दुनिया में इस वक्त इलेक्ट्रॉनिक कचरा (ई-कचरा) अधिक तेजी से बढ़ता हुआ कचरा है। साल 2018 में यह 48.5 मिलियन टन तक पहुंच चुका है। ई-कचरे की कीमत 62.5 बिलियन डॉलर है, जो कि अधिकांश देशों की जीडीपी से भी अधिक है।
ये आंकड़े वर्ल्ड इकोनोमिक फोरम की रिपोर्ट और ग्लोबल ई-वेस्ट मॉनिटर के तथ्यों पर आधारिक हैं।
बीते साल प्रमुख वाणिज्य एवं उद्योग मंडल एसोचैम और एनईसी (नेशनल इकोनॉमिक काउंसिल) द्वारा जारी एक रिपोर्ट में कहा गया था कि दुनिया में सबसे ज्यादा (ई-कचरा) पैदा करने वाले शीर्ष पांच देशों में भारत भी शामिल है। सूची में चीन, अमेरिका, जापान और जर्मनी का नाम भी शामिल था।
रिपोर्ट के अनुसार भारत में ई-कचरे में सबसे अधिक योगदान महाराष्ट्र (19.8 प्रतिशत) का है। वह सिर्फ 47,810 टन कचरे को सालाना रिसाइकिल कर दोबारा प्रयोग के लायक बनाता है।
क्या है ई-कचरा?
आमतौर पर ई-कचरे में कंप्यूटर के मॉनिटर, मदरबोर्ड, कैथोड रे ट्यूब (सीआरटी), प्रिंटेड सर्किट बोर्ड, मोबाइल फोन, चार्जर, कॉम्पैक्ट डिस्क, हेडफोन, एलसीडी, एयर कंडीशनर, रेफ्रिजरेटर आदि शामिल हैं।
एक अध्ययन में कहा गया है कि असुरक्षित ई-कचरे की रिसाइकिल के दौरान उत्सर्जित रसायनों के संपर्क में आने से तंत्रिका तंत्र, गुर्दे, मस्तिष्क विकार, सांस से संबंधित बीमारी, त्वचा विकार, गले में सूजन, फेफड़ों का कैंसर, दिल, यकृत को नुकसान पहुंचता है।