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एक्सप्लेनर: पहली बार सवालों में नहीं है चुनाव आयोग, सत्ता से करीबी और बाद में 'इनाम' मिलने पर पहले भी हुए बवाल

Fri, 25 Sep 2026 08:44 AM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र स्पेशल डेस्क, अमर उजाला

सार

मुख्य चुनाव आयुक्त का पद पहली बार सवालों में नहीं है। जानें टीएन शेषन से लेकर ज्ञानेश कुमार तक के विवाद, आयोग की संरचना और रिटायरमेंट के बाद मिले पदों का पूरा ब्योरा।
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पहली बार सवालों में नहीं चुनाव आयोग - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इस वक्त निर्वाचन आयोग की गतिविधियों को लेकर सवालों के घेरे में हैं। विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया को लेकर विपक्ष उन पर निशाना साध रहा है। भारत में चुनाव के इतिहास में यह पहली बार नहीं है, जब मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) का पद विवादों के घेरे में हो। पहले भी कई मौकों पर सीईसी को लेकर विवाद हुए हैं। 
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ऐसे में यह जानना अहम है कि भारत में सीईसी के पद का शुरुआती इतिहास क्या रहा है? यह पद अस्तित्व में कैसे आया और इसका गठन क्यों हुआ? पहले चुनाव आयोग की संरचना कैसी थी? इसमें बदलाव कब हुआ? मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर पहले कब-कब विवाद हुआ और इसकी वजह क्या रही? आइये जानते हैं...

यह पद अस्तित्व में कैसे आया?

  • भारत के निर्वाचन आयोग का गठन 25 जनवरी 1950 को एक स्थायी और स्वतंत्र सांविधानिक निकाय के रूप में हुआ था। सुकुमार सेन भारत के पहल निर्वाचन आयुक्त थे। उस वक्त केवल एक चुनाव आयुक्त ही होते थे।
  • इस आयोग और पद की शक्तियों का मूल स्रोत संविधान का अनुच्छेद 324 है, जो इन्हें संसद, विधानसभा, विधान परिषद, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव कराने, उनके निर्देशन और उन पर नियंत्रण की पूरी शक्ति देता है।
  • अपनी स्थापना से लेकर 15 अक्तूबर 1989 तक यह आयोग एक एकल-सदस्यीय निकाय के तौर पर काम करता रहा, जिसमें केवल एक निर्वाचन आयुक्त ही हो

सीईसी के पद का गठन क्यों हुआ था?

भारत में संसदीय लोकतंत्र और वयस्क मताधिकार को अपनाने के बाद चुनावों को स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी  बनाए रखना अनिवार्य था। ऐसे में चुनावी प्रक्रिया को तत्कालीन सरकार या कार्यपालिका के राजनीतिक प्रभाव, दखल और मनमानी से पूरी तरह मुक्त रखने का विजन तय किया गया।

चूंकि देश में चुनाव के लिए मतदाता सूची तैयार करने, चुनावी तिथियां तय करने, उम्मीदवारों के नामांकन की जांच करने, राजनीतिक दलों को मान्यता देने और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए एक केंद्रीय अखिल भारतीय निकाय जरूरी था, इसलिए इसे चलाने वाले एक प्रमुख सदस्य की नियुक्ति भी अनिवार्य थी, जो कि अपने कामों के लिए भारत के राष्ट्रपति के प्रति जवाबदेह होगा।

सुप्रीम कोर्ट की तरफ से अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले में दिए गए फैसले के मुताबिक, संविधान निर्माताओं (संविधान सभा) की स्पष्ट मंशा यह थी कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों को नियुक्त करने का अधिकार केवल कार्यपालिका के हाथों में विशेष रूप से न रहे। इसी सोच के तहत संविधान सभा ने अनुच्छेद 324 में यह व्यवस्था रखी थी कि यह नियुक्ति प्रक्रिया संसद द्वारा बनाए जाने वाले कानून के अंतर्गत होगी। संविधान सभा का मकसद चुनाव आयोग को ऐसी स्वायत्तता और सांविधानिक सुरक्षा देना था, जिससे भारत के लोकतांत्रिक ढांचे की निष्पक्षता बनी रहे। 

मुख्य चुनाव आयुक्त। - फोटो : अमर उजाला

पहले चुनाव आयोग की संरचना कैसी थी; आज जो व्यवस्था है, वह कब बनी?

