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Election: प. बंगाल में ममता बनर्जी को कितनी चोट पहुंचा सकेगी भाजपा? असम में घुसपैठिया विवाद का टेस्ट

सार

भाजपा पश्चिम बंगाल में अपनी सरकार बनाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। पिछले चुनाव में उसने तीन सीटों से 77 विधानसभा सीटों की यात्रा तय की थी। उसे उम्मीद है कि इस बार बदली परिस्थितियों में वह बेहतर प्रदर्शन करेगी। तमिलनाडु और केरलम में पिछले कुछ चुनावों में बेहतर प्रदर्शन के आधार पर इस बार उसे अच्छा परिणाम मिलने की उम्मीद है। 
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ममता बनर्जी, सीएम, पश्चिम बंगाल - फोटो : PTI
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चुनाव आयोग ने असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरलम के साथ-साथ पुडुचेरी के लिए मतदान की तारीखों की घोषणा कर दी है। भाजपा इन राज्यों के चुनाव में अपने लिए बड़ी संभावनाएं देख रही है। असम में पार्टी हैट्रिक लगाने की उम्मीद से चुनाव में उतर रही है। घुसपैठिया विवाद,  मजबूत पार्टी संगठन के अलावा विकास का मुद्दा इस बार उसके पक्ष में कहा जा रहा है। पश्चिम बंगाल में पार्टी ने पिछले चुनाव में 38 प्रतिशत वोट हासिल किया था। उसे उम्मीद है कि बदली परिस्थितियों में वह बेहतर प्रदर्शन करेगी। तमिलनाडु और केरलम में पिछले कुछ चुनावों में बेहतर प्रदर्शन के आधार पर इस बार उसे अच्छा परिणाम मिलने की उम्मीद है। 

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पश्चिम बंगाल में एक बार फिर भाजपा की साख दांव पर 
भाजपा पश्चिम बंगाल में अपनी सरकार बनाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। पिछले चुनाव में उसने तीन सीटों से 77 विधानसभा सीटों की यात्रा तय की थी। इसके बाद वह राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी बन गई थी। इसे भाजपा की बड़ी सफलता के तौर पर देखा जाता है। पार्टी प. बंगाल में अपनी सरकार बनाने में भले ही सफल नहीं हुई, लेकिन उसने 38 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल कर तृणमूल कांग्रेस सहित सभी दलों को चकित कर दिया था।    

पश्चिम बंगाल के पिछले विधानसभा चुनाव में पूरा चुनाव भाजपा-टीएमसी के बीच लगभग आमने-सामने की लड़ाई में तब्दील हो गया था। लेकिन इस बार ममता बनर्जी के सहयोगी हुमायूं कबीर ने अलग ताल ठोंक दी है। यदि वे मुसलमान मतदाताओं का एक हिस्सा भी खींचने में कामयाब रहते हैं तो स्थितियां बदल सकती हैं। पिछले चुनाव में भाजपा को रोकने के लिए बैकफुट पर खेल रही कांग्रेस इस बार अपने आपको बचाने के लिए मजबूती से चुनाव लड़ने की बात कह रही है। पड़ोसी देश बांग्लादेश में हिंदुओं के प्रति हुई हिंसात्मक घटनाओं से भी इस चुनाव के प्रभावित होने का अनुमान जताया जा रहा है। भाजपा इन नई परिस्थितियों में अपने लिए बेहतर परिणाम पाने की उम्मीद कर रही है।
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असम में हैट्रिक लगाने की चुनौती
असम भाजपा के लिए राजनीति की एक नई प्रयोगशाला बनकर उभरा है। पार्टी नेता मानते हैं कि असम में पार्टी की मजबूत स्थिति पूरे पूर्वोत्तर पर असर डालती है, इसलिए भाजपा हर हाल में असम में अपनी सरकार बचाने की कोशिश कर रही है। भाजपा ने असम के साथ-साथ पूरे पूर्वोत्तर में यह माहौल बनाने में सफलता पाई है कि उसने पूर्वोत्तर के विकास को केंद्र सरकार की प्राथमिकता में ला दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के इन राज्यों में कई दौरों ने यहां के लोगों को यह एहसास दिलाया है कि वे देश की राजनीति में प्राथमिकता के साथ शामिल हैं। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि भाजपा को इसका लाभ मिल सकता है। 

