जलवायु परिवर्तन (सांकेतिक तस्वीर)
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एक ओर जहां दुनियाभर में जलवायु परिवर्तन की भयावहता पर बहस जारी है, वहीं अब यह साफ होता जा रहा है कि समाज के कुछ विशेष वर्ग विशेषकर महिलाएं, युवा, वामपंथी विचारधारा वाले और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील लोग इस संकट को लेकर सबसे अधिक चिंता महसूस कर रहे हैं।
एक अंतरराष्ट्रीय मेटा-विश्लेषण में यह बात उभरकर सामने आई है कि जलवायु परिवर्तन को लेकर उत्पन्न मानसिक चिंता न केवल एक नई मनोवैज्ञानिक स्थिति है बल्कि यह भावनात्मक अस्थिरता के साथ-साथ बदलाव की प्रेरणा का भी स्रोत बन सकती है। जर्मनी की लीपजिग यूनिवर्सिटी और टीयू डॉर्टमुंड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए इस मेटा-विश्लेषण में 94 प्रमुख अध्ययनों को शामिल किया है, जिसमें 27 देशों के 1,70,747 प्रतिभागी शामिल थे। इससे यह स्पष्ट हुआ कि जलवायु चिंता, सामान्य चिंता से अलग एक अनोखी मानसिक स्थिति है। अब यह वैश्विक चेतना और नीति निर्माण का एक अनिवार्य हिस्सा बनती जा रही है। शोध में स्पष्ट हुआ कि जलवायु परिवर्तन को लेकर गंभीर रूप से चिंतित लोगों में प्रमुख रूप से महिलाएं, युवा और वे लोग शामिल हैं जो पर्यावरण के प्रति गहरी संवेदनशीलता रखते हैं। अध्ययन अंतरराष्ट्रीय जर्नल ग्लोबल एनवायर्नमेंटल चेंज में प्रकाशित किया गया है। शोध में सामने आया कि अधिकतर अध्ययन विकसित देशों में केंद्रित थे, जबकि जलवायु परिवर्तन के सर्वाधिक प्रभाव विकासशील देशों यानी ग्लोबल साउथ में देखने को मिलते हैं। ऐसे में वैज्ञानिकों ने विशेष रूप से इन देशों में जलवायु चिंता पर और अधिक शोध की आवश्यकता जताई है।
राजनीतिक और सामाजिक नेतृत्व की जिम्मेदारी
अध्ययन में जुड़े एक अन्य वैज्ञानिक हेंस जैचर का कहना है कि जलवायु चिंता को नजरअंदाज करना खतरनाक होगा। यह हमें केवल डर नहीं दिखाती, बल्कि सचेत करती है कि अभी भी समय है कि हम बदलाव करें। उन्होंने नेताओं, नीति निर्माताओं, मीडिया और उद्योगपतियों से आह्वान किया कि वे जनमानस में उभर रही इस चिंता को समझें और इसे नीतियों में बदलाव की सकारात्मक दिशा में ले जाएं। इसके साथ ही युवाओं और पर्यावरणीय संकट का बार-बार सामना कर रहे समुदायों को मानसिक और भावनात्मक सहयोग की आवश्यकता पर भी बल दिया गया।