डॉ. राजगोपाल चिदंबरम
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भारत ने 1998 में राजस्थान के पोखरण में दूसरा परमाणु परीक्षण किया और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने देश को परमाणु संपन्न घोषित कर दिया। इस दौरान डॉ. राजगोपाल चिदंबरम भारत के परमाणु कार्यक्रम के प्रमुख थे। यही नहीं, इस मुकाम तक पहुंचने की जमीन तैयार करने वाले स्माइलिंग बुद्धा यानी 1974 के पोखरण परीक्षण में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही। उन्होंने न केवल सेना के साथ मिलकर गुपचुप ढंग से साइट तैयार कराई, बल्कि परीक्षण के लिए आवश्यक प्लूटोनियम को मुंबई से पोखरण पहुंचाने वाले सैन्य ट्रक में सवार होकर गए।
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की तरफ से आयोजित कई वैश्विक सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले देश के परमाणु हथियार कार्यक्रम में अहम योगदान के लिए चिदंबरम को हमेशा याद रखा जाएगा। 18 मई 1974 को पोखरण-1 परीक्षण में सक्रिय भूमिका निभाने वाले चिदंबरम 1967 से परमाणु हथियार विकसित करने के कार्यक्रम से जुड़े थे। पोखरण में 1998 के दूसरे परीक्षण में वह डीआरडीओ के तत्कालीन अध्यक्ष एपीजे अब्दुल कलाम के साथ सैन्य वर्दी में दिखे थे।
स्वदेशी सुपर कंप्यूटर के विकास की पहल की
चिदंबरम ने सुपर कंप्यूटर के स्वदेशी विकास की पहल करने तथा राष्ट्रीय ज्ञान नेटवर्क की संकल्पना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राष्ट्रीय ज्ञान नेटवर्क ने देशभर के अनुसंधान और शैक्षणिक संस्थानों को जोड़ा।
- उन्होंने ऊर्जा, स्वास्थ्य सेवा और रणनीतिक आत्मनिर्भरता जैसे क्षेत्रों में भी पहल की और कई परियोजनाओं का संचालन किया, जिससे भारत के विज्ञान और प्रौद्योगिकी परिदृश्य में उल्लेखनीय प्रगति हुई।
कई पुरस्कारों से किया गया सम्मानित
- चिदंबरम का जन्म 12 नवंबर 1936 को चेन्नई में हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा मेरठ के सनातन धर्म उच्च विद्यालय से प्राप्त की।
- आठवीं कक्षा से आगे उन्होंने चेन्नई के मायलापुर में पीएस उच्च विद्यालय से पढ़ाई की और प्रेसीडेंसी कॉलेज से स्नातक किया।
- बंगलूरू में भारतीय विज्ञान संस्थान से स्नातकोत्तर की पढ़ाई की। उन्हें 1975 में पद्मश्री और 1999 में पद्म विभूषण सहित कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।
- कई विश्वविद्यालयों से मानद डॉक्टरेट की उपाधि भी मिली और वह प्रतिष्ठित भारतीय और अंतरराष्ट्रीय विज्ञान अकादमियों के फेलो थे।
अहम पदों पर रहे
- 1962 में भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बार्क) का हिस्सा बने और 1990 में इसके निदेशक नियुक्त किए गए।
- 1993 में परमाणु ऊर्जा आयोग अध्यक्ष और परमाणु ऊर्जा विभाग सचिव के तौर पर देश के परमाणु कार्यक्रम का नेतृत्व किया, इस पद पर वह 2000 तक रहे।
- 2001 में सेवानिवृत्ति के बाद भारत सरकार के प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार नियुक्त किए गए और 2018 तक इस पद पर रहे।