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बिहार: लीची नहीं कुपोषण है जानलेवा, सोचने पर मजबूर कर देगी ये रिपोर्ट

अनिल पांडेय, नई दिल्ली Published by: अनिल पांडेय Updated Thu, 20 Jun 2019 06:19 PM IST
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कुपोषण की वजह से फैल रहा दिमागी बुखार - फोटो : PTI

पिछले कुछ वर्षों से हमारे देश में गर्मियां आते ही सबसे ज्यादा अगर कुछ सुर्खियों में आ रहा है तो वो है एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (AES) जैसी घातक बीमारी। चमकी बुखार या दिमागी बुखार कही जाने वाली इस बीमारी ने बिहार में कोहराम मचा रखा है। दावा किया जा रहा है कि गर्मियों का फल लीची खाने से यह बीमारी बच्चों की जान ले रही है। मेडिकल रिपोर्ट्स में भी कहा जा रहा है कि कच्ची और अधपकी लीची खाने से बच्चों को यह बीमारी हो रही है। लेकिन एक सच यह भी है कि इस बीमारी की चपेट में सबसे ज्यादा गरीब बच्चे ही आ रहे हैं।

पर क्या किसी ने यह सोचा है कि लीची जैसा मीठा फल जानलेवा बीमारी की वजह कैसे बन सकता है? अगर दिमागी बुखार से होने वाली मौतों की रिपोर्ट को देखें तो पता चलता है कि मौत के मुंह में समा गए अधिकांश बच्चे कुपोषण या खाली पेट रहने की वजह से इसकी चपेट में आए थे। कुपोषण के मामले में हमारे देश की स्थिति बेहद खराब है। देश के लगभग सभी राज्यों में कुपोषित बच्चों की संख्या अच्छी खासी हैं। राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स से भी देश को शर्मिंदा होना पड़ता है। 

कुपोषित बच्चों को लीची से है सर्वाधिक खतरा

बिहार और उत्तर प्रदेश के वो क्षेत्र जहां लीची की पैदावार सबसे ज्यादा होती है, वहां गर्मी के चरम पर पहुंचने और मानसून के शुरू होते ही हर साल एईएस से बच्चों की मौतों की खबर आने लगती है। चिंताजनक पहलू यह है कि पिछले 24 वर्षों में इस बीमारी से बचने के लिए कोई विशेष शोध या उपाय नहीं किए गए हैं।



इस बारे में विश्व की प्रसिद्ध पत्रिका द लांसेट ग्लोबल हेल्थ जर्नल में एक विशिष्ट शोध प्रकाशित किया गया था। इसके अनुसार लीची में हायपोग्लायसिन-ए और मेथिलीन साइक्लोप्रोपाइल ग्लाइसीन होते हैं, जो कुपोषित बच्चों के खून में शुगर का लेवल बहुत कम कर देते हैं। द लांसेट के मुताबिक यह खतरा तब और बढ़ जाता है जब इन कुपोषित बच्चों को पिछली रात भोजन नहीं मिला होता है और दूसरे दिन सुबह अपनी भूख मिटाने के लिए वे लीची के बागानों में गिरे हुए अधपके या पके फल उठाकर खा लेते हैं।

बच्चों में घातक मेटाबॉलिक बीमारी

वैसे लीची हमारे शरीर के लिए लाभप्रद भी है क्योंकि इसमें मौजूद विटमिन, लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण और पाचन-प्रक्रिया के लिए जरूरी है। इसमें मौजूद फोलेट हमारे शरीर में कॉलेस्ट्रॉल के स्तर को नियंत्रित रखने में मदद करता है। यह हमारे तंत्रिका तंत्र को स्वस्थ रखने में मदद पहुंचाता है। लीची में कार्बोहाइड्रेट, विटमिन सी, विटमिन ए और बी कॉम्प्लेक्स, पोटैशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम, फॉस्फोरस, आयरन जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं।

