सुप्रीम कोर्ट में निर्वाचन आयोग ने पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में मतदाता सूची के चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) का बचाव करते हुए कहा कि वास्तविक मतदाताओं के नामों को बड़े पैमाने पर हटाने के आरोप गलत हैं। चुनाव आयोग ने कहा कि बंगाल का 99 फीसदी का दावा अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर और महज अटकलें हैं। ये दावे राजनीति से प्रेरित हैं।
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चुनाव आयोग से मांगे थे अलग-अलग जवाब
सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने 11 नवंबर को डीएमके, सीपीआई (एम), कांग्रेस की पश्चिम बंगाल इकाई और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के नेताओं की ओर से क्रमशः तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया को चुनौती वाली याचिकाओं पर चुनाव आयोग से अलग-अलग जवाब मांगे थे। अलग-अलग हलफनामे में आयोग के सचिव पवन दीवान ने एसआईआर कराने के चुनाव आयोग के फैसलों के खिलाफ दायर याचिकाओं को खारिज करने की मांग की। तृणमूल सांसद डोला सेन और अन्य की याचिका पर 26 नवंबर को दायर 81 पृष्ठों के जवाबी हलफनामे में, आयोग ने कहा कि पश्चिम बंगाल में व्यापक मताधिकार से वंचित होने का आरोप राजनीतिक हितों के लिए बढ़ा-चढ़ाकर लगाया गया है।
'SIR मतदाता सूचियों की शुद्धता बनाए रखने के हित में हैं'
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 16, 19 और 22 के साथ अनुच्छेद 324 और 326 को नियम 21 ए के साथ पढ़ने पर यह स्पष्ट होता है कि चुनाव आयोग को सांविधानिक मताधिकार को सक्षम बनाने के लिए मतदाताओं की नागरिकता सहित पात्रता का आकलन करने की शक्तियां प्राप्त हैं। एसआईआर प्रक्रिया के संबंध में जारी दिशा-निर्देश पूरी तरह सांविधानिक हैं और मतदाता सूचियों की शुद्धता बनाए रखने के हित में हैं। हलफनामों में कहा गया है कि वर्तमान एसआईआर 24 जून और 27 अक्तूबर 2025 को जारी आदेशों के तहत जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के अनुच्छेद 324 और धारा 21(3) के तहत आयोग को प्रदत्त शक्तियों का उपयोग करते हुए संचालित की जा रही है। आयोग ने इस बात पर जोर दिया कि मतदाता सूची तैयार करना और उसका संशोधन एक सहकारी और सहभागी कार्य है।
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एसआईआर में किसे कौन सा दस्तावेज जमा करना है?
आयोग ने साफ किया कि सिर्फ उन्हीं मतदाताओं को गणना प्रपत्रों पर हस्ताक्षर करने और बाद में पूछे जाने पर दस्तावेज जमा करने की आवश्यकता है जो 2002 में आयोजित अंतिम राष्ट्रव्यापी एसआईआर में अपनी पात्रता का पता नहीं लगा सकते हैं। हलफनामों में इस बात पर जोर दिया गया है कि अनुच्छेद 326 के तहत पात्रता, नागरिकता, आयु, निवास और अयोग्यता का अभाव, तब तक मान लिया जाता है जब तक कि विपरीत जानकारी न मिले। इसलिए, मनमाने वर्गीकरण या अनुच्छेद 14 के उल्लंघन के आरोप गलत हैं।