प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने क्रिप्टो/स्टेबल कॉइन का उपयोग करके सीमा पार किए गए अनधिकृत धन हस्तांतरण के मामलों में तलाशी अभियान चलाया है। इस तलाशी से पता चला है कि अनधिकृत धन हस्तांतरण और वित्तीय लेन-देन के लिए क्रिप्टो टोकन का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग किया जा रहा है। प्रवर्तन निदेशालय के बेंगलुरु जोनल कार्यालय ने फेमा, 1999 की धारा 37 के तहत 27 अक्तूबर को बेंगलुरु में तीन स्थानों और मध्य प्रदेश में एक स्थान पर तलाशी ली। यह कार्रवाई क्रिप्टो (विशेष रूप से स्टेबल कॉइन) का उपयोग करके सीमा पार किए गए अनधिकृत वित्तीय लेन-देन के आरोपों के आधार पर की गई।
'मुद्रेक्स' और 'सेबर.मनी' प्लेटफॉर्म
प्रवर्तन निदेशालय ने बेंगलुरु स्थित आरपीएफएएस टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड' के खिलाफ प्राप्त शिकायतों के आधार पर उक्त मामले की जांच शुरू की थी। यह कंपनी "मुद्रेक्स" और "सेबर.मनी" प्लेटफॉर्म चलाती है, जहाँ अनधिकृत सीमा पार लेन-देन और क्रिप्टो ट्रेडिंग के लिए क्रिप्टोकरेंसी का उपयोग किया जा रहा है। निदेशालय द्वारा की गई गुप्त जांच और जुटाई गई खुफिया जानकारी से पता चला है कि कंपनी फेमा नियमों का उल्लंघन कर रही थी। यह कंपनी क्रिप्टो टोकन (खासकर यूएसडीटी/यूएसडीसी जैसे स्टेबल कॉइन) का उपयोग करके एक अनधिकृत सीमा पार भुगतान प्रणाली चला रही थी, जिसके जरिए अधिकृत माध्यमों को दरकिनार कर सीमा पार धन हस्तांतरण किया जा रहा था
सीमा पार तुरंत पैसे भेजने का खुलेआम विज्ञापन
यह संस्था आरबीआई से अधिकृत न होने के बावजूद, क्रिप्टोकरेंसी का उपयोग करके सीमाओं के पार तुरंत पैसे भेजने की खुलेआम विज्ञापन दे रही है। इंटरनेट वेब पेजों पर यह संस्था खुलकर विज्ञापन देती है, जिसमें क्रिप्टोकरेंसी को तुरंत खरीदने, बेचने और बदलने की सेवाएं दी जाती हैं। साथ ही, यह 'फिएट' करेंसी को क्रिप्टोकरेंसी में (और वापस फिएट में) बदलने का सबसे तेज़ तरीका होने का दावा करती है, ताकि दुनिया भर में पैसे भेजे जा सकें।
यूं संभव होता है सीमाओं के पार पैसे भेजना
यह संस्था क्रिप्टोकरेंसी (यानी वर्चुअल एसेट्स) के लिए 'ऑन-रैंप' और 'ऑफ-रैंप' सेवाएं देती है, जिससे सीमाओं के पार पैसे भेजना संभव हो जाता है। यह 'फिएट' करेंसी को क्रिप्टोकरेंसी में बदलकर उसे दूसरे देश में भेजती है। 'ऑन-रैंप' एक ऐसी सेवा है, जो यूजर्स को पारंपरिक 'फिएट' करेंसी (जैसे आईएनआर, यूएसडी, ईयूआर आदि) को वर्चुअल डिजिटल एसेट्स (जैसे बिटकॉइन या स्टेबलकॉइन्स - USDT आदि) में बदलने की सुविधा देती है। 'ऑफ-रैंप' एक ऐसी सेवा है, जिसके ज़रिए वर्चुअल डिजिटल एसेट्स को बेचकर वापस नकद राशि अपने बैंक अकाउंट में निकाली जा सकती है।
सामने आया पैसे भेजने का यह तरीका
तलाशी के दौरान मिले सबूतों और फेमा, 1999 के तहत दर्ज बयानों के आधार पर, 'वर्चुअल डिजिटल एसेट्स' के जरिए सीमा पार पैसे भेजने का यह तरीका सामने आया है।
-जो कोई भी पैसे भेजना चाहता है, उसे इन प्लेटफॉर्म्स पर रजिस्टर करना होता है।
-पैसे कंपनी के बैंक खाते में जमा करने होते हैं।
-इन पैसों का इस्तेमाल वीडीए खरीदने के लिए किया जाता है, खासकर स्टेबलकॉइन्स (जैसे यूएसडीटी) खरीदने के लिए।
-फिर इन वीडीए को भारत में मौजूद क्रिप्टो एक्सचेंजों पर बेचा जाता है, और बिक्री से मिली रकम पाने वाले व्यक्ति (रिसीवर) को भेज दी जाती है।
