भाजपा अध्यक्ष अमित शाह हैदराबाद गए थे और लौट आए लेकिन उन्हें कानों-कान भनक नहीं लगी कि तेलंगाना के सीएम विधानसभा भंग करने की तैयारी में हैं। शाह दिल्ली लौटे और उधर सीएम के पैरोकारों ने दिल्ली से बुलाई मीडिया टीम के सामने इसका संकेत देना शुरू किया। जब तक कोई कुछ समझ पाता, तबतक के. चंद्रशेखर राव ने आठ महीने पहले ही राज्य की विधानसभा भंग करके चुनाव कराने की सिफारिश कर दी। केसीआर की बेटी ने इसे पार्टी के हित में बताया तो बेटे केटीआर ने डीप स्टेटजी का हिस्सा। केटीआर ने तो दावा किया कि चुनाव बाद उनकी पार्टी फिर विधानसभा की 90 से अधिक सीटें लेकर आ रही है।
लोकसभा में भी वह एक सीट को छोड़कर सब जीत सकते हैं। मजे की बात यह है कि केसीआर, केटीआर दोनों राज्य में दूसरे नंबर की पार्टी कांग्रेस को बता रहे हैं। उनके मुताबिक अभी भाजपा का बस झंडा दिखाई दे जाता है। जबकि अमित शाह हैं कि भाजपा को राज्य की दूसरे नंबर की पार्टी बताते हैं। शाह को इसका भी दुख खल रहा है कि केसीआर ने भनक नहीं लगने दी और विधानसभा भी भंग करने की सिफारिश कर दी।
स्टालिन तो कलैइनार से भी चार हाथ आगे
डीएमके के दिवंगत चीफ कलैइनार एम करुणानिधि के काले चश्मे के भीतर के राज को जानना बड़ा कठिन होता था। राजनीति के धुरंधर कलैइनार की बाजीगिरी के सामने घुटने टेक देते थे। लेकिन ये तो उनके बेटे स्टालिन हैं। काला चश्मा भी नहीं लगाते, सपाट बोलते हैं, खुल्लम, खुल्ला राजनीति करते हैं, फिर भी इनकी राजनीति को समझना भाजपा के लिए टेढ़ी खीर बनता जा रहा है। स्टालिन भाजपा के नेताओं को अच्छा रिस्पांस देते हैं। संघ के एस गुरुमूर्ति की इज्जत करते हैं।
उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू की सलाह भी सुनते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संदेशों को मान देते हैं। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की राजनीतिक सदइच्छा का भी आदर करते हैं, लेकिन दस सितंबर को देश व्यापी प्रदर्शन में विपक्ष के अभियान में आसानी से शामिल हो जाने की घोषणा कर देते हैं। भाजपा के रणनीतिकारों को यही समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर कलैइनार के होनहार बेटे और डीएमके के कर्ता-धर्ता चाहते क्या हैं?
