गधा, क्या अब अपने अंत की ओर चल पड़ा है, केंद्र सरकार के आंकड़े कुछ ऐसा ही बता रहे हैं। इसके साथ खच्चर भी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। तकरीबन आठ राज्य एवं केंद्रशासित प्रदेश तो ऐसे हैं, जहां गधे पूरी तरह खत्म हो गए। इनमें अरुणाचल प्रदेश, चंडीगढ़, दादरा नगर हवेली, दमन और द्वीप, गोवा, लक्षद्वीप, मिजोरम और मेघालय शामिल हैं। गुजरात में पांच खच्चर और 11286 गधे बचे हैं, जबकि दिल्ली में 136 खच्चर व 1087 गधों का अस्तित्व बताया गया है। गधों के मामले में राजस्थान सबसे आगे है। यहां पर 23374 गधे मौजूद हैं। खच्चर की संख्या में उत्तराखड़ टॉप पर है। इस पहाड़ी राज्य में 26293 खच्चर हैं।
बता दें कि गधा और खच्चर का अभी तक सरकारी कार्यों में इस्तेमाल होता रहा है। इसके लिए राज्य सरकारों ने बाकायदा एक रेट भी तय कर रखा था कि एक दिन में गधे या खच्चर को कितनी दिहाड़ी मिलेगी। रेलवे, भवन निर्माण, तालाब की खुदाई और दूसरे कार्यों में इन दोनों पशुओं को बुलाया जाता था, लेकिन अब जेसीबी व अन्य मशीनरी आने के बाद इनकी जरुरत खत्म सी हो गई है। पहाड़ी इलाकों में अभी इनकी पूछ हो जाती है। वहां स्थानीय कारोबार में इनकी भरपूर मदद ली जाती है। यही वजह है कि उत्तराखंड में 26 हजार से ज्यादा खच्चर हैं। जम्मू-कश्मीर में भी इनकी तादाद 16 हजार से अधिक बताई गई है।
आंध्रप्रदेश में गधों की संख्या 4678 है, जबकि बिहार में 11264 गधे हैं। गुजरात में भी 11286 गधे बताए गए हैं। महाराष्ट्र में 17572, जम्मू-कश्मीर में 9563, मध्यप्रदेश में 8135 और यूपी में 16016 गधे अभी सरकारी फाइलों में दर्ज हैं। खास बात है कि अंडमान निकोबार द्वीप समूह, अरुणाचल प्रदेश, चंडीगढ़, दादरा और नगर हवेली, दमन और दीव, केरल, लक्षद्वीप, मणिपुर, मेघालय, नागालैंड व पुड्डचेरी में कोई भी खच्चर नहीं है। मणिपुर में एक भी खच्चर नहीं है, जबकि यहां केवल दो गधे हैं। सिक्किम और नागालैंड में केवल दो-दो गधे बचे हैं। त्रिपुरा में दस गधे हैं। गोवा में एक भी गधा नहीं है। देश में कुल 84261 खच्चर और 123587 गधे बचे हुए हैं। आगे इन दोनों पशुओं को बचाने की योजना भी नहीं है।
बीमारियों से जिन पशुओं को बचाया जाएगा, उनमें गधे व खच्चर का जिक्र तक नहीं है...
मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी राज्य मंत्री डॉ. संजीव कुमार बालियान के मुताबिक, सरकार पशुधन को बचाने का प्रयास कर रही है। कुक्कुट रोगों के निवारण के लिए राज्य एवं संघ सरकारों के साथ मिलकर काम हो रहा है। पशुधन स्वास्थ्य और रोग नियंत्रण नामक केंद्रीय प्रायोजित योजना कार्यान्वित की जा रही है। सरकार ने आगामी पांच वर्षों के लिए जो योजना शुरु की है, उस पर 13.343 करोड़ रुपये खर्च होंगे। इसकी मदद से पशुओं को खुरपका और मुंहपका जैसे रोगों से बचाया जाएगा। गोपशु, भैंस, भेड़, बकरी और सूअर का टीकाकरण कर 2025 तक उक्त बीमारी को नियंत्रित किया जाएगा। 2030 तक सरकार इस बीमारी को पूरी तरह खत्म करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। सभी गौपशु, भैंस, भेड़, बकरी और सूअरों का सौ प्रतिशत छमाही टीकाकरण व मादा गोपशु एवं भैंस की बछियों का ब्रूसेलोसिस के लिए जीवन में एक बार सौ फीसदी टीकाकरण करने का लक्ष्य है।