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Encounters: क्यों सवालों के घेरे में रहता है हर एनकाउंटर, देश में सबसे ज्यादा फर्जी मुठभेड़ कहां हुई हैं?

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिवेंद्र तिवारी Updated Fri, 14 Apr 2023 05:54 PM IST

सार

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पिछले छह वर्षों में, उत्तर प्रदेश पुलिस ने राज्यभर में 10,713 मुठभेड़ों में 178 अपराधियों या अभियुक्तों को मार गिराया है। इन मुठभेड़ों में मरने वाले कई गंभीर अपराधों में आरोपी थे।
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एनकाउंटर - फोटो : AMAR UJALA
उमेश पाल की हत्या में शामिल माफिया अतीक अहमद के बेटे असद और शूटर गुलाम को गुरुवार को मार गिराया गया। यूपी एसटीएफ की एक टीम ने इन दोनों को झांसी में ढेर कर दिया। असद और गुलाम पर पुलिस ने पांच लाख रुपये का इनाम घोषित किया था। इसी बीच, प्रदेश सहित देशभर में एनकाउंटर पर राजनीति भी शुरू हो गई है। सपा अध्यक्ष अखिलेश ने मुठभेड़ को फर्जी करार दिया है। बसपा प्रमुख मायावती और AIMIM प्रमुख ओवैसी ने भी इस पर सवाल उठाए हैं।
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एनकाउंटर - फोटो : AMAR UJALA
उमेश पाल की हत्या में शामिल माफिया अतीक अहमद के बेटे असद और शूटर गुलाम को गुरुवार को मार गिराया गया। यूपी एसटीएफ की एक टीम ने इन दोनों को झांसी में ढेर कर दिया। असद और गुलाम पर पुलिस ने पांच लाख रुपये का इनाम घोषित किया था। इसी बीच, प्रदेश सहित देशभर में एनकाउंटर पर राजनीति भी शुरू हो गई है। सपा अध्यक्ष अखिलेश ने मुठभेड़ को फर्जी करार दिया है। बसपा प्रमुख मायावती और AIMIM प्रमुख ओवैसी ने भी इस पर सवाल उठाए हैं।

अखिलेश यादव, मायावती और असदुद्दीन ओवैसी। - फोटो : Amar Ujala
असद और गुलाम के एनकाउंटर पर क्या बोले राजनीतिक दल?
उमेशपाल के हत्यारों के एनकाउंटर पर कई राजनीतिक दलों ने सवाल खड़े किए हैं। सपा नेता अखिलेश यादव ने कहा कि झूठे एनकाउंटर करके भाजपा सरकार सच्चे मुद्दों से ध्यान भटकाना चाह रही है। भाजपाई न्यायालय में विश्वास ही नहीं करते हैं। उन्होंने आगे कहा कि इस एनकाउंटर व हालिया एनकाउंटरों की भी गहन जांच-पड़ताल हो व दोषियों को छोड़ा न जाए। सही-गलत के फैसलों का अधिकार सत्ता का नहीं होता है। भाजपा भाईचारे के खिलाफ है।

वहीं बसपा सुप्रीमो मायावती ने कहा, 'प्रयागराज के अतीक अहमद के बेटे व एक अन्य की पुलिस मुठभेड़ में हुई हत्या पर अनेकों प्रकार की चर्चायें गर्म हैं। लोगों को लगता है कि विकास दुबे काण्ड के दोहराए जाने की उनकी आशंका सच साबित हुई है। अतः घटना के पूरे तथ्य व सच्चाई जनता के सामने आ सके इसके लिए उच्च-स्तरीय जांच जरूरी है।'

यूपी में एनकाउंटर के आंकड़े क्या कहते हैं?
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के पिछले छह वर्षों में, उत्तर प्रदेश पुलिस ने राज्यभर में 10,713 मुठभेड़ों में 178 अपराधियों या अभियुक्तों को मार गिराया है। इन मुठभेड़ों में मरने वाले कई गंभीर अपराधों में आरोपी थे।

एनकाउंटर - फोटो : AMAR UJALA
मेरठ पुलिस ने सबसे ज्यादा एनकाउंटर किए
जिलेवार विश्लेषण से पता चलता है कि मेरठ पुलिस ने सबसे ज्यादा पुलिस एनकाउंटर किए। जिले में 3,152 मुठभेड़ हुई, जिसमें 63 अपराधी मारे गए और 1,708 अन्य घायल हुए। इन मुठभेड़ों के दौरान, एक पुलिसकर्मी की मौत हो गई, जबकि 401 अन्य पुलिसकर्मी घायल हो गए। इन मुठभेड़ों के चलते पुलिस 5,967 अपराधियों को गिरफ्तार करने में सफल रही।

