जमीयत उलेमा ए हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने हिमंता सरकार पर असम में चुनाव से पहले मुसलमानों को जबरन निकालने का आरोप लगाया है। उन्होंने समाचार एजेंसी एएनआई के साथ एक साक्षात्कार में कहा कि असम में हर मुस्लिम को बांग्लादेशी बताया जा रहा है। साथ ही उन्होंने यह भी दावा किया कि असम में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए दिशा-निर्देशों का उल्लंघन किया जा रहा है। वहीं, मदनी के इस बयान की आलोचना भी शुरू हो गई है। भाजपा सांसद मनन कुमार मिश्रा ने इसकी आलोचना करते हुए उन्हें सुप्रीम कोर्ट जाने की नसीहत दी। ममन मिश्रा ने कहा कि मुझे नहीं लगता कि सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का कहीं भी उल्लंघन हो रहा है। अगर किसी भी तरह का उल्लंघन हुआ है, तो सुप्रीम कोर्ट के दरवाज़े सबके लिए खुले हैं, चाहे वो मदनी हों या कोई और।
वहीं, मौलाना महमूद मदनी के ज्ञानवापी और मथुरा पर बातचीत को लेकर दिए गए बयान पर उन्होंने कहा कि अगर दोनों पक्ष आपस में बैठकर अपने मसले सुलझा लें, तो बहुत अच्छा है। मामला अदालत से सुलझने के बजाय आपसी बातचीत से सुलझ जाए तो बेहतर है।
काशी और मथुरा के मुद्दे पर मुस्लिम समुदाय और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बीच वार्ता को लेकर उनके बयान का भाजपा नेता नलिन कोहली ने स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि अगर कोई भी पक्ष समाज में संवाद चाहता है, तो यह अच्छी बात है। साथ ही उनका यह बयान कि विदेशों से भारत आने वाले मुस्लिम घुसपैठिए गलत हैं, भी सही है। विदेशी घुसपैठियों को बचाने के लिए कुछ लोग राजनीतिक कारणों से देश के हितों की अनदेखी करते हैं। हमें ऐसे लोगों से ऐतराज़ है।
गौरतलब है कि समाचार एजेंसी एएनआई के साथ साक्षात्कार में जमीयत उलेमा ए हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने काशी और मथुरा के मुद्दे, पहलगाम आतंकी हमला, असम में विदेशियों का निष्कासन और समाज में भाषा की गिरती स्थिति के मुद्दे पर विस्तार से बात की।
ज्ञानवापी और मथुरा पर बातचीत करने को तैयार
इस दौरान मदनी ने काशी और मथुरा के मुद्दे पर मुस्लिम समुदाय और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बीच मोहन भागवत की बातचीत की हिमायत का समर्थन किया है। उन्होंने संवेदनशील धार्मिक मुद्दों पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आएसएस) प्रमुख मोहन भागवत की राय का भी स्वागत किया है। काशी-मथुरा के मुद्दे पर महमूद मदनी ने कहा कि उनके संगठन ने पहले ही बातचीत के पक्ष में एक प्रस्ताव पारित किया था, जिसमें जोर दिया गया था कि मतभेद होने के बावजूद, उन्हें कम करने के प्रयास किए जाने चाहिए। मदनी ने कहा, बहुत सारे अगर और मगर हैं...मेरे संगठन ने एक प्रस्ताव पारित किया कि जुड़ाव होना चाहिए। मतभेद हैं, लेकिन हमें कम करने की जरूरत है। हम बातचीत के सभी प्रयासों का समर्थन करेंगे। बता दें कि हाल ही में, आरएसएस प्रमुख ने ज्ञानवापी और मथुरा काशी पर बयान दिया। मदनी ने कहा मुस्लिम समुदाय तक पहुंचने के उनके (आरएसएस प्रमुख) प्रयासों की प्रशंसा और सराहना की जानी चाहिए।
प्रधानमंत्री, विपक्षी नेता सभी की भाषा का स्तर गिरा
मदनी ने कहा कि हाल के वर्षों में राजनीतिक भाषा और संवाद का स्तर गिर गया है। यहां तक कि प्रधानमंत्री मोदी भी समुदायों के लिए अनुचित भाषा बोलते हैं, और विपक्ष ने भी स्तर गिरा दिया है। मदनी ने असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा की टिप्पणियों पर भी कड़ी आपत्ति जताई और उन्हें अपमानजनक बताया। उन्होंने कहा, असम के मुख्यमंत्री की भाषा बेहद आपत्तिजनक है। वह राज्य के संरक्षक हैं, लेकिन जिस तरह की भाषा का वह इस्तेमाल कर रहे हैं वह गलत है। हम एक-दूसरे से असहमत हो सकते हैं, लेकिन मेरा उनसे आग्रह है कि बोलते समय सही शब्दों का इस्तेमाल करें।
पहलगाम आतंकी साजिश को भारतीय नागरिकों ने सूझबूझ से किया नाकाम
जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष महमूद मदनी ने पहलगाम आतंकी हमले की साजिश को नाकाम करने का श्रेय देश के नागरिकों को दिया है। उन्होंने कहा कि इस घटना के पीछे देश में समुदायों के बीच फूट डालने की साजिश थी, जिसे भारतीय नागरिकों ने समझदारी और धैर्य से विफल कर दिया। मदनी ने इसे ऑपरेशन सिंदूर से भी बड़ी उपलब्धि करार दिया। उन्होंने कहा कि अगर यह घटना किसी अन्य देश में हुई होती तो वहां भारी अराजकता फैल सकती थी।
मदनी ने कहा कि लोगों ने इस शर्मनाक घटना को नाकाम करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई। उन्होंने बताया कि हमलावरों ने लोगों के नाम पूछकर उनकी हत्या की, लेकिन भारतीय नागरिकों ने धैर्य और एकता दिखाई। मदनी ने कहा, हमारे देशवासियों ने हिंदू-मुस्लिम में विभाजन नहीं होने दिया। यह भारत की खूबसूरती है। उन्होंने भारतीय सेना के साथ खड़े होने को नागरिकों का कर्तव्य बताया और कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान विपक्ष ने भी सरकार का समर्थन किया। मदनी ने कहा, बार-बार, खासकर भारत के बाहर यह चर्चा होती है कि मुसलमानों का नरसंहार होगा। यह बात अक्सर कही जाती है, यहां तक कि मुझसे भी व्यक्तिगत रूप से कही जाती है, लेकिन मैं इस पर विश्वास करने को तैयार नहीं हूं। पहलगाम में आतंकवादियों ने जो किया, उसके बाद बहुत कुछ आसानी से हो सकता था। कम से कम कुछ अशांति तो हो सकती थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।