भारत से ही कंट्रोल और ऑपरेट
जांच से पता चला है कि जो संस्थाएं वीडीए के जरिए सीमा पार पैसे भेजने की सुविधा दे रही हैं, वे आरबीआई द्वारा फंड के आने-जाने के लिए तय किए गए किसी भी नियम का पालन नहीं कर रही हैं। इनमें से ज्यादातर संस्थाएं आधिकारिक चैनलों से बचने के लिए विदेशों में रजिस्टर्ड अपनी ही दूसरी कंपनियों का इस्तेमाल करती हैं, जिन्हें असल में भारत से ही कंट्रोल और ऑपरेट किया जाता है। जांच के दौरान पता चला कि ये संस्थाएं बड़ी मात्रा में ओटीसी (ओवर-द-काउंटर) डील्स करती हैं, कनाडा, लिथुआनिया और अमेरिका जैसे देशों में 'शेल कंपनियों' (केवल कागजों पर मौजूद कंपनियां) का इस्तेमाल करती हैं, और बिना अनुमति के सीमा पार पैसे भेजने के लिए विदेशी क्रिप्टो ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म्स का सहारा लेती हैं।
क्रिप्टो प्लेटफॉर्म्स पर क्रिप्टो की खरीद-बिक्री
यह भी सामने आया है कि ये संस्थाएं बायनेन्स और बायबिट जैसे विदेशी क्रिप्टो प्लेटफॉर्म्स पर क्रिप्टो की खरीद-बिक्री कर रही हैं। फेमा के नियमों का उल्लंघन करते हुए, इन संस्थाओं ने विदेशी प्लेटफॉर्म्स पर भारी मात्रा में क्रिप्टो एसेट्स जमा कर रखे हैं। साथ ही, ये संस्थाएं फेमा के नियमों को तोड़ते हुए विदेशों में अपने खर्चों का भुगतान भी क्रिप्टो के जरिए कर रही हैं। जांच के शुरुआती नतीजों से पता चला है कि बिना अनुमति के सीमा पार पैसे भेजने और विदेशी प्लेटफॉर्म्स पर क्रिप्टो बैलेंस रखने के जरिए फेमा के नियमों का उल्लंघन किया गया है, जो 4600 करोड़ रुपये से भी ज्यादा की रकम है।
यह सिस्टम देता है स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट की सुविधा
'इंस्टैडैप' एथेरियम ब्लॉकचेन पर बना एक 'डिसेंट्रलाइज्ड फाइनेंस' स्मार्ट प्रोटोकॉल है। यह क्रिप्टो टोकन का उपयोग करके डिसेंट्रलाइज्ड फाइनेंस के लिए एक प्लेटफॉर्म देता है। आसान शब्दों में कहें तो, इंस्टैडैप प्रोटोकॉल अपने उपयोगकर्ताओं को क्रिप्टो टोकन के जरिए उधार देने, उधार लेने और टोकन स्वैप (अदला-बदली) करने के लिए स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट की सुविधा देता है। इंस्टैडैप एक क्रिप्टो-आधारित "डिसेंट्रलाइज्ड फाइनेंस" प्लेटफॉर्म है। यह एक ऐसे ऑनलाइन बैंक की तरह काम करता है, जिसमें कर्मचारियों या शाखाओं के बजाय सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल होता है। उपयोगकर्ता अपने क्रिप्टो टोकन उधार देकर ब्याज कमा सकते हैं, अपने पास मौजूद क्रिप्टो के बदले उधार ले सकते हैं, और एक टोकन को दूसरे टोकन से बदल (स्वैप कर) सकते हैं।
मौजूद क्रिप्टो की वैल्यू 1 बिलियन यूएस डॉलर से अधिक
यह सब 'स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट' कहे जाने वाले ऑटोमेटेड कंप्यूटर प्रोग्राम के जरिए होता है। 2018 में शुरू हुआ यह प्लेटफॉर्म अब मुख्य रूप से "फ्लुइड" नाम से काम करता है। यह अपने प्लेटफॉर्म पर होने वाले हर लोन, उधार लेने की प्रक्रिया और स्वैप पर छोटी फीस लेकर कमाई करता है। ओपन-सोर्स डेटा के अनुसार, इस प्लेटफॉर्म पर मौजूद क्रिप्टो की वैल्यू एक बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक है और अब तक कुल फीस के रूप में लगभग 149 मिलियन अमेरिकी डॉलर की कमाई हुई है। इस प्लेटफॉर्म का अपना क्रिप्टो टोकन भी है, जो इसके संस्थापकों, टीम और शुरुआती निवेशकों को दिया गया था। इन टोकन को क्रिप्टो एक्सचेंजों पर बेचा जा सकता है।
