ऑपरेशन मोबिलाइजेशन (ओएम इंडिया) चैरिटी समूह द्वारा भारत भर में संचालित गुड शेफर्ड स्कूलों के छात्रों से ली गई ट्यूशन फीस और सहायक शुल्क में बड़े पैमाने पर गबन किया गया है। ट्यूशन फीस को दान बताकर 296 करोड़ रुपये का गबन कर दिया। सरकार से पर्याप्त सब्सिडी ली, मगर उसका फायदा छात्रों को नहीं दिया। 'अपराध की आय' से एकत्रित की गई राशि का इस्तेमाल कई जगहों पर किया गया। धर्म विशेष के प्रचार में भी राशि का इस्तेमाल हुआ। छात्र डेटा में हेरफेर में एक ही व्यक्ति को कई छात्र कोड दिए गए। अलग-अलग वर्षों के लिए अलग-अलग छात्र कोड जारी किए गए। जांच एजेंसी के मुताबिक, विदेशों से भारी मात्रा में आर्थिक मदद इसलिए दी जाती थी ताकि दलित और हाशिए पर रह रहे बच्चों की बेहतर शिक्षा देकर उनका उत्थान किया जा सके। दलित छात्राओं को 'जोगिनी' (यौन शोषण की शिकार मंदिर की परिचारिकाएं) बताकर गलत जानकारी दी। आरोपी संस्था ने इसके जरिए विदेशी धन हासिल किया।
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), हैदराबाद क्षेत्रीय कार्यालय ने धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए), 2002 के तहत 3.58 करोड़ रुपये मूल्य की 12 अचल संपत्तियों को अस्थायी रूप से कुर्क किया है। यह कार्रवाई ऑपरेशन मोबिलाइजेशन (ओएम इंडिया) चैरिटी समूह द्वारा भारत भर में संचालित गुड शेफर्ड स्कूलों के छात्रों से ली गई ट्यूशन फीस और सहायक शुल्क के बड़े पैमाने पर गबन, साथ ही सरकारी अनुदान प्राप्त शिक्षा के अधिकार (आरटीई) और छात्रवृत्ति राशि के गबन की जांच के संबंध में की गई है। कुर्क की गई संपत्तियों का वर्तमान बाजार मूल्य लगभग 15 करोड़ रुपये आंका गया है।
ईडी ने ईओडब्ल्यू, सीआईडी, तेलंगाना द्वारा आईपीसी, 1860 की विभिन्न धाराओं के तहत ओएम इंडिया संस्थाओं और उसके प्रमुख पदाधिकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर के आधार पर उक्त केस की जांच शुरू की थी। सीआईडी ने ऑपरेशन मर्सी इंडिया फाउंडेशन (ओएमआईएफ) और संबद्ध संगठनों के भीतर एक बड़े पैमाने पर संगठित धोखाधड़ी का पर्दाफाश किया, जिसमें विदेशी और घरेलू दान में लगभग 296.6 करोड़ रुपये का डायवर्जन और गबन शामिल था। सीआईडी द्वारा दायर आरोपपत्र के अनुसार, डॉ जोसेफ डिसूजा, उनके बेटे जोश लॉरेंस डिसूजा और अन्य प्रमुख पदाधिकारियों ने दलित फ्रीडम नेटवर्क (डीएफएन) यूएसए, कनाडा और यूके जैसे प्रमुख ईसाई चैरिटी नेटवर्क सहित दानदाताओं से प्राप्त धन को व्यवस्थित रूप से डायवर्ट किया। यह मदद, दलित और हाशिए पर रह रहे बच्चों की शिक्षा एवं उत्थान के लिए थी।
फोरेंसिक ऑडिट से यह भी पता चला है कि छात्र शिक्षा प्रायोजन के लिए विदेशी दाताओं को प्रस्तुत किए गए छात्र डेटा में बड़े पैमाने पर हेरफेर किया गया था। सभी छात्रों से नियमित ट्यूशन फीस और अन्य शुल्क एकत्र किए गए थे। उन्हें गलत तरीके से 'स्थानीय दान' के रूप में दर्ज किया गया।
ईडी की जांच से पता चला है कि ओएमआईएफ़ को दलित और समाज के अन्य हाशिए पर पड़े वर्गों के छात्रों की शिक्षा और स्कूलों के निर्माण व संचालन से संबंधित अन्य सहायक खर्चों के लिए विदेशी प्रायोजन से बड़ी मात्रा में धन प्राप्त हुआ था। ईडी द्वारा ओएमआईएफ़ इंडिया के कार्यालयों और प्रमुख पदाधिकारियों के आवासों पर की गई तलाशी में संपत्ति के दस्तावेज़, वित्तीय रिकॉर्ड और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण ज़ब्त किए गए हैं। उनकी जाँच से पता चला कि छात्र प्रायोजन डेटा में जानबूझकर हेराफेरी की गई थी। इसका उद्देश्य प्रायोजित बताए गए छात्रों की संख्या को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाना और अतिरिक्त विदेशी दान प्राप्त करने को उचित ठहराना था।
छात्र डेटा में हेरफेर में एक ही व्यक्ति को कई छात्र कोड देना, अलग-अलग वर्षों के लिए अलग-अलग छात्र कोड, एक ही कोड के तहत अलग-अलग छात्र, व्यक्तिगत विवरण (फोटो, जन्मतिथि और माता-पिता के नाम) में फेरबदल और ऊंचाई, वर्ग, जाति और लिंग जैसे अन्य मापदंडों में विसंगतियां शामिल थीं। आरोपी व्यक्तियों ने अवधारण सीमाओं का हवाला देते हुए ऐतिहासिक डेटा को रोकने का प्रयास किया।
