किसी एक व्यक्ति की शिकायत के कारण चुनाव की प्रक्रिया को आसानी से न तो रोका जा सकता है और न ही टाला जा सकता है। अगर किसी को चुनाव से जुड़ी कोई व्यक्तिगत शिकायत है, तो उसका अंतिम और एकमात्र उपाय चुनाव याचिका दाखिल करना है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को यह टिप्पणी की।
सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला उत्तराखंड हाईकोर्ट के जुलाई 2025 के एक अंतरिम आदेश के खिलाफ दायर अपील पर सुनाया। हाईकोर्ट ने उस आदेश में निर्वाचन अधिकारी को एक व्यक्ति को चुनाव चिन्ह देने और जिला पंचायत सदस्य के चुनाव में भाग लेने की अनुमति देने को कहा था। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने याचिका पर सुनवाई की।
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शीर्ष कोर्ट ने कहा कि चुनाव लड़ने या चुनाव को चुनौती देने का अधिकार कानून से मिलता है, इसलिए इसका इस्तेमाल उसी कानून के अनुसार सख्ती से किया जाना चाहिए।
कोर्ट ने कहा, हाईकोर्ट को व्यक्तियों के पक्ष में आसानी से अंतरिम राहत नहीं देनी चाहिए और पूरे राज्य में बिना किसी बाधा के चुनाव कराने चाहिए, क्योंकि यह जनता के हित में है। इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश को रद्द कर दिया और दोहराया कि किसी एक व्यक्ति की शिकायत के आधार पर चुनाव प्रक्रिया नहीं रोकी जा सकती।
पूरा मामला क्या था?
कोर्ट ने बताया कि उत्तराखंड राज्य निर्वाचन आयोग ने 12 जिलों में दोबारा पंचायत चुनाव करने की अधिसूचना जारी की थी। इसके बाद उस व्यक्ति ने पिथौरागढ़ जिले की एक सीट से जिला पंचायत सदस्य पद के लिए नामांकन दाखिल किया। हालांकि, उस व्यक्ति का नामांकन इस आधार पर रद्द कर दिया गया कि उसने जरूरी जानकारी पूरी तरह नहीं दी थी।
नामांकन रद्द होने के बाद उस व्यक्ति ने हाईकोर्ट का रुख किया। हाईकोर्ट के एकल जज ने उसकी याचिका खारिज की और कहा कि जब चुनाव प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, तब इस तरह की याचिका पर सुनवाई नहीं की जा सकती। इसके बाद उस व्यक्ति ने हाईकोर्ट में ही अपील दायर की। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के फैसले पर रोक लगा दी और निर्वाचन अधिकारी को उस व्यक्ति को चुनाव चिन्ह देने और चुनाव में शामिल करने का निर्देश दिया।
इस बीच, जिस उम्मीदवार को बिना मुकाबले जिला पंचायत सदस्य चुना गया था, उसने हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि एकल जज ने सही कारण बताए थे। कोर्ट ने याद दिलाया कि संविधान के अनुच्छेद 243-ओ में साफ लिखा है कि पंचायत चुनाव को केवल चुनाव याचिका के जरिये ही चुनौती दी जा सकती है।
'हाईकोर्ट की खंडपीठ ने कानून की तय सीमा का उल्लंघन किया'
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि खंडपीठ ने कानून की तय सीमा का उल्लंघन करते हुए चुनाव प्रक्रिया में दखल दिया, जबकि देश में चुनाव से जुड़ा कानून अब काफी विकसित हो चुका है। कोर्ट ने कहा कि संसद ने पंचायत राज संस्थाओं को सांविधानिक दर्जा दिया है ताकि प्रशासनिक फैसलों और न्यायिक दखल के बीच संतुलन बना रहे।
पीठ ने बताया कि उत्तराखंड में उत्तराखंड पंचायती राज अधिनियम, 2016 लागू है और इसलिए संविधान के अनुच्छेद 243-ओ के तहत रोक पूरी तरह लागू होती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब राज्य का कानून चुनाव याचिका का रास्ता देता है, तब हाईकोर्ट संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत चुनाव से जुड़ी शिकायतों पर सुनवाई नहीं कर सकता।