बुंदेलखंड में सूखे की मार ने किसानों के हौसले पस्त कर दिए हैं। चित्रकूटधाम मंडल में आर्थिक तंगी के चलते पिछले चार वर्षों में 1021 किसानों ने खुदकुशी कर ली। सबसे ज्यादा 330 आत्महत्याएं बांदा में हुई हैं। आत्महत्या के ये आंकड़े राजस्व विभाग के अभिलेख में भी दर्ज हैं लेकिन अधिकारी इनके पीछे खेती की तबाही को नहीं मान रहे हैं। यही वजह है कि सभी पीड़ित किसान परिवारों को मुआवजा भी नहीं मिला है। नतीजा यह है कि ऐसे किसानों के घर वाले दाने-दाने को मोहताज हैं। बेसहारा परिवार मजदूरी को मजबूर हैं।
पिछले साल अतिवृष्टि व ओलावृष्टि की मार से बुंदेलखंड के किसान उबर भी नहीं पाए थे कि इस साल सूखे की चपेट में आ गए। बांदा के बाद सबसे अधिक झांसी में एक साल के दौरान 50 से अधिक किसानों ने आत्महत्या कर ली, हालांकि सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 18 किसानों ने ही आत्महत्या की है। इन किसानों के परिवारों को पिछले साल मई में झांसी आए मुख्यमंत्री ने सात-सात लाख रुपये का मुआवजा दिया था।
इससे इतर जिला आकांक्षा समिति ने जान गंवा चुके 52 किसानों के परिवारों को एक-एक लाख रुपये की धनराशि दी। वहीं ललितपुर में बीते दो वर्षों में आत्महत्या व सदमे से 38 किसानों की मौत हो गई। हालांकि सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक एक भी किसान ने आत्महत्या नहीं की है।
कर्ज में डूबे एक और किसान ने आग लगाकर दी जान
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बुंदेलखंड में प्राकृतिक आपदाओं से जूझते व कर्ज से दबे धरती पुत्रों की खुदकुशी करने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। गरौठा तहसील के ग्राम बंगरा में बृहस्पतिवार को एक और किसान ने रबी की फसल की कम उपज होने व बैंक का कर्ज न चुका पाने से चिंतित होकर अपने आप को आग के हवाले कर आत्महत्या कर ली।
घटना की सूचना पुलिस को देते हुए मृतक के भाई रामबाबू यादव ने बताया कि कालीचरण (42 वर्ष) ने केसीसी कार्ड पर कर्ज लिया था और वह रबी की फसल की उपज काफी कम होने के कारण ऋण चुकाने की स्थिति में नहीं था। इसके चलते कालीचरण काफी चिंतित रहता था। बृहस्पतिवार को उसने मकान के अंदर अपने शरीर पर मिट्टी का तेल डालकर आग लगाकर आत्महत्या कर ली। पुलिस मामले की जांच कर रही है।
पहले खेत, अब गले सूखे
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अकालग्रस्त जनपद में जहां पानी के अभाव में खेत सूखे पड़े हैं, वहीं अब गर्मी शुरू होते ही गांव वालों के हलक भी सूखने लगे हैं। ग्राम ठाठखेरा की 1200 की आबादी मात्र एक हैंडपंप पर निर्भर हो गई है। इस गांव में सात हैंडपंपों ने पानी देना ही बंद कर दिया है।
बार ब्लॉक के ग्राम ठाठखेरा में इस साल किसानों के खेतों में खाने लायक अनाज भी बमुश्किल पैदा हुआ है। गांव में किसानों की करीब पंद्रह सौ एकड़ जमीन पर खेती होती है, लेकिन सूखे के कारण केवल सौ एकड़ खेत में ही फसल बोई गई थी, जिन खेतों में फसल बोई गई थी, उनमें फसल की पैदावार से बीज, खाद व डीजल की लागत भी नहीं निकल सकी है। गांव की आबादी लगभग 1,200 है, जबकि पूरे गांव में केवल एक हैंडपंप ही काम कर रहा है।
इस हैंडपंप पर पूरे गांव के लोगों को पानी भरने के लिए नंबर लगाना पड़ता है। 40 डिग्री सेल्सियस तापमान में जहां ज्यादातर लोग घरों से निकलना पंसद नहीं करते हैं, वहीं ग्राम ठाठखेरा के इकलौते चालू हैंडपंप पर महिलाओं को कपड़े धोते, जानवरों को पानी पिलाते व घर के लिए पानी भरते हुए दिनभर देखा जा सकता है। पूरे गांव में आठ हैंडपंप है, जिनमें से सात हैंडपंप सूख चुके हैं। (ललितपुर से कपिल नायक की रिपोर्ट)