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'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' का जमीनी असर नहीं, व्यापारियों का आरोप- विभागीय भ्रष्टाचार बढ़ा, बाजार ठप

Sun, 06 Sep 2020 06:50 PM IST
योगेश साहू अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली।

सार

  • ईज ऑफ डूइंग बिजनेस में आंध्रप्रदेश के बाद उत्तर प्रदेश दूसरे स्थान पर
  • यूपी के बिजनेस हब गाजियाबाद और नोएडा के व्यापारियों ने कहा- देनी पड़ रही रिश्वत
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' का मूल विचार व्यापारियों को व्यापार करने के लिए लालफीताशाही और भ्रष्टाचार से मुक्त वातावरण उपलब्ध कराना है। इस पैमाने पर उत्तर प्रदेश को वर्ष 2020 में दूसरे स्थान से नवाजा गया है। हालांकि व्यापारियों के मुताबिक जमीनी हकीकत इससे कोसों दूर है।

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पिछले वर्ष के मुकाबले इस वर्ष यूपी ने 10 पायदान का सुधार किया है। लेकिन प्रदेश के शीर्ष व्यापारियों, बाजार संगठनों का कहना है कि प्रदेश सरकार की अच्छी कोशिशों के बावजूद जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार बढ़ा है। उन्हें अपना कामकाज करवाने के लिए पहले की तुलना में ज्यादा रिश्वत देनी पड़ रही है। 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' का जमीन पर कोई असर नहीं दिख रहा है और यूपी के बिजनेस हब के रूप में विख्यात गाजियाबाद और नोएडा में इस दौरान कोई नया बड़ा व्यापार शुरू नहीं हुआ है।

गाजियाबाद इंडस्ट्रीज फेडरेशन के महासचिव अनिल गुप्ता के मुताबिक राज्य सरकार ने व्यापार करना आसान बनाने का काम अवश्य किया है, लेकिन जमीनी हालात यही हैं कि कारोबारियों को अभी भी अपने कामकाज के लिए विभागीय अधिकारियों को रिश्वत देनी पड़ती है। इसमें बढ़ोतरी ही हुई है। कुछ क्षेत्रों में डिजिटलीकरण के कारण लालफीताशाही में कुछ कमी अवश्य हुई है, लेकिन ज्यादातर मामलों में असर नहीं हुआ है।
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कपड़ा उद्योग व्यापार संघ के उपाध्यक्ष राजीव अग्रवाल कहते हैं कि अगर 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' का असर होता तो इसी दौरान क्षेत्र में नए व्यापार, फैक्ट्री या अन्य कामकाज शुरू होते। लेकिन पूरे एनसीआर में पिछले वर्ष से अब तक कोई नया कामकाज नहीं शुरू हुआ है।

बाजार में मांग कम होने के कारण कोई भी नया उद्योग नहीं लगा रहा है। पहले से काम कर रहे उद्योग भी बेहद खराब स्थिति में चल रहे हैं। राजीव अग्रवाल के मुताबिक नोटबंदी से लेकर कोरोना से पैदा हुई आर्थिक सुस्ती तक की स्थिति हजारों फैक्ट्रियों के लिए तालाबंदी की तरह साबित हुई है। पूरे देश को रेडीमेड कपड़े उपलब्ध कराने वाली अनेक गार्मेंट्स फैक्ट्रियों ने कामकाज समेट लिया है।

न के बराबर बिक रहे फ्लैट 
पिछले एक दशक में दिल्ली-एनसीआर एरिया में रियल स्टेट बिजनेस इसकी मजबूत आर्थिक ताकत बनकर उभरा था। लेकिन मांग में कमी के कारण रियल स्टेट सेक्टर में भी तालाबंदी जैसी स्थिति है। एनसीआर के एक बड़े बिल्डर फर्म के शीर्ष अधिकारी के मुताबिक बाजार में मांग न के बराबर है। गिनती के फ्लैट सेल हो रहे हैं। कोई बिल्डर नया प्रोजेक्ट शुरू करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। इस समय 'रेडी टू मूव फ्लैट' न के बराबर रह गए हैं।

अधिकारी के मुताबिक पिछली योजनाओं के फ्लैट ही किसी तरह तैयार कर बेचने की कोशिश है। अब नवरात्र, दशहरा और दिवाली का सीजन आ रहा है जब इसकी सेल सबसे ऊपर रहती है, लेकिन अभी तक बाजार में ग्राहक नजर नहीं आ रहे हैं। कोरोना काल में लोगों को अपनी नौकरियों को लेकर भारी अनिश्चितता है। यही कारण है कि लोग फ्लैट जैसी लंबी अवधि की योजनाओं में पैसा डालने से डर रहे हैं।

केंद्र सरकार ने रियल स्टेट बाजार को गति देने के लिए 25 हजार करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता का एलान किया था, परंतु अभी तक बिल्डरों को इसका लाभ नहीं मिल पाया है। जब तक बाजार में तेजी नहीं आती और अनिश्चितता दूर नहीं होती, यही स्थिति बनी रहेगी। 

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