पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा भले ही भारत के साथ बातचीत का मार्ग अपना रहे हों लेकिन अपनी सरजमीं से आतंकी नेटवर्क को खत्म करना ही उनकी गंभीरता का लिटमस टेस्ट होगा।
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) और बैक चैनल के जरिये विभिन्न स्तर पर चल रही बातचीत में भारत ने एक बार फिर अपना रुख साफ कर दिया है। भारत का साफ तौर पर कहना है कि हाफिज सईद और मसूद अजहर जैसे आतंकी सरगनाओं का सफाया ही यह तय करेगा कि बाजवा की बातचीत की पहल गंभीर कदम है या फिर मात्र छलावा।
बैक चैनल से जुड़े वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, जहां तक मौजूदा भारत-पाकिस्तान की बातचीत का सवाल है तो जनरल बाजवा की विश्वसनीयता इमरान खान से ज्यादा मानी जा रही है।
हालांकि यह अफसोसजनक है कि एक लोकतांत्रिक देश को दूसरे देश की चुनी हुई सरकार की जगह वहां के सैन्य नेतृत्व पर भरोसा करना पड़ रहा है। जनरल बाजवा अगर वाकई भारत के साथ लंबे रिश्ते के लिए गंभीर हैं तो उन्हें अपने यहां आतंकी नेटवर्क को खत्म करने का साहसिक कदम उठाना ही होगा।
सेना सूत्रों के मुताबिक, पिछले साल हुए संघर्ष विराम उल्लंघन के पीछे मुख्य वजह कश्मीर घाटी में आतंकवादी भेजना था। भारतीय सेना ने इस बार अप्रत्याशित जवाबी कार्रवाई की जिसकी पाकिस्तान की सेना को उम्मीद नहीं थी। उधर अमेरिका और पश्चिमी देशों के अलावा सऊदी अरब जैसे पुराने साथियों ने भी पाकिस्तान को अलग थलग कर दिया है।
सूत्रों का कहना है कि पाकिस्तान में सेना की हरी झंडी के बिना चुनी हुई सरकार भारत के साथ संबंधों को लेकर कोई बड़ा फैसला नहीं ले सकती है। यह अच्छी बात है कि इस बार बातचीत की पहल सेना की तरफ से ही हुई है।
सूत्रों ने बताया कि पाकिस्तान सरकार अपनी छवि को सुधारने के लिए पुरजोर कोशिश कर रही है ताकि 20वां सार्क सम्मेलन उसी की जमीन पर हो और नरेंद्र मोदी समेत सभी सदस्य देशों के प्रमुख शिरकत करें। पाकिस्तान में होने वाले पिछले19वें सार्क सम्मेलन का सभी सदस्य देशों ने आतंकवाद की वजह से बहिष्कार कर दिया था। इस बार भी भारत की तरफ से ही सबसे ज्यादा विरोध की आशंका है। पाकिस्तान की ताजा पहल को इससे जोड़ कर भी देखा जा रहा है।