मुख्यमंत्री हेमंत बिस्व सरमा ने असम में भाजपा की हैट्रिक पूरा करने के लिए चुनाव के ऐलान के ठीक पहले राज्य की 40 लाख महिलाओं को नौ-नौ हजार रुपये देने का काम किया है। चुनाव पर इसका बड़ा असर पड़ना तय माना जा रहा है। हेमंत बिस्व सरमा सरकार ने स्थानीय तौर पर विकास को अपनी प्राथमिकता बनाया है। यह भाजपा के पक्ष में जा सकता है। हालांकि, असम में स्थानीय बनाम बाहरी का मुद्दा लंबे समय से राजनीति के केंद्र में रहा है। इस बार भी हेमंत बिस्वा सरमा का घुसपैठिया विवाद को उभारने का लाभ मिल सकता है।  

तमिलनाडु में स्थिति मजबूत करने की कोशिश 
तमिलनाडु में भाजपा अब तक अपने दम पर बड़ा प्रदर्शन नहीं कर पाई है। उसका प्रदर्शन सहयोगी दलों के साथ और उनके प्रदर्शन पर आधारित रहा है। दक्षिण भारत के इस बड़े किले में अपनी स्थिति मजबूत कर भाजपा दक्षिण में अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करना चाहती है। इसके लिए वह विभिन्न दलों से गठबंधन बनाने की कोशिश कर रही है। पिछले लोकसभा चुनाव में कोई सीट न जीत पाने के बाद भी भाजपा 11.24 प्रतिशत वोट हासिल करने में सफल रही थी। भाजपा इसे अपने लिए एक बेहतर संकेत के रूप में देख रही है। 

भाजपा के पास तमिलनाडु अध्यक्ष के रूप में नैनार नागेंद्रन बड़े नेता हैं। पूर्व अध्यक्ष के. अन्नामलाई ने पूरे राज्य में स्टालिन सरकार के खिलाफ यात्राएं निकालकर माहौल बनाने का काम किया है। कार्तिगई दीपम जैसे विवाद में स्टालिन सरकार की भूमिका और इस पर भाजपा के स्टैंड ने राज्य का चुनावी माहौल पहले ही गर्म कर दिया था। भाजपा को उम्मीद है कि इन परिस्थितियों में जनता का एक बड़ा वर्ग उसके साथ आएगा और राज्य में उसकी स्थिति बेहतर होगी।  

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केरलम में बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद 
भाजपा इस बार केरलम में अपने लिए बड़ी चुनावी संभावनाएं देख रही है। केरल में हाल ही में संपन्न हुए नगर निगम चुनाव में पार्टी 115 निगम पार्षद की सीटें जीतने में सफल रही थी। इसके पहले 2024 के आम चुनाव में भी उसने एक लोकसभा सीट जीतकर दक्षिण भारत के इस अभेद्य किले में सेंध लगाने में सफलता पाई थी। इन सफलताओं से भाजपा नेताओं के चेहरे खिले हुए हैं। वे मानकर चल रहे हैं कि अब तक वामपंथी और कांग्रेसी विचारधारा की राजनीति वाले राज्य में अब उनके लिए जगह बन रही है। भाजपा नेताओं के अनुसार, इस बार वे केरल में बेहतर प्रदर्शन करेंगे। 

भाजपा ने पूर्व केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर को केरल का प्रदेश अध्यक्ष बनाकर पूरी तरह राज्य में झोंक रखा है। पार्टी को मलयालम फिल्मों के सुपरस्टार नेता और केंद्रीय मंत्री सुरेश गोपी के असर का भी लाभ मिलेगा। 2016 में केरल की 140 विधानसभा सीटों में केवल एक विधानसभा सीट पर जीत हासिल करने वाली भाजपा 2021 के चुनाव में मेट्रो मैन श्रीधरन जैसे बड़े चेहरों को उतारने के बाद भी कोई सीट जीतने में नाकाम रही थी। हालांकि, करीब 11 प्रतिशत लोकप्रिय मत हासिल कर उसने अपनी शक्ति दिखाने की कोशिश की थी। भाजपा इस बार केरलम में बेहतर प्रदर्शन के लिए आशान्वित है।    
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पुदुचेरी- एनडीए शासन बनाए रखने पर रहेगा जोर
पुदुचेरी में इस समय भाजपा के सहयोग वाले एनडीए गठबंधन की सरकार है। अनुसूचित जातियों के लिए पांच सुरक्षित सीटों के साथ कुल तीस सीटों वाली विधानसभा में पिछले चुनाव में भाजपा ने छः सीटें हासिल की थी। उसकी सहयोगी पार्टी एआईएनआरसी दस सीटों के साथ बड़ा दल होकर गठबंधन का नेतृत्व कर रही है। भाजपा पुडुचेरी में अपने गठबंधन के साथ सत्ता में बने रहने का प्रयास करेगी।   

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