राफेल तो बिना ईधन के उड़ रहा
जब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी राफेल लड़ाकू विमान सौदे को अगले लोकसभा चुनाव तक का मुख्य मुद्दा बनाने का निर्णय ले रहे थे तो पार्टी के भीतर भी कईयों को यह बचकाना लग रहा था। पहले तो राहुल गांधी भी इसे इतना महत्व देने में हिचकिचा रहे थे, लेकिन वह जल्दी ही मामले की गहराई समझ गए। रही सही कसर पार्टी के वरिष्ठ नेता एके एंटनी ने पूरी कर दी। एंटनी मोदी सरकार द्वारा पुरानी निविदा को रद्द करने और नए मसौदे की तैयारी पर ही नाक भौं सिकोड़ ली थी। गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ने राफेल को उड़ाने का प्रयोग किया, लेकिन टेकऑफ के लिए इसका इंजन ही स्टार्ट नहीं हुआ।
इससे ज्यादा उड़ान जय शाह के मुद्दे ने भरी। कर्नाटक विधानसभा चुनाव के समय भी राफेल ठीक से करतब नहीं दिखा पाया। लेकिन मानसून सत्र के दौरान लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव हुआ, राहुल गांधी प्रधानमंत्री के गले लगे और इसके बाद से राफेल बिना ईधन के ही टेकऑफ करके करतब दिखा रहा है। राफेल का यह करतब अब रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण, रक्षा उत्पादन सचिव और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की समझ में भी जरा कम आ रहा है। जब टॉप लाइन समझने के लिए सिर खुजा रही है तो प्रधानमंत्री की हालत का भी अंदाजा लगाया जा सकता है।
दुबई शो
प्रधानमंत्री का मेडिसन स्वॉयर शो याद है न। किसी को भले याद न हो कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी खूब याद है। राहुल से पूछिए कि आप विदेश में जाकर प्रधानमंत्री और देश के अंदरुनी हालात पर हमले क्यों बोलते हैं तो राहुल के गाल में गड्ढा हो जाता है। वह बताते भी हैं कि यह सिलसिला उन्होंने नहीं प्रधानमंत्री ने शुरू किया था। कांग्रेस के रणनीतिकारों को तब तपाक से मेडिसन स्क्वॉयर आ जाता है। राहुल गांधी ने गुजरात विधानसभा चुनाव से ऐन पहले अमेरिका में अपनी बात रखी थी। इसके बाद वह भी विदेश दौरे पर जाते रहे, मोर्चा खोलते रहे।
अभी पिछले महीने यूरोप में धमाल मचाया था और अब अगले महीने (अक्तूबर) दुबई शो की तैयारी कर रहे हैं। दुबई शो में ठीक-ठाक भीड़ जुटाने पर काम हो रहा है। सैम पित्रोदा और कांग्रेस पार्टी के कुछ रणनीतिकार इसे अमलीजामा पहना रहे हैं। वैसे भी सऊदी अरब में भारतीयों की कमी नहीं है। ऐसे में पार्टी को उम्मीद है कि दुबई शो में 50 हजार लोग तो आ ही जाएंगे। माना जा रहा है कि 2019 और चार राज्यों के विधानसभा चुनाव से पहले यह राहुल की इमेज बिल्डिंग और मोदी सरकार को आईना दिखाने का सबसे बड़ा प्लेटफार्म हो सकता है। क्योंकि नवंबर में ही राजस्थान, म.प्र., छत्तीसगढ़, मिजोरम के विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं।
कहां है स्मृति ईरानी?
फायर ब्रांड नेता हैं। मानव संसाधन मंत्री थी तो रोज चर्चा में रहती थी। सूचना प्रसारण मंत्री बनी तो फिर चर्चा में रहने लगी, लेकिन जब-जब पर कतरे जाते हैं, खामोश हो जाती हैं। अब तो उनके चहेते अफसरों के भी पर कतरे जा रहे हैं। मानव संसाधन विकास मंत्रालय में प्रकाश जावड़ेकर पहले ही उनके चहेतों को निबटा चुके थे। अब सूचना एवं प्रसारण मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ चुपचाप अपना काम कर रहे हैं। जब ईरानी सूचना एवं प्रसारण मंत्री थी तो राठौड़ महकमें में राज्यमंत्री थे, लेकिन बहुत संभलकर रहते थे। यहां तक तो सब ठीक है। असल का मसला राज्यसभा टीवी का चल रहा है।
सूचना एवं प्रसारण मंत्री रहने के दौरान स्मृति ने अपने पूर्व वर्ती वेंकैया नायडू के काफी बड़े फैसले पलट दिए थे। अब वेंकैया के करीबी स्मृति को चेनल पर आने का अवसर देने में ही कंजूसी कर रहे हैं। यही स्थिति भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के टीम की है। वह भी बस काम चलाऊ तरीके से स्मृति जी से व्यवहार कर रहे हैं। हां, कुछ छुटभैय्या नेता जरूर दीदी का पैर छू लेते हैं। वहीं स्मृति ईरानी हैं कि सामने पड़ते ही बेहद आकर्षक विनम्र स्वभाव में होती हैं। आखिर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के खिलाफ अमेठी से चुनाव जो लडऩा है।
महागठबंधन का ऊंट....
