सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि किसी आपराधिक मामले को अनुचित सीमा तक खींचना उत्पीड़न जैसा है। यह कार्यवाही का सामना कर रहे व्यक्ति के लिए मानसिक कारावास के समान है। भ्रष्टाचार मामले में दोषी महिला की सजा कम करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की।
न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया और न्यायमूर्ति एएस चंदुरकर की पीठ ने कहा कि यह घटना 22 वर्ष पहले घटित हुई थी और महिला अब 75 वर्ष की हो चुकी है। अदालत ने उन पर लगाए गए जुर्माने को मूल जुर्माने से 25,000 रुपये अधिक कर दिया।
शीर्ष अदालत ने कहा कि जो व्यक्ति दोषसिद्धि के खिलाफ अपील करता है और हर दिन मुकदमे के परिणाम का इंतजार करता है, वह अपना समय परेशानी में बिताता है। न्याय प्रशासन की वर्तमान प्रणाली में जिसमें कार्यवाही अक्सर लंबी और असहनीय हो जाती है से व्यक्ति को मानसिक पीड़ा होती है।
कोर्ट ने कहा कि न्यायालयों द्वारा सजा देने की प्रक्रिया दंडात्मक, निवारक या सुधारात्मक जैसे सिद्धांतों पर आधारित होती है। प्रत्येक विचारधारा का सजा देने और उसकी उपयोगिता को समझाने का अपना उद्देश्य और प्रयोजन होता है। इन सिद्धांतों में सुधारात्मक दृष्टिकोण आधुनिक न्यायशास्त्र में तेजी से स्वीकार्य होता जा रहा है। सुधार को हमेशा प्रगतिशील माना जाता है।
पीठ ने कहा कि जब अपराध को कम करने वाली परिस्थितियां होती हैं, तो अदालत सजा कम करने की ओर झुकती है और उसका ध्यान अपराध पर होता है, अपराधी पर नहीं। समाज और व्यवस्था सजा का चयन करते समय सकारात्मकता के साथ अपराध को पोषित करेगी।"
शीर्ष अदालत में अपीलकर्ता ने दोषसिद्धि को चुनौती छोड़ दी और उसके वकील ने अदालत से सजा कम करने का अनुरोध किया। पीठ ने कहा कि दोषसिद्धि और सजा के अपने-अपने क्षेत्र हैं। दोषसिद्धि न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत साक्ष्य के आधार पर दर्ज की जाएगी, जिससे अपराध में अभियुक्त की संलिप्तता स्थापित होगी, दोषी व्यक्ति या दोषी को कब सजा दी जाएगी, यह तय करने के लिए कई कारक काम करेंगे।
पीठ ने कहा कि महिला को 31 दिनों तक कारावास में रहना पड़ा। तथ्यों और परिस्थितियों के हिसाब से उनके द्वारा पहले ही काटी गई कारावास की सजा पर्याप्त सजा मानी जाती है। जुर्माने की राशि बढ़ाते हुए पीठ ने इसे 10 सितंबर तक चुकाने का आदेश दिया। जुर्माना राशि का भुगतान न करने पर, सजा का मूल आदेश लागू हो जाएगा और उसे संबंधित अधिकारियों के समक्ष आत्मसमर्पण करना होगा।
यह था मामला
सर्वोच्च न्यायालय ने यह फैसला महिला की ओर से मद्रास उच्च न्यायालय के अगस्त 2010 के फैसले के खिलाफ दायर अपील पर सुनाया। हाईकोर्ट ने भी निचली अदालत के आदेश की पुष्टि की गई थी। निचली अदालत ने केंद्रीय उत्पाद शुल्क निरीक्षक के रूप में कार्यरत महिला को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के प्रावधानों के तहत दोषी ठहराया और उसे एक वर्ष के कारावास की सजा सुनाई थी। महिला पर आरोप था कि सितंबर 2002 में उसने 300 रुपये की अवैध रिश्वत की मांग की थी।