फ्रांस में किए गए अध्ययन के अनुसार जैविक कचरे को संसाधित करके उसे मूल्यवान पोषक उत्पादों में बदलने के लिए विभिन्न नवाचारों पर आधारित हैं। जैसे कीट पालन (इंसेक्ट फार्मिंग), इसके जरिए कृषि अवशेषों और खाद्य अपशिष्ट पर कीटों को पाला जाता है, जिनका उपयोग पशु आहार या मानव आहार के रूप में किया जा सकता है।
जैविक कचरे को उपयोगी पोषक तत्व में बदलने के लिए पर्यावरणविदों ने ‘अपशिष्ट से पोषण तकनीक’ विकसित की है। इसका उद्देश्य कृषि, वानिकी और भोजन से उत्पन्न जैविक कचरे को उपयोगी पोषक तत्वों या खाद्य स्रोतों में परिवर्तित करना है ताकि मनुष्य या पशु इसका उपभोग कर सकें। इससे न केवल बेहतर ढंग से कचरे का निपटान होगा बल्कि पर्यावरणीय प्रभावों में भी उल्लेखनीय कमी आएगी।
फ्रांस में किए गए अध्ययन के अनुसार जैविक कचरे को संसाधित करके उसे मूल्यवान पोषक उत्पादों में बदलने के लिए विभिन्न नवाचारों पर आधारित हैं। जैसे कीट पालन (इंसेक्ट फार्मिंग), इसके जरिए कृषि अवशेषों और खाद्य अपशिष्ट पर कीटों को पाला जाता है, जिनका उपयोग पशु आहार या मानव आहार के रूप में किया जा सकता है। ठोस किण्वन (सॉलिड स्टेट फर्मेंटेशन) इसमें यीस्ट जैसे सूक्ष्मजीवों की सहायता से खाद्य सह-उत्पादों को पोषण सामग्री में बदला जाता है। इसके अलावा पौधों से प्रोटीन निष्कर्षण यानी वनस्पति अपशिष्ट से सीधे प्रोटीन प्राप्त किए जाते हैं, जिन्हें आहार अनुपूरक के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। इसी तरह माइक्रोप्रोटीन और माइक्रोबियल प्रोटीन उत्पादन भी किया जा सकता है। इसके तहत फफूंद और बैक्टीरिया जैसे सूक्ष्मजीवों के माध्यम से प्रोटीन तैयार किए जाते हैं, जो वैकल्पिक प्रोटीन स्रोतों के रूप में प्रयोग किए जा सकते हैं। यह अध्ययन नेचर सस्टेनेबिलिटी में प्रकाशित हुआ है।
नवाचारों की पर्यावरणीय दक्षता पर कई कारक निर्भर
अध्ययन से यह बात सामने आई कि इन नवाचारों की पर्यावरणीय दक्षता पर कई कारक निर्भर करते हैं, विशेष रूप से यह कि उपभोक्ता इन उत्पादों को कितनी स्वीकृति देते हैं। यदि इन तकनीकों से तैयार प्रोटीन का उपयोग बड़े पैमाने पर मांस की जगह किया जाए, कम से कम 80 फीसदी प्रतिस्थापन (रिप्लेसमेंट) तभी इनसे पर्यावरणीय लाभ अधिक हो सकते हैं। सीधे जैविक कचरे को पशु आहार के रूप में उपयोग करना अब भी एक अत्यंत प्रभावी और कम खर्चीला तरीका है।