चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के जरिये अपात्र व्यक्तियों को हटाने से चुनावों की पवित्रता बढ़ेगी। आयोग ने कहा, इस प्रक्रिया का मकसद मतदाता सूची की शुद्धता में जनता का विश्वास बहाल करना है।
एसआईआर को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर 88 पेज के जवाबी हलफनामे में आयोग ने कहा, पुनरीक्षण के दौरान मतदाता सूची में शामिल करने के लिए वोटर कार्ड, आधार और राशन कार्ड को वैध दस्तावेज के रूप में मंजूर नहीं किया जा सकता। आयोग ने कहा, यह जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के नियम 21(3) के तहत नए सिरे से वोटर लिस्ट के पुनरीक्षण की प्रक्रिया है। वोटर कार्ड मौजूदा सूची की प्रविष्टियों पर आधारित हैं और स्वयं पुनरीक्षण के अधीन हैं।
आयोग ने दोहराया, आधार कार्ड को मतदाता सूची में शामिल करने के लिए वैध दस्तावेज के रूप में मान्यता नहीं दी जा सकती क्योंकि यह नागरिकता स्थापित नहीं करता और केवल पहचान का प्रमाण है। आयोग ने इसके समर्थन में कई वैधानिक प्रावधानों और न्यायिक मामलों का हवाला दिया। एसआईआर के दौरान स्वीकार्य दस्तावेज की सूची से राशन कार्ड को बाहर किए जाने के लिए आयोग ने फर्जी कार्डों की मौजूदगी को वजह बताया। इसने केंद्र सरकार की सात मार्च की प्रेस विज्ञप्ति का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि उसने पांच करोड़ फर्जी राशन कार्ड निरस्त कर दिए हैं।
आयोग ने कहा कि इसके बावजूद वह एसआईआर के दौरान पहचान स्थापित करने के बेहद सीमित मकसद के लिए इन तीनों कार्डों की अनुमति दे रहा है। आधार का इस्तेमाल अन्य दस्तावेज के साथ पूरक के रूप में किया जा सकता है। आयोग ने हलफनामे में कहा, वोट का अधिकार जनप्रतिनिधित्व अधिनियम-1950 की धारा 16 व 19 के साथ संविधान के अनुच्छेद 326 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम-1951 की धारा 62 से प्राप्त होता है। इनमें नागरिकता, आयु और सामान्य निवास के संबंध में कुछ योग्यताएं निर्धारित हैं। अपात्र व्यक्ति को मतदान का अधिकार नहीं है। इसलिए, वह संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत मिले अधिकारों का उल्लंघन होने का दावा नहीं कर सकता।
किसी को विशेष प्राथमिकता नहीं
आयोग ने दलील दी कि उसकी ओर से एसआईआर के तहत जारी गणना पत्र में मांगी जानकारियां नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 3 के प्रावधानों से जुड़ी हैं। इन्हें मनमाना, अनुचित या अन्यायपूर्ण बताकर चुनौती नहीं दी जा सकती।
हलफनामे में कहा है, न्यायपालिका के सदस्यों, विशेष पदों पर आसीन लोगों, जनप्रतिनिधियों और कला, संस्कृति, पत्रकारिता, खेल व सार्वजनिक सेवाओं के क्षेत्रों की हस्तियों को एसआईआर प्रक्रिया में प्राथमिकता दिए जाने का दावा सरासर झूठ है। यह झूठा दावा गलत समझ पर आधारित है। आयोग ने कहा, बिहार से अस्थायी रूप से अनुपस्थित प्रवासियों को छोड़कर, हर मौजूदा मतदाता को, बीएलओ उनके घर जाकर पहले से भरे गणना फॉर्म उपलब्ध कराते हैं।
अनुच्छेद 14, 19 और 21 का कोई उल्लंघन नहीं
आयोग ने कहा, कोई भी व्यक्ति जो 26 जुलाई तक पात्रता दस्तावेज पेश करने में असमर्थ रहता है, वह दावा और आपत्ति अवधि में दस्तावेज जमा कर सकता है। पूरी प्रक्रिया में किसी भी व्यक्ति के साथ नस्ल, जाति, धर्म या लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जा रहा। न ही नामांकन चाहने वाले एक जैसे व्यक्तियों के साथ अलग-अलग व्यवहार किया जा रहा, इसलिए संविधान के अनुच्छेद 14 और 325 का भी कोई उल्लंघन नहीं हुआ है। अनुच्छेद 19 और 21 के उल्लंघन के आरोपों पर आयोग ने कहा, अभिव्यक्ति और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकारों पर एसआईआर के जरिये कोई रोक नहीं लगती। इन्हीं के तहत नागरिकों को अपनी पसंद के उम्मीदवारों को मतदान करने का अधिकार मिलता है।
90 फीसदी मतदाताओं ने गणना फॉर्म जमा किए
आयोग ने कहा, बिहार में 90 फीसदी मतदाता पहले ही गणना प्रपत्र जमा कर चुके हैं। सभी राजनीतिक दल इस प्रक्रिया में शामिल रहे हैं क्योंकि उन्होंने हर पात्र मतदाता तक पहुंचने के लिए बीएलओ के साथ मिलकर काम करने के लिए 1.5 लाख से अधिक बीएलए नियुक्त किए हैं।
ये भी पढ़ें:- SIR: बिहार मतदाता सूची पुनरीक्षण को लेकर संसद में विपक्ष का प्रदर्शन, प्रक्रिया को वोट चोरी की कोशिश करार दिया
ये भी पढ़ें:- India Vice President: धनखड़ के इस्तीफे के बाद नीतीश कुमार का नाम! बिहार चुनाव के पहले उठी इस बात में कितना दम?