1. 1989 से पहले की संरचना: सिर्फ एक मुख्य चुनाव आयुक्त वाला निकाय
25 जनवरी 1950 को अपनी स्थापना से लेकर 15 अक्तूबर 1989 तक निर्वाचन आयोग एक एकल-सदस्यीय निकाय के तौर पर कार्य करता था। इस पूरी अवधि के दौरान सिर्फ मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ही आयोग के इकलौते सदस्य होते थे और चुनाव से जुड़े सभी प्रशासनिक और निर्णयकारी अधिकार उन्हीं के पास केंद्रित थे।

2. अक्तूबर 1989 में पहला बदलाव: दो चुनाव आयुक्त भी जोडे़ गए
16 अक्तूबर 1989 को मतदान की न्यूनतम आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दी गई। इससे मतदाताओं की संख्या में भारी बढ़ोतरी हुई और आयोग का कार्यभार बढ़ गया। बढ़ते कार्यभार को संभालने के लिए राष्ट्रपति ने पहली बार दो अतिरिक्त निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की, जिससे निर्वाचन आयोग तीन-सदस्यीय निकाय बन गया।

3. 1990 में पुनः पुरानी व्यवस्था में वापसी
1 जनवरी 1990 को दो अतिरिक्त निर्वाचन आयुक्तों के पदों को खत्म कर दिया गया और आयोग को फिर से एकल-सदस्यीय निकाय में बदल दिया गया।

4. अक्तूबर 1993 से स्थायी बहु-सदस्यीय व्यवस्था
1 अक्तूबर 1993 को राष्ट्रपति की ओर से एक बार फिर दो अतिरिक्त निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की गई। तब से लेकर आज तक निर्वाचन आयोग स्थायी रूप से तीन-सदस्यीय निकाय (एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दो अन्य निर्वाचन आयुक्त) के रूप में कार्य कर रहा है।

;चुनाव आय़ुक्त। - फोटो : अमर उजाला

कैसे मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त की शक्तियों में हुआ बदलाव?

1950–1989: शक्तियों का पूर्ण केंद्रीकरण का दौर
1950 से लेकर 15 अक्तूबर 1989 तक आयोग एक एकल-सदस्यीय निकाय रहा, जिसकी वजह से इसकी सारी शक्तियां सिर्फ मुख्य चुनाव आयुक्त के पास ही थीं। वे चुनावों के प्रबंधन, निर्देशन और नियंत्रण के सभी प्रशासनिक व कार्यकारी अधिकार पूरी तरह अपने पास रखते थे। चूंकि सीईसी की नियुक्ति की प्रक्रिया स्थापित करने वाला कोई कानून केंद्रीय स्तर पर नहीं था, इसलिए राष्ट्रपति सरकार की सलाह पर सीईसी की नियुक्ति करती थीं। 

1989 से 1993: अस्थायी बदलाव और कानूनी विवाद
16 अक्तूबर 1989 को मतदान की न्यूनतम आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दिए जाने के कारण कार्यभार बढ़ा, जिसके चलते राष्ट्रपति ने पहली बार दो अतिरिक्त निर्वाचन आयुक्तों- एसएस. धनोआ और वीएस. सहगल की नियुक्ति कर इसे बहु-सदस्यीय निकाय बनाया। हालांकि, 1 जनवरी 1990 को राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचना रद्द कर दोनों अतिरिक्त निर्वाचन आयुक्तों के पदों को समाप्त कर दिया गया और आयोग को फिर से एकल-सदस्यीय बना दिया गया।

चूंकि चुनाव आयोग में यह बदलाव अचानक हुए और इसके पीछे सियासी मकसद होने की आशंका थी, इसलिए उस दौरान राष्ट्रपति के फैसले को भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी गई। इस केस को एसएस. धनोआ बनाम भारत संघ, 1991 के नाम से जाना जाता है। इस केस में चुनाव आयोग के दो आयुक्तों के पदों को हटाने के फैसले पर सवाल उठाए गए थे। 

