सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को गुजरात सरकार को उसे इस बात की जानकारी देने को कहा कि 2020 में राज्य के राजकोट और अहमदाबाद के अस्पतालों में आग लगने की दो घटनाओं की जांच करने वाले न्यायमूर्ति डी ए मेहता (सेवानिवृत्त) की अध्यक्षता वाले जांच आयोग की रिपोर्ट विधानसभा के पटल पर रखी गई है, या नहीं। अदालत ने राज्य सरकार से यह सवाल भी किया कि यदि ऐसा नहीं किया गया है, तो इसे कब तक किया जाएगा। न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति हिमा कोहली की पीठ ने गुजरात सरकार को एक हफलनामा दाखिल कर उन कदमों के बारे में भी संकेत देने को कहा, जो आयोग के निष्कर्षों के मद्देनजर उठाए गए हैं। शीर्ष न्यायालय कोविड-19 मरीजों के उपयुक्त उपचार और गुजरात के अस्पतालों में मरने वाले लोगों के शवों को गरिमापूर्ण तरीके से रखे जाने पर स्वत: संज्ञान वाले एक विषय की सुनवाई कर रहा है।
कैदियों को मतदान से वंचित रखने संबंधी याचिका पर केंद्र सरकार व निर्वाचन आयोग से मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने कैदियों को उनके मतदान के अधिकार से वंचित करने वाली जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा- 62(5) को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया। सीजेआई यूयू ललित, जस्टिस एस रवींद्र भट और जस्टिस बेला एम त्रिवेदी की पीठ ने केंद्र सरकार, निर्वाचन आयोग व अन्य प्रतिवादियों को इस संबंध में जवाब दाखिल करने का निर्देश देते हुए मामला नौ दिसंबर के लिए सूचीबद्ध कर दिया। याचिकाकर्ता के वकील ने कहा, जेल में बंद करीब तीन चौथाई कैदी विचाराधीन हैं। यानी वे दोषी हैं या नहीं, यह अभी साबित नहीं हुआ है, ऐसे में उन्हें मताधिकार का प्रयोग करने से वंचित करना उचित नहीं है।