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कुपोषण की वजह से फैल रहा दिमागी बुखार - फोटो : PTI
पिछले कुछ वर्षों से हमारे देश में गर्मियां आते ही सबसे ज्यादा अगर कुछ सुर्खियों में आ रहा है तो वो है एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (AES) जैसी घातक बीमारी। चमकी बुखार या दिमागी बुखार कही जाने वाली इस बीमारी ने बिहार में कोहराम मचा रखा है। दावा किया जा रहा है कि गर्मियों का फल लीची खाने से यह बीमारी बच्चों की जान ले रही है। मेडिकल रिपोर्ट्स में भी कहा जा रहा है कि कच्ची और अधपकी लीची खाने से बच्चों को यह बीमारी हो रही है। लेकिन एक सच यह भी है कि इस बीमारी की चपेट में सबसे ज्यादा गरीब बच्चे ही आ रहे हैं।

पर क्या किसी ने यह सोचा है कि लीची जैसा मीठा फल जानलेवा बीमारी की वजह कैसे बन सकता है? अगर दिमागी बुखार से होने वाली मौतों की रिपोर्ट को देखें तो पता चलता है कि मौत के मुंह में समा गए अधिकांश बच्चे कुपोषण या खाली पेट रहने की वजह से इसकी चपेट में आए थे। कुपोषण के मामले में हमारे देश की स्थिति बेहद खराब है। देश के लगभग सभी राज्यों में कुपोषित बच्चों की संख्या अच्छी खासी हैं। राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स से भी देश को शर्मिंदा होना पड़ता है। 

कुपोषित बच्चों को लीची से है सर्वाधिक खतरा

बिहार और उत्तर प्रदेश के वो क्षेत्र जहां लीची की पैदावार सबसे ज्यादा होती है, वहां गर्मी के चरम पर पहुंचने और मानसून के शुरू होते ही हर साल एईएस से बच्चों की मौतों की खबर आने लगती है। चिंताजनक पहलू यह है कि पिछले 24 वर्षों में इस बीमारी से बचने के लिए कोई विशेष शोध या उपाय नहीं किए गए हैं।

इस बारे में विश्व की प्रसिद्ध पत्रिका द लांसेट ग्लोबल हेल्थ जर्नल में एक विशिष्ट शोध प्रकाशित किया गया था। इसके अनुसार लीची में हायपोग्लायसिन-ए और मेथिलीन साइक्लोप्रोपाइल ग्लाइसीन होते हैं, जो कुपोषित बच्चों के खून में शुगर का लेवल बहुत कम कर देते हैं। द लांसेट के मुताबिक यह खतरा तब और बढ़ जाता है जब इन कुपोषित बच्चों को पिछली रात भोजन नहीं मिला होता है और दूसरे दिन सुबह अपनी भूख मिटाने के लिए वे लीची के बागानों में गिरे हुए अधपके या पके फल उठाकर खा लेते हैं।

बच्चों में घातक मेटाबॉलिक बीमारी

वैसे लीची हमारे शरीर के लिए लाभप्रद भी है क्योंकि इसमें मौजूद विटमिन, लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण और पाचन-प्रक्रिया के लिए जरूरी है। इसमें मौजूद फोलेट हमारे शरीर में कॉलेस्ट्रॉल के स्तर को नियंत्रित रखने में मदद करता है। यह हमारे तंत्रिका तंत्र को स्वस्थ रखने में मदद पहुंचाता है। लीची में कार्बोहाइड्रेट, विटमिन सी, विटमिन ए और बी कॉम्प्लेक्स, पोटैशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम, फॉस्फोरस, आयरन जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं।

एंडोसल्फान का प्रयोग भी मौत की बन रही वजह

बांग्लादेशी वैज्ञानिकों ने भी लीची खाने से मरने वाले बच्चों पर एक शोध किया है और उसके अनुसार लीची की खेती में प्रतिबंधित एंडोसल्फान समेत अन्य कीटनाशकों का प्रयोग होता है जो स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत खतरनाक है। इस इलाके में गरीबी बहुत ज्यादा है। बच्चे बागानों से लीचियों को उठाकर उसे धोए बगैर ही दांतों से छीलकर खा लेते हैं जिसके चलते खतरनाक रसायन उनके शरीर में प्रवेश कर जाते हैं।

