हाल ही में देश के पांच राज्यों में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में एक बहुत ही उत्साहजनक और सकारात्मक तस्वीर सामने आई है। इन चुनावों में ना सिर्फ मतदान का प्रतिशत बढ़ा है, बल्कि वोट डालने वाले लोगों की कुल संख्या में भी भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम, केरलम और पुदुचेरी के लोगों ने अपने घरों से बाहर निकलकर लोकतंत्र के इस सबसे बड़े पर्व में बढ़-चढ़कर अपना हिस्सा लिया है। चुनाव आयोग की तरफ से जारी किए गए ताज़ा आंकड़े इस बात की पूरी गवाही देते हैं कि अब आम जनता वोट डालने के महत्व को बहुत ही अच्छे तरीके से समझ रही है। यह इस बात का साफ संकेत है कि चुनाव दर चुनाव आम मतदाताओं की भागीदारी लगातार एक नए मुकाम की तरफ बढ़ रही है।
इस शानदार और ऐतिहासिक रिकॉर्ड के पीछे चुनाव आयोग की अहम भूमिका रही है। चुनाव आयोग ने लोगों को अपना वोट डालने के लिए प्रेरित करने के मकसद से 'चुनाव का पर्व, मतदाता का गर्व' नाम से एक बहुत ही खास और विशेष थीम के साथ मतदाता जागरूकता अभियान चलाया था। आयोग की तरफ से जारी किए गए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस अभियान का जमीन पर बहुत ही सीधा और सकारात्मक असर देखने को मिला है। पिछले कई वर्षों और दशकों की तुलना में इस बार इन सभी पांचों राज्यों में मतदाता भागीदारी लगातार बढ़ती हुई दिखाई दी है। खासकर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे बड़े राज्यों में तो मतदाताओं की संख्या और वोटिंग के प्रतिशत में उल्लेखनीय रूप से काफी बड़ा उछाल आया है, जो देश के लोकतंत्र के लिए एक बेहद ही शुभ संकेत माना जा रहा है।
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क्या पश्चिम बंगाल में मतदान ने आजादी के बाद का सबसे बड़ा रिकॉर्ड तोड़ दिया है?
जी हां, चुनाव आयोग के आंकड़ों को बहुत ही करीब से देखें तो पश्चिम बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनाव में सचमुच बंपर वोटिंग हुई है। इस बार यहां रिकॉर्ड 93.71 फीसदी वोट पड़े हैं। यह आंकड़ा कोई मामूली बात नहीं है। देश की आजादी के बाद से लेकर अब तक यह न केवल पश्चिम बंगाल में, बल्कि पूरे देश के किसी भी अन्य राज्य में सबसे ज्यादा मतदान का सबसे बड़ा ऐतिहासिक रिकॉर्ड बन गया है। इससे पहले यह बड़ा रिकॉर्ड त्रिपुरा राज्य के नाम पर दर्ज था, जहां साल 2013 के विधानसभा चुनाव में 93.61 प्रतिशत और साल 2008 में 92.49 फीसदी वोटिंग हुई थी। अगर चुनाव में लोगों की भागीदारी की बात करें तो पश्चिम बंगाल में पहले चुनाव में जहां सिर्फ 76 लाख लोगों ने वोट डाला था, वहीं 2026 में यह संख्या भारी उछाल के साथ 6.38 करोड़ तक पहुंच गई है।
असम और पुदुचेरी के मतदाताओं ने कैसे दिखाई चुनाव में अपनी गहरी आस्था?
असम और पुदुचेरी में भी वोटिंग को लेकर गजब का उत्साह दिखा है। असम के पुराने चुनावी आंकड़ों पर नजर डालें तो वहां पिछले कई दशकों में मतदान प्रतिशत में काफी बड़ा उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। एक समय ऐसा भी था जब असम में वोटिंग गिरकर सिर्फ 30 फीसदी के आसपास रह गई थी। लेकिन अब हाल के वर्षों में लोगों की दिलचस्पी बहुत ही तेजी से बढ़ी है। 2026 के चुनाव में असम का मतदान प्रतिशत 86 फीसदी के शानदार आंकड़े तक पहुंच गया। वहीं, अगर केंद्रशासित प्रदेश पुदुचेरी की बात करें तो वहां के मतदाता हमेशा से ही वोट डालने के मामले में प्रथम श्रेणी (फर्स्ट क्लास) में पास होते आए हैं। शुरुआत में साल 1964 में ही पुदुचेरी में करीब 80 फीसदी वोटिंग दर्ज की गई थी, जो अब 2026 में 90 फीसदी के आंकड़े को पार कर गई है। पुदुचेरी में वोटरों की संख्या भी शुरुआत के 1.71 लाख से बढ़कर अब 8.66 लाख से अधिक हो गई है।
तमिलनाडु और केरलम में जागरूकता अभियान का क्या असर देखने को मिला?