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के फैसले को वैध ठहराते हुए निर्णय दिया कि सीईसी और अन्य निर्वाचन आयुक्तों का दर्जा समान नहीं है। न्यायालय ने माना कि मुख्य चुनाव आयुक्त आयोग के प्रशासनिक प्रमुख हैं और संविधान में केवल सीईसी का पद अनिवार्य है, जबकि अन्य आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति की इच्छा पर निर्भर यानी ऐच्छिक है।

3. 1993 के बाद: स्थायी बहु-सदस्यीय निकाय 
1 अक्तूबर 1993 को राष्ट्रपति ने एक बार फिर दो अतिरिक्त निर्वाचन आयुक्तों- एमएस. गिल और जीवीजी. कृष्णमूर्ति की नियुक्ति की और आयोग को स्थायी रूप से बहु-सदस्यीय निकाय बना दिया।

इसके बाद 1993 में निर्वाचन आयोग (चुनाव आयुक्तों की सेवा शर्तें और कार्य संचालन) अधिनियम, 1991 के संशोधन के जरिए 1993 में चुनाव आयोग के ढांचे में कुछ अहम बदलाव किए गए...

मुख्य चुनाव आयुक्त। - फोटो : अमर उजाला
समान वेतन और दर्जा: मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दोनों निर्वाचन आयुक्तों के वेतन, भत्ते और सेवा शर्तों को पूरी तरह सुप्रीम कोर्ट के जज के बराबर और समान कर दिया गया।

वीटो शक्ति का अंत: इसके अलावा सीईसी के पास अन्य आयुक्तों के निर्णयों को निरस्त या खारिज करने का कोई वीटो अधिकार नहीं रहा। सीईसी को आयोग की बैठकों की अध्यक्षता का अधिकार दिया गया।

बहुमत से निर्णय: आयोग के किसी भी मामले या मतभेद की स्थिति में निर्णय ज्यादातर सर्वसम्मति या फिर बहुमत (2:1) के आधार पर अनिवार्य किया गया।


टीएन शेषन ने दी थी बराबर शक्तियों को चुनौती

जब ये व्यवस्था लागू की गई तो उस वक्त के मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) और चुनाव आयुक्तों की शक्तियों में बराबरी के इस नियम को चुनौती दी और सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की। टीएन शेषन बनाम भारत संघ, 1995 के मामले में तत्कालीन सीईसी टीएन. शेषन की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने अध्यादेश और अधिनियम को सही ठहराते हुए स्पष्ट किया कि बहु-सदस्यीय आयोग में तीनों आयुक्तों की शक्तियां समान हैं और संस्थागत फैसले बहुमत के आधार पर ही होंगे।

मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर पहले कब-कब विवाद हुआ है?

भारत में मुख्य निर्वाचन आयुक्तों और निर्वाचन आयोग के फैसलों को लेकर अतीत में कई प्रमुख विवाद सामने आए हैं।

1. आरवीएस. पेरि शास्त्री

शक्तियों को सीमित करने का विवाद: 1989 के आम चुनावों की पूर्व संध्या पर केंद्र सरकार की सलाह पर राष्ट्रपति ने दो अतिरिक्त निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की, जिसे पेरि शास्त्री की शक्तियों और स्वतंत्रता को नियंत्रित करने के प्रयास के रूप में देखा गया। 

चुनाव कार्यक्रमों पर निर्णय: उन पर अपने कार्यकाल के दौरान सिर्फ एक उपचुनाव कराने और अन्य रिक्तियों को न भरने का आरोप लगा था। इसके अलावा, 1987 में कानून-व्यवस्था के आधार पर हरियाणा के चुनाव टालने लेकिन मेघालय में चुनाव की अनुमति देने को लेकर भी विवाद हुआ था।


2. टीएन. शेषन

चुनाव रोकने का फैसला: 1991 में जब केंद्र सरकार ने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए पर्याप्त सुरक्षा बल देने से इनकार कर दिया, तो शेषन ने आदेश जारी कर दिया कि जब तक उनके अधिकार तय नहीं होते, चुनाव नहीं कराए जाएंगे।

मुख्य चुनाव आयुक्त। - फोटो : अमर उजाला
'कार्यकारी सीईसी' की नियुक्ति पर आपत्ति: उन्होंने 1990 में वीपी. सिंह सरकार की ओर से वीएस. रमादेवी को कार्यकारी सीईसी नियुक्त करने के फैसले को असांविधानिक बताते हुए उसे रद्द करने की मांग की थी।