बिहार में लंबे समय तक पत्रकारिता कर चुके नरेंद्र नाथ मिश्रा @iamnarendranath ने एक ट्वीट करके बताया कि 'गांवों में किसी मरीज के घर जाएं और उनके घर से सबसे करीब स्वास्थ्य केंद्र पहुंचें तो पता चल जाएगा कि आखिर में असल बीमारी कहां है। जो बच्चे इस बीमारी से ग्रस्त हैं, उनकी मेडिकल रिपोर्ट देखेंगे तो पता चलेगा कि अगर उन्हें इंसेफेलाइटिस नहीं होगा तो कोई दूसरी बीमारी जरूर होगी।'

बढ़ती आबादी और कुपोषण

संयुक्त राष्ट्र की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक 2027 तक भारत की आबादी चीन से अधिक हो जाएगी और 2050 तक दुनिया की आबादी दो अरब तक बढ़ जाएगी। अभी दुनिया की आबादी 7.7 अरब है जो तीस साल में बढ़कर 9.7 अरब हो जाएगी। संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक एवं सामाजिक मामलों के विभाग में जनसंख्या संकाय ने ‘द वर्ल्ड पॉपुलेशन प्रॉस्पेक्ट्स 2019’ नाम से जारी रिपोर्ट में यह दावा किया है। इसके मुताबिक सदी के अंत तक 2100 में वैश्विक आबादी 11 अरब तक हो जाएगी।

आधी बढ़ोतरी नौ देशों में, भारत में सर्वाधिक

रिपोर्ट के मुताबिक दो अरब की कुल बढ़ोतरी का आधा हिस्सा महज नौ देशों में होगा। ये देश हैं:
  1. भारत
  2. नाइजीरिया
  3. पाकिस्तान
  4. कान्गो गणराज्य
  5. इथियोपिया
  6. तंजानिया
  7. इंडोनेशिया
  8. मिस्र
  9. अमेरिका।

चिंता की वजह

  1. गरीब देशों की आबादी में इजाफा अधिकः रिपोर्ट में कहा गया कि दुनिया के गरीब देशों में आबादी बढ़ने की दर सबसे तेज रहेगी। बढ़ती जनसंख्या इन देशों के लिए गरीबी को कम करने में बड़ी चुनौती बनेगी और भुखमरी, कुपोषण जैसे हालात बढ़ेंगे। साथ ही यहां के लोग अपनी औसत आयु से सात साल कम जी पाएंगे।
  2. बूढ़ी आबादी तेजी से बढ़ रहीः जीवन प्रत्याशा बढ़ने और प्रजनन की दर में गिरावट के कारण बूढ़ी आबादी तेजी से बढ़ रही है। 2050 में हर छह में से एक व्यक्ति की उम्र 65 या उससे अधिक होगी। 65 साल का आयु वर्ग दुनियाभर में तेजी से बढ़ रहा है।
  3. पेशेवर जनसंख्या में कमी से समाज पर दबाव बढ़ेगाः रिपोर्ट के मुताबिक कामकाजी आयुवर्ग यानी 24-50 के बीच की संख्या बूढ़ी आबादी (65 से अधिक आयु वाले) की तुलना में कम हो रही है, इस कारण समाजिक ढांचे पर दबाव बढ़ रहा है। ऐसे में लोगों की निर्भरता भी सरकार पर बढ़ रही है और आर्थिक ढांचे पर असर पड़ रहा है।

भारत में बाल कुपोषण: एक चुनौती

तीव्र आर्थिक वृद्धि के बावजूद हमारे देश में कई दशकों से कुपोषण एक प्रमुख सामाजिक-आर्थिक चुनौती के रूप में मौजूद है। 2012 में विश्व बैंक द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार स्वच्छता की कमी और कुपोषण के कारण होने वाले रोगों की वजह से भारत को हर साल तकरीबन 53.8 अरब डॉलर का नुकसान होता है।

