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SC के फैसले के बाद भी तमिलनाडु के सिनेमाघरों में बज रहा है राष्ट्रगान

Sat, 27 Jan 2018 04:12 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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राष्ट्रगान - फोटो : self
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राजधानी चेन्नई समेत तमिलनाडु के कई हिस्सों में सिनेमाघरों ने फिल्म दिखाने से पहले राष्ट्रगान बजाए जाने का विकल्प चुना है। सिनेमाघरों के प्रबंधन जारी यथास्थिति में किसी बदलाव तक इंतजार कर रहे हैं। दरअसल 9 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने आदेश में बदलाव करते हुए कहा था कि देशभर के सिनेमाघरों में राष्ट्रगान बजाना अनिवार्य नहीं है, यह वैकल्पिक है जब तक कि केंद्र सरकार द्वारा गठित कमेटी इस बारे में निर्णय नहीं ले लेती। सुप्रीम कोर्ट ने सिनेमाघर में राष्ट्रगान बजाना है या नहीं, इसे थियेटर प्रबंधन के विवेक पर छोड़ दिया था। 
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चेन्नई, कोयम्बटूर समेत कई दक्षिण भारतीय शहरों और मुंबई में मल्टीप्लेक्स चलाने वाले एसपीआई सिनेमा समूह के एक प्रतिनिधि ने बताया कि, प्रबंधन ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद 'चर्चा' की थी। एसपीआई के प्रतिनिधि ने नाम न छापने की गुजारिश के साथ बताया कि, "हमने राष्ट्रगान बजाना जारी रखने का फैसला किया क्योंकि हमारे ग्राहकों की तरफ से इसका कोई विरोध नहीं हुआ।" 

चेन्नई के दक्षिणी उपनगर में स्थित क्रोमपेट में मशहूर सिनेमाघर वेट्री थियेटर्स ने बताया कि, उन्होंने राष्ट्रगान बजाना जारी रखा क्योंकि वे कोई फैसला करने से पहले "स्थिति का जायजा लेना" चाहते थे। थिएटर प्रबंधन के एक प्रतिनिधि ने नाम न छापने के अनुरोध के साथ कहा कि, "हम थोड़ा इंतजार कर यह देखना चाहते थे कि क्या किसी को सुप्रीम कोर्ट के फैसले से कोई परेशानी तो नहीं। हम कुछ हफ्तों तक बजाना जारी रखेंगे और फिर फैसला करेंगे।" 
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कोयंबटूर में कार्तिक सिनेमा और मदुरई में अंबिगा सिनेमा जैसे लोकप्रिय सिनेमाघरों समेत पूरे तमिलनाडु में सिनेमाघर राष्ट्रगान बजाने के फैसले के साथ दृढ़ हैं। 
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सवाल यह है कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे?

अबिरामी सिनेमा के मालिक और तमिलनाडु थिएटर ओनर्स फेडरेशन के अध्यक्ष अबिरामी रामनाथन के मुताबिक उन्होंने महसूस किया कि फिल्म देखने वालों में देशभक्ति की भावना पैदा करने में उनकी भी एक भूमिका है। उन्होंने कहा, "मुझे नहीं लगता है कि हमारे संगठन का कोई भी सदस्य राष्ट्रगान बजाए जाने को रोक देने की इच्छा रखता है। लेकिन वे कोई भी विकल्प चुनने के लिए स्वतंत्र हैं।" 

जैसा कि रामनाथन ने दावा किया कि थियेटर प्रबंधन के पास विकल्प चुनने की आजादी है, सवाल यह है कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे? मद्रास हाईकोर्ट के वकील वी सुरेश के मुताबिक, थियेटर मालिकों के बीच अनिर्णय की स्थिति राजनीतिक हलकों में व्याप्त डर और असहिष्णुता की वजह से हो सकती है। हालांकि एसपीआई सिनेमा के प्रतिनिधि ने इससे इनकार किया कि राष्ट्रगान बजाना जारी रखने के लिए उनपर सड़कछाप समूहों या राजनीतिक हलकों से कोई दबाव था। 

दिग्गज अभिनेता कमल हासन ने यह टिप्पणी की थी कि वे चाहेंगे कि राष्ट्रगान को मौका-बेमौका किसी भी कार्यक्रम में और सिनेमा हॉल के अंदर नहीं बजाया जाए। 

राजनीतिक विश्लेषक आर मणिवन्नण के मुताबिक थिएटर मालिक रूढ़िवादी हैं और एक सुरक्षित रास्ता अपना रहे हैं। उन्होंने कहा कि, "सुप्रीम कोर्ट के फैसले में एक समस्या यह है कि राष्ट्रगान गाने का विकल्प तर्कसंगत रूप से फिल्म देखने पहुंची जनता के पास भी होना चाहिए था। अगर लोग सिनेमाघर के अंदर अपनी देशभक्ति दिखाना नहीं पसंद करते हैं, तो उन्हें सिनेमाघर वालों से सवाल करना चाहिए।" 
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