मेरठ के बाद आगरा में सबसे ज्यादा पुलिस एनकाउंटर हुए। जिले में 1,844 एनकाउंटर हुए। पुलिस ने पिछले छह वर्षों में आगरा में 14 अपराधियों को मार गिराया गया।4,654 अन्य को गिरफ्तार किया गया। इन मुठभेड़ों में 55 पुलिसकर्मी आंशिक या गंभीर रूप से घायल हुए। आगरा के बाद, बरेली में 1,497 मुठभेड़ दर्ज की गईं, जिसमें सात अपराधी मारे गए और 3,410 अन्य को गिरफ्तार किया गया। बरेली में हुई इन मुठभेड़ों में 296 पुलिसकर्मी और 437 अपराधी घायल हुए, जबकि एक पुलिसकर्मी की जान चली गई।

एनकाउंटर - फोटो : AMAR UJALA
योगी के आने के बाद बढ़ी एनकाउंटर की संख्या 
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के हवाले से राज्यसभा में गृह मंत्रालय ने जानकारी दी कि यूपी में अप्रैल 2016 से अप्रैल 2017 तक एनकाउंटर में मौत के चार मामले दर्ज किए गए। मार्च 2017 में राज्य में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनते ही अचानक एनकाउंटर बढ़ गए। अप्रैल 2017 से अप्रैल 2018 तक मुठभेड़ों में 44 अपराधियों की मौत हुई। अप्रैल 2018 से अप्रैल 2019 तक मुठभेड़ों में 22, अप्रैल 2019 से अप्रैल 2020 तक 26, अप्रैल 2020 से अप्रैल 2021 तक 16, अप्रैल 2021 से अप्रैल 2022 तक नौ की जान गई।

एनकाउंटर - फोटो : AMAR UJALA
क्या फेक एनकाउंटर हुए हैं, यदि हां तो कितने?
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के आंकड़ों की मानें तो फर्जी मुठभेड़ के मामले में यूपी देश में पहले स्थान पर है। 2010 से इस साल पांच जनवरी के बीच यूपी में फर्जी मुठभेड़ों के संबंध में 211 मामले दर्ज किए गए हैं। एक आरटीआई के जवाब में आयोग ने बताया कि उत्तर प्रदेश के बाद, असम में फेक एनकाउंटर के दूसरे सबसे ज्यादा 68 मामले आए।  

एनएचआरसी ने आरटीआई एक्टिविस्ट हिमांशु नायक द्वारा दायर एक आरटीआई आवेदन का जवाब देते हुए कहा कि उसने 2010 और 5 जनवरी, 2023 के बीच देशभर में फर्जी मुठभेड़ों के संबंध में 841 मामले दर्ज किए हैं। पिछले 13 साल के आंकड़ों को देखें तो असम में सबसे ज्यादा पुलिस मुठभेड़ में 436 अपराधियों की मौत हुई है। इसके बाद, यूपी में एनकाउंटर में 231 अपराधियों की जान गई।

IPC CRPC - फोटो : अमर उजाला
क्या कानून में एनकाउंटर का जिक्र है?
भारतीय कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो अपराधियों के मुठभेड़ों को सीधे तौर पर वैध ठहराता हो। हालांकि, कुछ प्रावधान हैं जिनकी अलग-अलग व्याख्या की जा सकती है, ताकि पुलिस को अपराधियों से निपटने के लिए कुछ शक्तियां प्रदान की जा सकें। लगभग सभी मामलों में जहां एनकाउंटर होता है, उनमें पुलिस 'आत्मरक्षा' के लिए कार्रवाई करती है। भारतीय दंड संहिता की धारा 96 में कहा गया है कि निजी प्रतिरक्षा के अधिकार के प्रयोग में की गई कोई भी कार्रवाई अपराध नहीं है। हालांकि, धारा 99 बताती है कि रक्षा के लिए जरूरत से ज्यादा क्षति पहुंचाने वाले बचाव नहीं हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो बल का प्रयोग संतुलित होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला
क्या कहते हैं सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश?
झांसी में हुई पुलिस मुठभेड़ के बाद पुलिस एनकाउंटर को लेकर जारी किए गए सुप्रीम कोर्ट के नौ साल पुराने दिशा-निर्देश भी चर्चा का विषय बन गये हैं। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने 2014 के एक फैसले में पुलिस मुठभेड़ों, जिसमें मृत्यु या गंभीर चोट लगी हो, की जांच के मामलों में पालन किए जाने वाले दिशा-निर्देशों की एक श्रृंखला जारी करते हुए कहा था कि पुलिस मुठभेड़ों में हत्याएं कानून के शासन की विश्वसनीयता और आपराधिक न्याय प्रणाली के प्रशासन को प्रभावित करती हैं। कोर्ट का यह फैसला पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज और अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य के मामले में आया था।