यहां से विदेशों में गया धन
हालांकि यह प्लेटफॉर्म अमेरिका में रजिस्टर्ड एक कंपनी (इंस्टैडैप लैब्स एलएलसी, डेलावेयर) द्वारा संचालित दिखाया गया है, लेकिन जांच से पता चला है कि यह केवल कागजों पर मौजूद एक कंपनी (पेपर एंटिटी) है। इसके संस्थापक तथा डेवलपमेंट टीम भारत से काम करते हैं। जांच में यह भी सामने आया कि इस संस्था ने इंस्टैडैप प्रोटोकॉल से हुई कमाई को फेमा नियमों का पालन किए बिना, ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स, सिंगापुर और संयुक्त अरब अमीरात जैसे 'टैक्स हेवन' (कम टैक्स वाले देशों) के रास्ते से भेजा। इसी आधार पर, फेमा की धारा 37 के तहत बेंगलुरु में दो जगहों और मध्य प्रदेश में एक जगह पर तलाशी अभियान (सर्च ऑपरेशन) चलाया गया।
'टैक्स हेवन' देशों में रजिस्टर्ड कागजी कंपनी
इंस्टैडैप/फ्लुइड के संस्थापकों ने इसे अमेरिका स्थित एक विदेशी, डिसेंट्रलाइज्ड बिजनेस के रूप में पेश किया है, लेकिन तलाशी के दौरान मिले सबूतों से पता चला है कि इसे भारत से ही मैनेज किया जाता है। इसके प्रबंधन में संस्थापकों में से एक, सौमय जैन भी शामिल हैं। तलाशी से पता चला कि संस्थापक कई ऐसी कागजी कंपनियों (पेपर एंटिटीज) को चला रहे थे, जो 'टैक्स हेवन' (कम टैक्स वाले देशों) में रजिस्टर्ड थीं। इनमें इंस्टैडैप लैब्स इंक (डेलावेयर), इंटरऑप लैब्स लिमिटेड और समरस्पीक लिमिटेड (ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स), अपसर्ज लैब्स प्राइवेट लिमिटेड और भिंडी लैब्स प्राइवेट लिमिटेड (सिंगापुर), तथा पेबल लैब्स टेक्नोलॉजी लिमिटेड (दुबई) शामिल हैं। इन 'शेल एंटिटीज' (कागजी कंपनियों) का अपने रजिस्ट्रेशन वाले स्थानों पर न तो कोई फिजिकल ऑफिस था और न ही कोई कर्मचारी। ये कंपनियां विदेशी मुद्रा में हुई कमाई को भारत भेजने के लिए एक आड़ (फ्रंट) के रूप में काम कर रही थीं। पूरा 'डेफी' प्रोटोकॉल और उससे जुड़ी गतिविधियां भारत से ही संचालित की जा रही थीं।
वॉलेट्स, यहां से किया जा रहा नियंत्रित
तलाशी अभियान से पता चला है कि 'इंस्टैडैप डेफी प्रोटोकॉल' से हुई कमाई और निवेशकों से जुटाई गई रकम, 'इंटरऑप लैब्स लिमिटेड (बीवीआई)' के मल्टी-सिग्नेचर वॉलेट में 'स्टेबलकॉइन्स' के रूप में प्राप्त हुई थी। इन वॉलेट्स को भारत में मौजूद लोग नियंत्रित करते हैं। इन स्टेबलकॉइन्स को 'इंडिपेंडेंट रिज़र्व सिंगापुर' और 'क्यूसीपी कैपिटल, सिंगापुर' में बेचा गया। इससे प्राप्त रकम को 'अपसर्ज लैब्स प्राइवेट लिमिटेड' और 'भिंडी लैब्स प्राइवेट लिमिटेड', जो कि एक ही ग्रुप की कंपनियां हैं, के सिंगापुर स्थित बैंक खातों में जमा किया गया। इन बैंक खातों से पैसा भारत में मौजूद कंपनियों को भेजा गया, जिसे फर्जी सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट और कंसल्टेंसी फीस के रूप में दिखाया गया।
सिंगापुर के बैंकों के प्रीपेड कार्ड का इस्तेमाल
इसके अलावा, भारत में मौजूद कंपनियों के खर्चों का भुगतान करने के लिए सिंगापुर के बैंकों के प्रीपेड कार्ड का इस्तेमाल किया गया। तलाशी के दौरान यह भी पता चला कि सिंगापुर के बैंक खातों से पैसा 'इंस्टैडैप डेफी प्लेटफॉर्म' के संस्थापकों के दुबई स्थित बैंक खातों में भेजा गया था। शुरुआती जांच से पता चला है कि इसमें फेमा, 1999 (फेमा) के नियमों का उल्लंघन हुआ है, जो लगभग 40 मिलियन अमेरिकी डॉलर की राशि से जुड़ा है। मामले में आगे की जांच अभी जारी है।