महागठबंधन का ऊंट अब खड़ा हो रहा है। तनकर खड़ा हो जाएगा तो बैठेगा भी। यह हम नहीं महागठबंधन के बड़े रणनीतिकारों में से एक प्रमुख दल के नेता का कहना है। सूत्र का कहना है कि दिसंबर 2018 में इस ऊंट की हाईट, इसकी चाल सबका पता चल जाएगा। बताते हैं बसपा की माया से लेकर तृणमूल कांग्रेस की ममता तक को इसका पता है। उ.प्र., बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र समेत देश के हर हिस्से में विपक्ष बड़े राजनीतिक शक्ति के रूप में खड़ा दिखाई देगा। मायावती के बारे में पूछने पर पता चला है कि वह कांग्रेस के नेताओं को अपनी स्थिति से अवगत करा चुकी हैं। बसपा के तर्क से कांग्रेस भी सहमत है।
उमेश पंडित की ललकार
कांग्रेस के मीडिया विभाग के प्रभारी रणदीप सुरजेवाला चीखते हैं तो प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष शाह सुनते हैं। लेकिन सुरजेवाला को भी एक चीख कुछ ज्यादा परेशान कर रही है। यह चीख हरियाणा के उनके क्षेत्र कैथल से आ रही है। जमीनी नेता सुरजेवाला को पता है कि चुनाव में जीतना कितना अहम होता है, ऐसे में कैथल से आ रही चीख उन्हें खासा तंग कर रही है। यह चीख किसी और की नहीं, बल्कि उनके खिलाफ लगातार बागी हो रहे कांग्रेस पार्टी के उमेश पंडित की है। सुरजेवाला की सभाओं में जहां कुर्सियां खासी हैं, वहीं उमेश पंडित की जनसभा में भीड़ उमड़ रही है। वह कैथल से लेकर वंृदावन तक ब्राह्मण समाज की अलख जगा रहे हैं। खास बात यह है कि कैथल में होने वाली ब्राह्मण एकता रैली में सुरजेवाला का खुला विरोध हो रहा है। वहीं पार्टी के भीतर उमेश पंडित को सह देने वालों का हाथ लोगों को ढूंढे नहीं मिल रहा है।
मैं हूं न........2019
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष शाह ने लोगों से अपने काम पर ध्यान देने और 2019 की चिंता छोड़ देने के लिए कहा है। पार्टी वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी को मुख्य अभिभावक के तौर पर पेश कर रही है। अटल जी के देहावसान के बाद जोशी जी पूरी तरह किनारे पर हैं। पार्टी कार्यक्रम का निमंत्रण मिलने पर जाते हैं और लौट आते हैं। दूसरी कड़ी के नेताओं का भी यही हाल है। सब जैसा देश, वैसा भेष धारण किए हैं। संघ के नेता, कुछ सांसद, विधायक ही दबी जुबान से जमीनी स्तर पर खराब स्थिति का रोना रो रहे हैं। मजे की बात यह है कि इनमें से अधिकांश को पार्टी की रणनीतिक तैयारी की कोई खबर नहीं है।
पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने 2019 तक भाजपा की कमान अध्यक्ष अमित शाह के हाथ में दे रखी है। 19 राज्यों में भाजपा की सरकार है। भाजपा यह मानकर चल रही है, कि पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, तेलंगाना जैसे राज्यों में जहां वह सत्ता में नहीं है वहां भी नंबर दो पर। सरकार विरोधी लहर का फायदा उसे ही मिलेगा। 19 राज्यों में भी उसे अच्छा वोट मिलेगा। इतना ही नहीं भाजपा के पास एक करिश्माई नेता है। वह देश का प्रधानमंत्री है और जनता में मोदी की लोकप्रियता शीर्ष पर बनी हुई है।