ये दिशा-निर्देश किए थे जारी 
सितंबर 2014 के अपने फैसले में शीर्ष अदालत ने कई दिशा-निर्देश जारी किए थे। जिसमें यह भी शामिल था कि जब भी पुलिस को आपराधिक गतिविधियों या गंभीर अपराध से संबंधित गतिविधियों के बारे में कोई खुफिया सूचना या जानकारी मिलती है, तो लिखित रूप में काम किया जाना चाहिए, चाहे वह विशेष रूप से केस डायरी में हो या किसी इलेक्ट्रॉनिक रूप में।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यदि कोई आगाह करता है या खुफिया जानकारी मिलती है दोनों के अनुसार मुठभेड़ होती है और पुलिस बल द्वारा आग्नेयास्त्र का उपयोग किया जाता है और उसके परिणामस्वरूप मृत्यु होती है, तो उस आशय की एक प्राथमिकी दर्ज की जाएगी और उसे बिना किसी देरी के सीआरपीसी की धारा 157 के तहत अदालत में भेज दिया जाएगा।

अदालत ने कहा था कि घटना/मुठभेड़ की एक स्वतंत्र जांच सीआईडी या किसी अन्य पुलिस स्टेशन की पुलिस टीम द्वारा एक वरिष्ठ अधिकारी (मुठभेड़ में शामिल पुलिस दल के प्रमुख से कम से कम एक रैंक ऊपर) की देखरेख में की जाएगी।

जांच करने वाली टीम कम से कम पीड़ित की पहचान करने, खून से सने मिट्टी, बाल, रेशे और धागे आदि सहित मौत से संबंधित साक्ष्य सामग्री को बरामद करने और संरक्षित करने की कोशिश करेगी। चश्मदीद गवाहों की पहचान करेगी और उनके बयान जुटाएगी (मुठभेड़ में शामिल पुलिस कर्मियों के बयानों सहित) और मौत के कारण, तरीके, स्थान और समय के साथ-साथ किसी भी पैटर्न या अभ्यास का निर्धारण करेगी, जो मौत का कारण हो सकता है।
  • शीर्ष अदालत ने कहा था कि सीआरपीसी की धारा 176 के तहत पुलिस फायरिंग के दौरान मौत के सभी मामलों में अनिवार्य रूप से एक मजिस्ट्रेटी जांच की जानी चाहिए और इसकी रिपोर्ट न्यायिक मजिस्ट्रेट को भेजी जानी चाहिए, जो धारा 190 के तहत अधिकार क्षेत्र में आती है।
  • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की भागीदारी तब तक आवश्यक नहीं है जब तक कि स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच के बारे में गंभीर संदेह न हो। हालांकि, घटना की जानकारी बिना किसी देरी के, NHRC या राज्य मानवाधिकार आयोग को भेजी जानी चाहिए, चाहे मामला जैसा भी हो।
  • घायल अपराधी/पीड़ित को चिकित्सा सहायता प्रदान की जानी चाहिए और उसका बयान मजिस्ट्रेट या चिकित्सा अधिकारी द्वारा फिटनेस प्रमाण पत्र के साथ दर्ज किया जाना चाहिए।
  • दिशा-निर्देशों में कहा गया है, घटना की पूरी जांच के बाद रिपोर्ट को सीआरपीसी की धारा 173 के तहत सक्षम अदालत को भेजा जाना चाहिए। जांच अधिकारी द्वारा प्रस्तुत चार्जशीट के अनुसार मुकदमे को जल्द से जल्द पूरा किया जाना चाहिए। मृत्यु की स्थिति में, कथित अपराधी/पीड़ित के निकट संबंधी को जल्द से जल्द सूचित किया जाना चाहिए।
  • अगर जांच के निष्कर्ष में रिकॉर्ड में आने वाली सामग्री या साक्ष्य से पता चलता है कि मौत भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत अपराध में आग्नेयास्त्र के इस्तेमाल से हुई है, तो ऐसे अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई तुरंत शुरू की जानी चाहिए और उसे निलंबित किया जाना चाहिए।
  • पुलिस मुठभेड़ में मारे गए पीड़ित के आश्रितों को दिए जाने वाले मुआवजे के संबंध में सीआरपीसी की धारा 357-ए के तहत प्रदान की गई योजना को लागू किया जाना चाहिए।
  • शीर्ष अदालत ने यह भी कहा था कि मुठभेड़ की घटना के तुरंत बाद संबंधित अधिकारियों को पदोन्नति या तत्काल वीरता पुरस्कार नहीं दिया जाएगा।
  • यदि पीड़ित के परिवार को पता चलता है कि उपरोक्त प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है या उपरोक्त वर्णित किसी भी पदाधिकारी द्वारा दुर्व्यवहार या स्वतंत्र जांच या निष्पक्षता की कमी का एक पैटर्न मौजूद है, तो वह घटना स्थल के क्षेत्राधिकार में आने वाले सत्र न्यायाधीश को शिकायत कर सकता है।

