प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने राजनीतिक जीवन में कभी किसी ऐसे व्यक्ति पर दांव नहीं लगाया जो अब तक उनके लिए अहितकारी साबित हुआ हो। भाजपा अध्यक्ष, केंद्रीय मंत्री अमित शाह ने भी ऐसा ही किया है। दोनों की केमिस्ट्री खूब जमती है। राजनीति के गलियारे में भी यह आम है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय, भाजपा और मोदी सरकार-2 की चुनौतियां काफी बढ़ गई हैं।
प्रधानमंत्री मोदी जानते हैं कि इन चुनौतियों को बिना अमित शाह के पार नहीं पाया जा सकता। इसलिए उन्होंने गृहमंत्री के लिए अमित शाह को ही चुना है। इसी साल हरियाणा, महाराष्ट्र और असम में चुनाव होने हैं। प्रधानमंत्री ने स्थितियों को समझते हुए शाह को यह जिम्मेदारी दी है। चुनौतियों के समीकरण में ही पूर्व गृहमंत्री राजनाथ सिंह को रक्षा मंत्रालय का प्रभार सौंपा है।
भारतीय राजनीति में अटल-आडवाणी की जोड़ी प्रसिद्धि के शिखर पर रही है। कुछ मुद्दों पर गंभीर मतभेद होने के बाद भी अटल-आडवाणी में कभी मनभेद नहीं हुआ। आडवाणी ने कभी अटल की मुखालफत नहीं की। अंत तक आडवाणी ने संगठन की जिम्मेदारी बखूबी निभाई। भाजपा के संगठन में अनुशासन और धार लेकर आए। जब प्रधानमंत्री का चेहरा चुनने की बारी आई तो आडवाणी ने ही अटल बिहारी वाजपेयी का नाम सुझाया था।
इसके समानांतर प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री शाह का तालमेल और बेहतर है। भाजपा के एक महासचिव का कहना है कि अमित शाह वह सोच ही नहीं सकते जो प्रधानमंत्री को नापसंद हो। वह कहते हैं प्रधानमंत्री के सामने होने पर वह सम्मान में नजर तक नहीं उठाते। यही हाल प्रधानमंत्री मोदी का है। उन्होंने अपना आभा मंडल ऐसा बना रखा है कि किसी सहयोगी को भी अध्यक्ष (अमित शाह) के बारे में प्रधानमंत्री से कुछ कहने के पहले 100 बार सोचना पड़ता है। आडवाणी के एक सलाहकार कहना है कि वास्तव में देश के प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री में ऐसा ही तालमेल होने की जरूरत है।