गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनावी नतीजे आ गए है। इन परिणामों का सीधा असर राजस्थान की सियासत पर पड़ा है। हिमाचल में कांग्रेस को जीत मिली तो सचिन पायलट की पीठ थपथपाई गई। गुजरात में कांग्रेस की करारी हार हुई तो सीएम अशोक गहलोत की रणनीति पर सवाल उठने लगे है। प्रदेश के राजनीतिक हलकों में इस बात के कयास जोरों पर लगाए जा रहे है कि,इन परिणामों का असर गहलोत की कुर्सी पर पड़ेगा। क्या कांग्रेस हाईकमान हिमाचल में कांग्रेस की जीत का इनाम पायलट को देगा?
दरअसल, इन दोनों राज्यों के रिजल्ट का सीधा कनेक्शन राजस्थान से है। कांग्रेस ने गुजरात के प्रदेश प्रभारी के तौर पर रघु शर्मा को तैनात किया था। सीएम गहलोत को चुनाव में बतौर सीनियर ऑब्जर्वर नियुक्त किया गया। शर्मा की गिनती गहलोत के करीबी नेताओं में होती है। इन दोनों नेताओं ने गुजरात में कई रैलियां की और धुंआधार प्रचार भी किया। बावजूद इसके कांग्रेस ने राज्य में ऐतिहासिक खराब प्रदर्शन किया। 2017 के विधानसभा चुनावों में गहलोत ने गुजरात में मोर्चा संभाला था। तब कांग्रेस को 77 सीटें हासिल हुई थी। लेकिन इस बार गेहलोत का जादू नहीं चल सका। चुनावों में हुई बुरी हार की जिम्मेदारी लेते हुए प्रदेश प्रभारी रघु शर्मा ने कांग्रेस अध्यक्ष को चिट्ठी लिखकर पद से इस्तीफे की पेशकश की है। लेकिन हार पर गहलोत का कोई बयान सामने नहीं आया है।
दूसरी तरफ राजस्थान के पूर्व उप मुख्यमंत्री और सचिन पायलट हिमाचल चुनावों में जीत की रणनीति बनाने वालों में सबसे अहम रहे है। पार्टी ने चुनाव में उन्हें ऑब्जर्वर और स्टार प्रचारक बनाकर मैदान में उतारा था। पायलट ने कांगड़ा, मंडी, शिमला में जबरदस्त प्रचार किया। सचिन ने प्रियंका गांधी के साथ मिलकर कई रैलियों को भी संबोधित किया। पायलट ने हर सभा में मोदी सरकार और भाजपा पर जमकर निशाना साधा। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, पंजाब नेता प्रताप सिंह बजावा के साथ मिलकर पायलट ने आक्रमण चुनावी रणनीति तैयार की। पायलट प्रेस कांफ्रेंस के दौरान पूरे आत्मविश्वास के साथ हिमाचल प्रदेश के नेताओं को यह तक कहते हुए दिखाई दिए कि 'आप चिंता मत करो मैं हिमाचल जिताकर ही जाऊंगा..आधा काम नहीं करते हम।'
राजस्थान के झगड़े का असर सीधे गुजरात पर
गुजरात चुनावों में कांग्रेस की बुरी तरह हार के लिए प्रदेश प्रभारी, प्रदेशाध्यक्ष के अलावा सीनियर ऑब्जर्वर के तौर पर गहलोत के हिस्से भी जिम्मेदारी आती है। गेहलोत इस चुनाव में उतना फोकस नहीं कर सके जितना उन्होंने 2017 के चुनाव में किया था। इस बार गहलोत अधिकांश समय राजस्थान में ही उलझे रहे। 25 सितंबर को गहलोत गुट के विधायकों के विधायक दल की बैठक के बहिष्कार करने के बाद हुए सियासी बवाल के कारण गेहलोत का गुजरात से फोकस हट गया। इसके बाद गहलोत समर्थक विधायकों ने स्पीकर को इस्तीफे दे दिए थे। इस घटना के बाद गुजरात में ड्यूटी लगाए मंत्री-विधायक ग्राउंड पर नहीं गए। इसका असर भी चुनाव पर पड़ा। अशोक गहलोत और कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव के विवादों का असर भी गुजरात कैंपेन पर पड़ा।
पायलट को फायदा, गहलोत का होगा नुकसान
प्रदेश के राजनीतिक जानकारों का कहना है कि हिमाचल प्रदेश के चुनाव में रणनीति बनाने में सचिन का अहम रोल रहा है। हालांकि, यहां प्रियंका गांधी ने भी चुनावी रणनीति को लेकर काफी अच्छा काम किया। इस जीत में पायलट की अहम भूमिका से कांग्रेस के बड़े नेताओं के बीच उनका नजरिया बदलेगा। पार्टी में उनकी छवि को लेकर सकारात्मक राय बनी है। अब सचिन पायलट का खेमा आक्रामक होकर इस जीत को अपने पक्ष में भुनाने का प्रयास करेगा। इसके बाद पायलट खेमा गहलोत की रणनीति पर भी सवाल उठाएगा।
2017 के गुजरात चुनावों में गहलोत प्रभारी थे, तब उनके चुनाव लड़ने की स्टाइल से लेकर कैंपेन तक की चर्चा जोरों पर थी। कांग्रेस वॉर रूम से लेकर ग्राउंड तक गहलोत का असर और उपस्थिति थी। इस बार दोनों ही कमजोर थे। गुजरात की हार पर गहलोत की सियासी जादूगर और रणनीतिकार की छवि पर विरोधी सवाल उठाएंगे। इससे गहलोत की सियासी छवि को नुकसान होने की पूरी संभावना है। राहुल की गांधी की भारत जोड़ों यात्रा अभी राजस्थान में है। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी भी रणथंभोर में है। लिहाजा, सचिन के काम की समीक्षा और आगे की जिम्मेदारियों का भी आकलन साथ साथ किया जा रहा है।
हिमाचल में कारगर, गुजरात में बेअसर रहा राजस्थान मॉडल
गुजरात चुनावों में कांग्रेस का राजस्थान मॉडल लागू करने वाला चुनावी वादा पूरी तरह बेअसर रहा। कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में राजस्थान की फायदे वाली योजनाएं चुनाव जीतने पर गुजरात में लागू करने का वादा किया था। गुजरात में उस वादे ने काम नहीं किया। लेकिन हिमाचल प्रदेश में पुरानी पेंशन लागू करने का वादा बड़ा मुद्दा बन गया था। हिमाचल प्रदेश में राजस्थान मॉडल लागू करने की गहलोत ने चुनावी सभाओं में घोषणा की थी। हिमाचल में राजस्थान मॉडल लागू करने का वादा काम कर गया है, गहलोत इसका क्रेडिट जरूर ले सकते हैं।