हैदराबाद एनकाउंटर - फोटो : PTI
चर्चित एनकाउंटर जो बाद में फर्जी निकले
पिछले कुछ वर्षों में ऐसे कई मामले आए हैं जहां न्यायिक प्रक्रिया में मुठभेड़ों को फर्जी करार दिया गया है। 2019 में हैदराबाद में एक डॉक्टर के सामूहिक दुष्कर्म और हत्या मामले में चार संदिग्धों की कथित मुठभेड़ में हुई हत्या पर पुलिस पर उंगली उठाई गई थी। फरवरी 2022 में, हैदराबाद मुठभेड़ पर सुप्रीम कोर्ट के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय जांच आयोग ने रिपोर्ट दी कि पुलिसकर्मियों द्वारा की गई गोलीबारी कथित रूप से जानबूझकर की गई थी।

2003 में, गुजरात पुलिस ने जमाल नामक व्यक्ति को गोली मार दी, यह दावा करते हुए कि वह तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और अन्य शीर्ष भाजपा नेताओं पर हमले की योजना बना रहा था। सीबीआई जांच में मुठभेड़ फर्जी निकली और मामले में कई पुलिस निरीक्षकों और आईबी के शीर्ष अधिकारियों से पूछताछ की गई और बाद में आरोपी बनाए गए।

राम नारायण गुप्ता उर्फ 'लखन भैया', जो कथित रूप से गैंगस्टर छोटा राजन का सहयोगी था, को 2006 में मुंबई पुलिस ने फर्जी मुठभेड़ में मार दिया था। मुठभेड़ के बाद, मुंबई की एक सत्र अदालत ने 2013 में 13 पुलिसकर्मियों सहित 21 लोगों को गुप्ता की हत्या करने और उन्हें अपहरण करने की साजिश रचने का दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। हालांकि, एक आरोपी एनकाउंटर स्पेशलिस्ट प्रदीप शर्मा को बरी कर दिया गया।

एक और मामला जिसने सुर्खियां बटोरी वह एमबीए छात्र रणबीर सिंह का था। इस मुठभेड़ मामले में, दिल्ली उच्च न्यायालय ने फरवरी 2018 में निचली अदालत के उस आदेश को बरकरार रखा था जिसमें 2009 में देहरादून में एक फर्जी मुठभेड़ में 22 वर्षीय छात्र की हत्या के लिए सात पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराया गया था और उम्रकैद की सजा दी गई थी। पुलिसकर्मियों को रणबीर के अपहरण और हत्या की साजिश में शामिल होने का दोषी ठहराया गया था।

क्यों उठे हैं एनकाउंटर पर सवाल?
ज्यूडिशिकल किलिंग या 'मुठभेड़' में हत्याएं दशकों से एक विवादित पुलिस प्रक्रिया रही हैं। पुलिस द्वारा इस तरह की कार्रवाई के दौरान पालन की जाने वाली उचित प्रक्रियाओं पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) और सुप्रीम कोर्ट ने लगातार ऐसे सवाल उठाए हैं। आलोचक कई बार आरोप लगाते हैं कि पुलिस संदिग्धों को मारने के अवसर के रूप में 'फर्जी मुठभेड़' करती है। हैदराबाद मुठभेड़ में भी ऐसा ही कुछ देखने को मिला था।
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