कुपोषण की स्थिति

यूनिसेफ और विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार कुपोषण के तीन प्रमुख लक्षण होते हैंः
  • नाटापन (Stunting) - यदि किसी बच्चे का कद उसकी आयु के अनुपात में कम रह जाता है तो उसे नाटापन कहते हैं।
  • निर्बलता (Wasting) - यदि किसी बच्चे का वजन उसके कद के अनुपात में कम होता है तो उसे निर्बलता कहा जाता है।
  • कम वजन (Underweight) - आयु के अनुपात में कम वजन वाले बच्चों को ‘अंडरवेट’ कहा जाता है।
इन सभी बीमारियों और समस्याओं की प्रमुख वजह है पोषण और देखभाल की कमी जिससे बीमारियां फैलती हैं। विकासशील देशों में अक्सर बच्चों में यह समस्या पाई जाती है।

भारत में कुपोषण से नुकसानः वर्ष 2015 की ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत भूख से प्रभावित 20 सबसे बड़े देशों में एक था। दक्षिण एशियाई देशों में तो यह केवल अफगानिस्तान और पाकिस्तान से ही पीछे था।

कुपोषण के कारण

पोषण की कमी और बीमारियां कुपोषण के सबसे प्रमुख कारण हैं। अशिक्षा और गरीबी के चलते भारतीयों के भोजन में आवश्यक पोषक तत्त्वों की कमी हो जाती है जिसके कारण बच्चों में एनीमिया, घेंघा और हड्डियां कमजोर जैसे रोग हो जाते हैं। पारिवारिक खाद्य असुरक्षा, जागरूकता की कमी और स्वास्थ्य सेवाओं की अनुपलब्धता हालात को और बिगाड़ देते हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत में लगभग 1700 मरीजों पर एक डॉक्टर उपलब्ध हो पाता है, जबकि वैश्विक स्तर पर 1000 मरीजों पर 1.5 डॉक्टर होते हैं।

शर्मनाकः पाक से चार गुना ज्यादा अविकसित बच्चे हमारे देश में

भारत इस समय कुपोषण के खतरनाक स्तर से जूझ रहा है। विश्व में स्टंटिड (कुपोषण के कारण अविकसित रह जाने वाले) बच्चों में करीब 31 फीसदी हिस्सेदारी भारत की है। इस मामले में भारत पूरे विश्व में नंबर-1 पर है। यहां तक कि बाल विकास में गड़बड़ी के मामले में भारत, पाकिस्तान से चार गुना आगे है। यह दावा 2018 की वैश्विक पोषण रिपोर्ट में किया गया है।

इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत में विश्व के एक तिहाई कुपोषित बच्चे रहते हैं। इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट के अध्ययन पर आधारित इस रिपोर्ट में बताया गया है कि वैश्विक स्तर पर 5 साल से कम उम्र के 15.08 करोड़ बच्चे स्टंटिड और 5.05 करोड़ बच्चे वैस्टिड (वजन में उम्र के हिसाब से कमी) का शिकार हैं।

कुपोषण के कारण ओवरवेट होने की समस्या के शिकार 3.83 करोड़ बच्चों में 10 लाख से ज्यादा की संख्या रखने वाले दुनिया के 7 देशों में भी भारत शामिल है। इस लिस्ट में अन्य देश अमेरिका, चीन, पाकिस्तान, मिस्र, ब्राजील और इंडोनेशिया हैं। दुनिया के 141 देशों में किए गए विश्लेषण पर आधारित रिपोर्ट के अनुसार, करीब 88 फीसदी यानि 124 देश कुपोषण की किसी न किसी एक स्थिति के अवश्य शिकार पाए गए हैं।

क्या हैं स्टंटिड व वैस्टिड?

स्टंटिड या उम्र के हिसाब से कम लंबाई की समस्या लंबे समय तक पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्व नहीं मिलने और लगातार इंफेक्शन का शिकार होने के कारण होती है, जबकि वैस्टिड या लंबाई के हिसाब से बेहद कम वजन की समस्या भुखमरी का पुख्ता संकेत मानी जाती है। वैस्टिड को 5 साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्युदर का बड़ा कारण माना जाता है।

स्टंटिड बच्चों में टॉप-3 देश

  • भारत - 4.66 करोड़
  • नाइजीरिया - 1.39 करोड़
  • पाकिस्तान - 1.07 करोड़

वैस्टिड बच्चों में टॉप-3

  • भारत - 2.55 करोड़
  • नाइजीरिया - 34 लाख
  • इंडोनेशिया - 33 लाख
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