दक्षिण भारत के राज्यों तमिलनाडु और केरलम में भी चुनाव आयोग के मतदाता जागरुकता अभियान का बहुत ही बढ़िया और सकारात्मक असर साफ तौर पर दिखा है। तमिलनाडु में जहां साल 1951 के चुनाव में करीब 55 फीसदी मतदान हुआ था, वहीं 2026 के चुनावों में यह बढ़कर 86 फीसदी के पास पहुंच गया है। तमिलनाडु में वोट देने वालों की संख्या भी करीब 5 करोड़ के पास पहुंच गई है। दूसरी तरफ, देश के सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे राज्य माने जाने वाले केरलम में शुरुआत से ही लोगों ने वोट डालने में अपनी अच्छी दिलचस्पी दिखाई है। यहां वोटिंग का प्रतिशत हमेशा 60 फीसदी से ज्यादा ही रहा है। साल 2026 के चुनाव में केरलम में 79.53 फीसदी लोगों ने अपने मताधिकार का खुलकर प्रयोग किया और कुल 2.16 करोड़ लोगों ने इसमें अपनी भागीदारी निभाई।
तमिलनाडु का चुनावी इतिहास
अगर तमिलनाडु के चुनावी इतिहास को थोड़ा और बारीकी से समझा जाए तो पता चलता है कि वहां के वोटरों के रुझान में समय-समय पर कई बड़े बदलाव आते रहे हैं। शुरुआती दौर में वोटिंग थोड़ी कम रही और साल 2001 में भी इसमें भारी गिरावट दर्ज की गई थी। लेकिन साल 2004 के बाद की तस्वीर बिल्कुल अलग है। 2004 के बाद से वहां लगातार 70 फीसदी से ज्यादा ही वोट पड़ते आ रहे हैं। यह आंकड़ा इस बात को साबित करता है कि दक्षिण भारत के मतदाता अब किसी भी स्थिति में अपने कीमती वोट को बेकार नहीं जाने देना चाहते हैं और अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।
पश्चिम बंगाल में कैसे बढ़ी वोटिंग?
पश्चिम बंगाल हमेशा से ही अपनी समृद्ध संस्कृति, राजनीति और आर्थिक नजरिए के लिए पूरे देश में जाना जाता रहा है। यहां के चुनावों में वोटिंग की सबसे बड़ी खासियत यह रही है कि यह अचानक नहीं, बल्कि धीरे-धीरे लेकिन बहुत ही मजबूती के साथ लगातार बढ़ती गई है। साल 1951 के शुरुआती चुनाव में यहां 40 फीसदी से थोड़ा ही ज्यादा मतदान हुआ था, जो 1962 में बढ़कर 60 फीसदी हो गया। हालांकि 70 के दशक में थोड़ी कमी जरूर आई थी, लेकिन 80 के दशक के बाद से जो रफ्तार पकड़ी, वह आज 2026 में 93.71 फीसदी के ऐतिहासिक मुकाम पर जाकर एक नया कीर्तिमान बन गई है।
केरलम के आंकड़ें भी दिलचस्प
इसी तरह से केरलम राज्य का चुनावी आंकड़ा भी काफी दिलचस्प कहानी कहता है। केरलम में 1957 और 1960 के दौर में ही मतदान का प्रतिशत 85 फीसदी तक पहुंच गया था। हालांकि बाद के कुछ वर्षों में इसमें मामूली गिरावट आई और 1989 से लेकर 2014 तक यह आंकड़ा लगभग एक ही जगह पर स्थिर सा बना रहा। साल 1957 में वहां 58 लाख से अधिक लोगों ने भागीदारी की थी। लेकिन 2011 के बाद से केरलम के लोगों की चुनाव में हिस्सेदारी फिर से लगातार बढ़ने लगी है, जो कि देश के एक मजबूत लोकतंत्र के लिए बहुत ही अच्छी बात है।