बहु-सदस्यीय आयोग और सुप्रीम कोर्ट का मामला: अक्तूबर 1993 में जब सरकार ने दो नए आयुक्तों की नियुक्ति कर आयोग को बहु-सदस्यीय बनाया और शक्तियों को बराबर किया, तो शेषन ने इसे अपनी स्वायत्तता घटाने की दुर्भावनापूर्ण कोशिश बताते हुए उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी थी।


3. जेएम. लिंगदोह

2002 का गुजरात चुनाव विवाद: 2002 में गुजरात दंगों के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार जल्द चुनाव कराना चाहती थी। राज्यपाल एसएस भंडारी ने जुलाई 2002 में विधानसभा को उसका कार्यकाल पूरा होने से नौ महीने पहले ही भंग कर दिया। हालांकि, विपक्ष ने इस पर आपत्ति जताई। विपक्ष का आरोप था कि मोदी सरकार ऐसा करके संविधान का उल्लंघन कर रही है और छह महीने के अंदर दो विधानसभा सत्र के कराने की सांविधानिक जिम्मेदारी से बच रही है। तत्कालीन चुनाव आयुक्त जेएम. लिंगदोह के नेतृत्व वाले चुनाव आयोग ने भी राज्य में हुई सांप्रदायिक हिंसा के मद्देनजर विधानसभा भंग करने के फैसले का सार्वजनिक तौर पर विरोध किया था। यहां तक कि लिंगदोह के नेतृत्व वाले आयोग ने स्थिति का जायजा लेकर चुनाव टाल दिए। 

अपने ऊपर हुई टिप्पणी पर तीखी प्रतिक्रिया: चुनाव में हुई इस देरी को लेकर बाद में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने लिंगदोह पर निशाना साधा था। इस पर लिंगदोह ने कड़ा ऐतराज जताया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग के गुजरात का चुनाव टालने के फैसले को सही ठहराया था।


4. एन. गोपालस्वामी और नवीन चावला 

आयुक्त को हटाने की सिफारिश: जनवरी 2009 में तत्कालीन सीईसी एन. गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति को पत्र भेजकर निर्वाचन आयुक्त नवीन चावला को पद से हटाने की सिफारिश कर दी। उन्होंने आरोप लगाया कि चावला सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी के नेताओं के साथ गुप्त रूप से संपर्क में रहकर पक्षपातपूर्ण काम कर रहे हैं। हालांकि, सरकार और राष्ट्रपति ने इस सिफारिश को खारिज कर दिया था।

शाह आयोग और विपक्ष के आरोप: नवीन चावला की नियुक्ति पर विपक्षी एनडीए गठबंधन ने उनके राजनीतिक संबंधों और 1970 के दशक के शाह आयोग की टिप्पणियों को लेकर राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।

मुख्य चुनाव आय़ुक्त। - फोटो : अमर उजाला

5. अचल कुमार ज्योति 

गुजरात चुनाव की तारीखों में देरी: 2017 में हिमाचल प्रदेश और गुजरात विधानसभा चुनावों के कार्यक्रमों की अलग-अलग घोषणा को लेकर ज्योति विवादों में आए। उन्होंने गुजरात में देरी का कारण बाढ़ राहत कार्य बताया, लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि राहत कार्य पहले ही पूरा हो चुका था।

पक्षपात के आरोप: गुजरात चुनाव के दौरान विपक्षी दल की ओर से आयोग पर सत्तारूढ़ नेताओं के आचार संहिता उल्लंघन की अनदेखी करने का आरोप लगाया गया।


6. सुनील अरोड़ा

आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन पर असहमति: 2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान, सत्तारूढ़ भाजपा के शीर्ष नेताओं को आदर्श आचार संहिता के कथित उल्लंघनों के मामलों में दी गई क्लीन चिट पर तत्कालीन निर्वाचन आयुक्त अशोक लवासा ने असहमति जताई थी। लवासा ने यह मांग रखी थी कि आयोग द्वारा जारी किए जाने वाले अंतिम प्रकाशित आदेशों और निर्णयों में उनके असहमति नोटों को भी आधिकारिक रिकॉर्ड में शामिल किया जाए।

