दिल्ली आईसीएमआर में शोध प्रबंधन, नीति योजना और संचार विभाग के प्रमुख डॉ रजनीकांत श्रीवास्तव ने अमर उजाला से कहा कि लॉकडाउन लगाना है या नहीं, ये पूरी तरह से राज्य सरकार पर निर्भर करता है। राज्य सरकार को पता है कि लॉकडाउन लगाने से उनके राज्य की अर्थव्यवस्था कितनी प्रभावित होने वाली है। या अगर वे लॉकडाउन लगाने का फैसला लेते हैं, तो उन्हें कितनी सुरक्षा मिलती है।
ऐसे भी तोड़ सकते हैं कोरोना चेन
डॉ. श्रीवास्तव ने कहा कि पिछले वर्ष की तुलना में इस बार की परिस्थितियों में बहुत फर्क है। पिछले वर्ष हमारे पास संसाधनों की कमी थी। लोगों को पता ही नहीं था कि कोरोना कितनी खतरनाक बीमारी है। आज लोगों को पता है और लोग डर भी रहे हैं। सरकार लॉकडाउन की बजाए सोशल गैदरिंग कम करके भी कोरोना को रोक सकती है। लोगों में वन-टू-वन कनेक्शन जितना कम होगा उतना कोरोना की चेन टूटने की संभावना होती है।
डॉ.जुगल किशोर ने कहा कि आज कई रिसर्च में सामने आ रहा है कि वायरस हवा के साथ पर्सनल टच से भी बढ़ रहा है। ऐसे में अगर संपूर्ण लॉकडाउन लगता भी है तो इसका ज्यादा फर्क नहीं होगा। बीते दस से 15 दिनों में जो लोग कोरोना संक्रमित हुए हैं, उनके केस तो सामने आएंगे ही। लॉकडाउन लगाने के कारण सब कुछ बंद हो जाएगा। ऐसे में मरीजों को घरों से अस्पताल लाने में बेहद दिक्कत होगी। जिससे अस्पताल का प्रबंधन ओर बिगड़ जाएगा। अब लॉकडाउन लगाना अच्छा विचार नहीं है। इसके बजाए हमें अस्पतालों में संसाधन जुटाने पर फोकस करना चाहिए।
सबको पता था दूसरी लहर आएगी
डॉ. जुगल किशोर ने कहा कि देश में कोरोना की दूसरी लहर आएगी ये विशेषज्ञों और केंद्र-राज्य सरकार सभी को पता था। हमारे पास स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने के लिए पर्याप्त समय भी था, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। शहरों में जो भी अस्थाई हॉस्पिटल शुरु हुए थे वो थोड़े समय बाद ही बंद कर दिए गए। इन सेंटर को बंद करने से बहुत नुकसान हुआ है क्योंकि अब हम उतनी तेजी से इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा नहीं कर पा रहे हैं।
गौरतलब है कि सीआईआई ने रविवार रात एक बयान जारी कर सरकार से आग्रह किया है कि वह लॉकडाउन को लेकर कोई कदम उठाए। महामारी की मौजूदा स्थिति को देखते हुए लोगों का जीवन बचाना सबसे बड़ी प्राथमिकता होना चाहिए। राष्ट्रीय स्तर पर वायरस के विस्तार पर रोक लगाने के लिए अधिकतम कार्रवाई की जरुरत है।