जब्त किए गए इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड से पता चला है कि ओएमआईएफ ने कई वर्षों तक फैले व्यापक छात्र डेटासेट बनाए रखे थे। ईडी की जांच में यह बात साबित हो गई कि गुड शेफर्ड स्कूलों ने सभी छात्रों से नियमित शुल्क, पुस्तक शुल्क, वर्दी और बस शुल्क एकत्र किए, जिनमें पूरी तरह से प्रायोजित के रूप में दर्शाए गए छात्र भी शामिल थे। इससे अपराध की आय उत्पन्न हुई। स्कूलों को आरटीई और छात्रवृत्ति योजनाओं के तहत पर्याप्त सरकारी सहायता भी मिली, फिर भी छात्रों से पूरी फीस ली गई इस अपराध के तहत छात्र धन संग्रह और सरकारी सब्सिडी के दुरुपयोग से 15.37 करोड़ रुपये की आय अर्जित की गई।
2014-15 और 2016-17 के बीच, ओएमआईएफ द्वारा दर्ज पुस्तकों, वर्दी, टाई, बेल्ट और बस सेवाओं पर खर्च को धार्मिक गतिविधियों में संलग्न संस्था गुड शेफर्ड कम्युनिटी सोसाइटी (जीएससीएस) में स्थानांतरित कर दिया गया। ये राशियां सीधे छात्रों और अभिभावकों से एकत्र की गईं। जीएससीएस द्वारा स्थानीय दान के रूप में दर्ज की गईं। बाद में इनका उपयोग चर्च से संबंधित खर्चों और अचल संपत्तियों के अधिग्रहण के लिए किया गया। ईडी की जाँच से यह भी पता चला है कि स्थानांतरित धनराशि को संबद्ध संस्थाओं को उनकी मुख्य गतिविधियों के लिए भी भेजा गया। वरिष्ठ पदाधिकारियों द्वारा फिजूलखर्ची वाली विदेश यात्राओं के लिए इस्तेमाल किया गया। इसमें डॉ. जोसेफ डिसूजा और अन्य द्वारा बिज़नेस क्लास की यात्राएं शामिल थीं।
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स्थानांतरित धनराशि को फर्जी खर्चों में दिखाकर उससे प्रमुख पदाधिकारियों और उनके द्वारा नियंत्रित अन्य संस्थाओं के व्यक्तिगत नामों पर संपत्तियाँ खरीदने के लिए इस्तेमाल किया गया। जांच से पता चला है कि गुड शेफर्ड चर्चों के स्वयंभू आर्कबिशप डॉ. जोसेफ ग्रेगरी डिसूजा ने सभी समूह संस्थाओं पर व्यापक आध्यात्मिक, प्रशासनिक और रणनीतिक नियंत्रण का प्रयोग किया, जबकि उनके बेटे जोश लॉरेंस डिसूजा ने परिचालन और वित्तीय प्रमुख के रूप में कार्य किया। यह काम हेरफेर किए गए रिकॉर्ड को बनाए रखने, विदेशी प्रवाह का प्रबंधन करने, अंतर-संस्था हस्तांतरण का समन्वय करने और दाता संचार को संभालने के लिए जिम्मेदार थे।
यह भी सामने आया है कि डॉ. जोसेफ डिसूजा कई विदेशी दाता संगठनों के संस्थापक सदस्य थे। वे भारतीय संस्थाओं के संचालन के लिए धन जुटाने के मकसद से अक्सर विदेश यात्रा करते थे। विदेशी दाता संगठनों की वेबसाइटें भारत से अस्पष्ट या दुर्गम पाई गईं, जिससे पता चलता है कि नियामक जाँच को रोकने के लिए जानबूझकर प्रतिबंध लगाए गए थे। ओएम इंडिया समूह ने अधिक प्रायोजन राशि प्राप्त करने के लिए विदेशी दाताओं के सामने गुड शेफर्ड स्कूल की साधारण छात्राओं को 'जोगिनी' (यौन शोषण की शिकार मंदिर की परिचारिकाएं) बताकर गलत जानकारी दी। दाता वेबसाइटों और सोशल मीडिया पर नियमित छात्रों और असंबंधित बच्चों की तस्वीरें अपलोड की गईं। उन्हें जोगिनी बताया गया, जबकि इन बच्चों की ऐसी कोई पृष्ठभूमि नहीं थी और न ही कोई पुनर्वास कार्यक्रम मौजूद था।
जोगिनी पुनर्वास" के लिए दान 60-68 अमेरिकी डॉलर प्रति माह था, जबकि नियमित छात्र प्रायोजन के लिए यह 20-28 अमेरिकी डॉलर प्रति माह था, जिसके परिणामस्वरूप झूठे प्रतिनिधित्व के आधार पर अधिक धन उगाहने की घटनाएं हुईं। क्षेत्रीय सत्यापन के बाद, गृह मंत्रालय विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) ने कई ओएम इंडिया संस्थाओं के एफसीआरए लाइसेंसों का नवीनीकरण न करने का आदेश दिया। एफसीआरए, 2010 के उल्लंघन के लिए उनके एफसीआरए खातों को फ्रीज कर दिया। हालांकि, समूह नेतृत्व ने विदेशी दानदाताओं के साथ मिलीभगत करके, विदेशी धन प्राप्त करने के लिए वैकल्पिक तरीकों को अपनाया, एफसीआरए के तहत लगाए गए प्रतिबंधों के बावजूद मुद्रण-संबंधी वाणिज्यिक चालान की आड़ में उन्हें ओएम बुक्स फाउंडेशन (ओएमबीएफ) के माध्यम से भेजा।