अपने आयुक्त की ही मांग खारिज: सुनील अरोड़ा की अध्यक्षता वाले निर्वाचन आयोग ने लवासा की इस मांग को खारिज कर दिया। आयोग का तर्क था कि चुनाव आयोग के कार्यकारी आदेशों में अंतिम निर्णयों के साथ असहमति नोट संलग्न करने का कोई कानूनी या प्रशासनिक प्रावधान नहीं है। इसके बाद अशोक लवासा ने चुनाव आयोग से इस्तीफा दे दिया था। 

7. राजीव कुमार

चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर: मई 2022 से फरवरी 2025 तक भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त रहे राजीव कुमार पर अपने कार्यकाल के दौरान विपक्षी दलों की ओर से निष्पक्ष न रहने के आरोप लगाए गए। विपक्ष का आरोप था कि राजीव कुमार सत्तारूढ़ दल के प्रति झुकाव रखते हैं। 

मद्रास हाईकोर्ट की टिप्पणी और ईसी में आंतरिक मतभेद: मई 2021 में, मद्रास हाईकोर्ट ने विधानसभा चुनावों के संचालन को लेकर टिप्पणी की थी कि निर्वाचन आयोग कोविड-19 की दूसरी लहर के लिए अकेले जिम्मेदार है। राजीव कुमार इस टिप्पणी के खिलाफ मद्रास हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में एक अलग हलफनामा दायर करके आयोग का बचाव करना चाहते थे। हालांकि, तत्कालीन मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुशील चंद्रा इस हलफनामे के खिलाफ थे, दोनों के बीच का यह मतभेद सार्वजनिक हो गया था।

कौन-कौन से मुख्य चुनाव आयुक्तों को बाद में मिले सरकारी पद?

मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद सरकार की ओर से अन्य पदों या सांविधानिक-प्रशासनिक दायित्वों पर नियुक्त किए गए, जिनमें से कई की नियुक्ति को सियासी चश्मे से भी देखा गया। 

1. सुकुमार सेन 
मुख्य निर्वाचन आयुक्त के कार्यकाल (1950–1958) के बाद 1960 में उन्हें वर्धमान विश्वविद्यालय का पहला कुलपति नियुक्त किया गया। उन्होंने 1953 में सीईसी रहते हुए सूडान के पहले मुख्य निर्वाचन आयुक्त के रूप में भी सेवाएं दी थीं।

2. केवीके. सुंदरम 
1967 में सीईसी पद से हटने के बाद 1968 में उन्हें विधि आयोग का अध्यक्ष बनाया गया। इसके बाद 1971 में उन्हें असम और नागालैंड राज्य सीमा विवाद को सुलझाने के लिए गृह मंत्रालय का सलाहकार नियुक्त किया गया।

3. एसपी. सेन वर्मा 
1972 में मुख्य निर्वाचन आयुक्त के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्हें विधि आयोग में नियुक्त किया गया।
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4. आरके. त्रिवेदी 
मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में अपना कार्यकाल (1982–1985) पूरा करने के बाद 26 फरवरी 1986 से 2 मई 1990 तक उन्हें गुजरात का राज्यपाल नियुक्त किया गया।

5. वीएस. रमादेवी 
वीएस रमादेवी भारत की पहली और इकलौती मुख्य चुनाव आयुक्त हैं। हालांकि, उनका कार्यकाल सबसे छोटा (महज 16 दिन) है। बाद में वे 1 जुलाई 1993 से 25 जुलाई 1997 तक राज्यसभा की महासचिव रहीं। 26 जुलाई 1997 से 1 दिसंबर 1999 तक रमादेवी हिमाचल प्रदेश की राज्यपाल रहीं। 2 दिसंबर 1999 से 20 अगस्त 2002 तक उन्होंने कर्नाटक की राज्यपाल के रूप में कार्य किया।

6. एन. गोपालस्वामी 
2009 में सेवानिवृत्त होने के बाद केंद्र सरकार की ओर से  उन्हें 22 अक्टूबर 2014 से 2019 तक कलाक्षेत्र फाउंडेशन का अध्यक्ष नियुक्त किया गया।

7. सुशील चंद्रा 
मई 2022 में सीईसी पद से सेवानिवृत्त होने के बाद फरवरी 2024 में उन्हें लोकपाल के गैर-न्यायिक सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया।
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