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SC में बिहार SIR पर सुनवाई: चुनाव आयोग की दलीलों में ट्रंप, मादुरो और ग्रीनलैंड; जानें क्यों आया इनका जिक्र?

Thu, 22 Jan 2026 08:07 PM IST
राहुल कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।

सार

निर्वाचन आयोग ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) करने संबंधी निर्णय को ‘‘निष्पक्ष, न्यायसंगत और उचित’’ बताया और  सुप्रीम कोर्ट से बिहार में इस प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज करने का आग्रह किया। इस दौरान आयोग की दलीलों में ट्रंप, मादुरो और ग्रीनलैंड का भी जिक्र हुआ।
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल तस्वीर) - फोटो : ANI
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विस्तार
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चुनाव आयोग ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट से बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज करने का आग्रह किया है। चुनाव आयोग ने एसआईआर की प्रक्रिया को निष्पक्ष, सही और तर्कसंगत बताया। आयोग ने कहा कि कुछ एनजीओ और राजनेताओं के कहने पर विशेष जांच को लेकर व्यापक और मनमानी पड़ताल (रोविंग एंड फिशिंग इन्क्वायरी) नहीं की जा सकती।

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सांसदों और एडीआर के पर भड़का आयोग
सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने कहा, बिहार एसआईआर में जिन 66 लाख लोगों के नाम हटाए गए थे, उनमें से कोई भी इस कोर्ट या हाईकोर्ट में नहीं आया और न ही किसी ने चुनाव आयोग में कोई याचिका दायर की। एडीआर (एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स) और पीयूसीएल (पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टी) और कुछ सांसदों के कहने पर ऐसी जांच की इजाजत नहीं दी जा सकती। बिहार समेत अलग-अलग राज्यों में एसआईआर कराने के चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं के एक बैच पर आखिरी सुनवाई के दौरान सीनियर वकील ने ये दलीलें दीं। इससे पहले एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पेपर बैलेट को फिर से शुरू करने और ईवीएम को हटाने की याचिका खारिज कर दी थी।

याचिकाकर्ता आए आयोग के निशाने पर  
उन्होंने उस फैसले का जिक्र किया जिसमें शीर्ष अदालत ने मतपत्रों को फिर से लागू करने और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) को रद्द करने की याचिका खारिज कर दी थी। उन्होंने कहा,  संक्षेप में, हमें यूरोप का अनुसरण करना चाहिए। अगर वे ईवीएम को अपनाते हैं, तो हमें भी इसे अपनाना चाहिए। और अगर वे मतपत्रों को अपनाते हैं, तो हमें भी इसे अपनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि एक व्यक्ति अखबार में लेख लिखता है और दूसरा व्यक्ति उसी का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करता है।
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सुनवाई में ट्रंप और मादुरो का भी जिक्र
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने याचिकाकर्ताओं के विदेशी, विशेषकर अमेरिकी अदालतों के फैसलों पर भरोसा किए जाने को भ्रामक और अप्रासंगिक बताया। आयोग ने कहा कि भारतीय सांविधानिक व्यवस्था की तुलना विदेशी उदाहरणों से नहीं की जा सकती और उसने अमेरिका की हालिया घटनाओं का हवाला दिया।

सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत की पीठ के समक्ष चुनाव आयोग का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने दलील दी कि जब अमेरिका में ही ‘ड्यू प्रोसेस ऑफ लॉ’ के सिद्धांत का पालन नहीं हो रहा है तो वहां के न्यायिक फैसलों को भारत में लागू करने की बात नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा, अमेरिकी अदालतों के फैसलों का हवाला दिया जा रहा है लेकिन वहां खुद ‘ड्यू प्रोसेस’ कहां है? द्विवेदी ने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को ट्रायल के लिए उठा सकते हैं और अब ग्रीनलैंड पर कब्जे की बात कर रहे हैं और यहां याचिकाकर्ता उसी प्रणाली को भारत में आयात करना चाहते हैं ।
 

द्विवेदी ने कहा, ऐसे उदाहरण यह दर्शाते हैं कि कार्यपालिका के आचरण और ‘ड्यू प्रोसेस’ की व्याख्या वैश्विक स्तर पर विवादित रही है। इसलिए उन्हें भारतीय मामलों में सीधे लागू नहीं किया जा सकता। आयोग ने कहा कि जब वह जन प्रतिनिधि अधिनियम की धारा 21(3) के तहत एसआईआर का आदेश देता है तो उसकी प्रक्रिया तय करने का अधिकार भी उसी के पास है। द्विवेदी ने कहा कि धारा 21(3) के तहत यह अनिवार्य नहीं है कि हर एसआईआर एक जैसी प्रक्रिया से हो।

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द्विवेदी ने प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ से अपील की कि वे एसआईआर का बचाव करते हुए याचिकाओं को खारिज कर दें और साथ ही जुर्माना भी लगाया जाये, क्योंकि एसआईआर की कवायद लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत वैधानिक शक्तियों का एक वैध और पारदर्शी प्रयोग है। उन्होंने दलील दी कि एक बार जब निर्वाचन आयोग 1950 के अधिनियम की धारा 21(3) के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करता है, तो विशेष पुनरीक्षण करने का तरीका और प्रक्रिया पूरी तरह से उसके विवेक पर निर्भर करती है। उन्होंने कहा कि बिहार में लगभग 20 साल से एसआईआर कवायद नहीं की गई थी और इसे शहरीकरण और जनसंख्या के आवागमन समेत बदलती जनसांख्यिकीय परिस्थितियों को देखते हुए किया गया।

क्या बदला हुआ नागरिकता ढांचा मौजूदा एसआईआर का कारण था?
सीजेआई ने कहा कि अगर निर्वाचन आयोग का यह तर्क मान लिया जाता है कि धारा 21(3) बिना किसी रोक-टोक के विवेक का अधिकार देती है, तो मामला वहीं खत्म हो जाएगा। न्यायमूर्ति बागची ने सवाल किया कि क्या बदला हुआ नागरिकता ढांचा मौजूदा एसआईआर का कारण था, और कहा कि निर्वाचन आयोग के आदेश में साफ तौर पर सीमा पार या अवैध प्रवासन को इसका आधार नहीं बताया गया था।

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न्यायमूर्ति बागची ने कहा, आमतौर पर ‘प्रवासन’ शब्द का मतलब कानूनी आवाजाही होता है। एक राज्य से दूसरे राज्य में जाना संवैधानिक अधिकार है।द्विवेदी ने कहा कि यह संशोधन पहले कभी लागू नहीं किया गया था और मौजूदा एसआईआर बदले हुए कानूनी ढांचे पर ध्यान देने का एक सही मौका देता है। उन्होंने साफ किया कि मकसद संविधान के अनुच्छेद 326 के दायरे में नागरिकता की जांच करना था, जो वयस्क मताधिकार की गारंटी देता है।

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