा नहीं है। हां, इसका थोड़ा बहुत लाभ तो मिलना तय है। वोटिंग से 72 घंटे पहले टैक्स छूट की घोषणा की गई थी। उससे पहले आठवें वेतन आयोग के गठन की बात कही गई। भाजपा ने इन दोनों घोषणाओं को दिल्ली के चुनाव में भुनाया है। सरकारी व निजी क्षेत्र के कर्मियों तक टैक्स छूट और आठवें वेतन आयोग के गठन की घोषणा, इसे वोटों में तबदील करने का खूब प्रयास किया गया।