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क्या मानवाधिकार में आता है इंटरनेट चलाना?

Sat, 21 Dec 2019 05:12 PM IST
Mohit Mudgal बीबीसी
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नागरिकता अधिनियम को लेकर देश में जगह-जगह विरोध प्रदर्शन जारी है। कई जगह प्रदर्शन हिंसक भी हुआ, जिसके बाद स्थिति पर काबू पाने के लिए पुलिस ने बल प्रयोग किया। एहतियात के तौर पर यूपी के कई जिलों में इंटरनेट सेवा बंद कर दी गई है। 

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पहले भी जब कई बार सरकार ने इंटरनेट सेवा बंद कर दी थी, तब कई मानवाधिकार संगठनों ने इसे मूल अधिकारों का उल्लंघन बताया था और अभिव्यक्ति की आजादी पर ताला कह कर इंटरनेट और फोन पर लगे प्रतिबंधों का विरोध भी किया था। आज हम आपको बताएंगे की क्या इंटरनेट चलाना मानवाधिकारों में आता है? 

दुनिया में बहुत से लोग इंटरनेट के इस्तेमाल की आजादी को बुनियादी मानवाधिकार मानते हैं। साल 2013 में फेसबुक के संस्थापक मार्क जकरबर्ग ने 10 पन्नों का एक श्वेत पत्र जारी किया था। इसमें उन्होंने संचार को बुनियादी अधिकार मानने के संबंध में अपने विचार रखे थे। इस श्वेत पत्र में जकरबर्ग ने इंटरनेट से महरूम दुनिया के पांच अरब लोगों को वर्ल्ड वाइड वेब से जोड़ने का प्रस्ताव रखा था और इसके तरीके भी सुझाए थे।
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मार्क जकरबर्ग का कहना था कि तमाम टेक कंपनियां मिलकर इंटरनेट.ओआरजी (internet.org) के नाम से एक साझा संगठन बनाएं। इसके तहत दुनिया भर के संचार नेटवर्क का विस्तार कर के दुनिया के तमाम लोगों को उसके दायरे में लाने का सुझाव था। इसके अलावा जकरबर्ग ने ऐसी नई तकनीकें विकसित करने का भी सुझाव दिया था, जिससे दूर दराज के इलाक़ों तक इंटरनेट पहुंचाया जा सके। जैसे कि सौर ऊर्जा से चलने वाले ड्रोन, जो सुदूर इलाकों में बिना तार के इंटरनेट सेवाएं दे सकें।

भरोसेमंद इंटरनेट सेवा की कमी

दुनिया की साढ़े सात अरब से ज्यादा आबादी में से आधे लोग एक भरोसेमंद इंटरनेट सेवा से महरूम हैं। इससे वो, शिक्षा, वित्तीय सेवाओं, राजनीतिक संवाद, बोलने की आजादी और दूसरे कई अधिकारों से महरूम रह जाते हैं।

ऐसे ही लोगों में से एक हैं, अफ्रिका के चाड देश के रहने वाले सलीम अजीम असानी, वो वेनाकलैब्स नाम के डिजिटल हब के संस्थापकों में से एक हैं। ये डिजिटल हब चाड की राजधानी एनजामेना में स्थित है। साल 2008 में चाड की सरकार ने फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया पर पाबंदी लगा दी थी।

चाड के सरकारी अधिकारियों का कहना था कि लोगों की ऐसे माध्यमों तक पहुंच से धार्मिक कट्टरवाद फैल रहा है। चाड में ये सेवाएं अगले 16 महीने तक बंद रही थीं। सलीम असानी कहते हैं कि इंटरनेट पर इस सरकारी पाबंदी की वजह से हमारा काफी पैसा डूब गया। कई ग्राहक दूर हो गए। उन्होंने ये कह कर हमारे ठेके रद्द कर दिए कि ये सोशल मीडिया के इस्तेमाल का सही वक्त नहीं है। हम कलाकारों और संगीतकारों के साथ काम करते हैं। इन्हें वीपीएन का इस्तेमाल आता ही नहीं, तो हमारा धंधा ही चौपट हो गया।

अफवाहों को रोकना मकसद?

आम तौर पर सरकारें ऐसी पाबंदियां लगाने के पीछे कानून-व्यवस्था का हवाला देती हैं। ताकि अराजकता न फैले। जैसे कि अप्रैल 2019 में ईस्टर धमाकों के बाद श्रीलंका ने सोशल मीडिया के प्रयोग पर पाबंदी लगा दी थी। श्रीलंका की सरकार का कहना था कि उन्होंने अफवाहों और गलत जानकारियां फैलने से रोकने के लिए ये पाबंदियां लगाई थीं।

जोशुआ फ्रैंको कहते हैं कि हम ऐसी रोक की संख्या के बजाय इनके असर को ज्यादा करीब से देखते हैं। आम तौर पर हमने देखा है कि अहम सार्वजनिक कार्यक्रमों से पहले या इनके दौरान, जैसे कि चुनाव या विरोध-प्रदर्शनों के समय, ऐसी पाबंदियां ज्यादा लगती हैं। ऐसे में हमें आशंका है कि ये बोलने की आजादी पर लगाम लगाने की कोशिश ज्यादा होती है।

इंटरनेट पर रोक बहुत कड़वी दवा है। लेकिन, कई बार इंटरनेट पर अलग तरह से भी पाबंदियां लगाई जाती हैं। मसलन, रूस की सरकार एक तरह का समांनांतर इंटरनेट बना रही है। ये इंटरनेट केवल रूस की सीमाओं में ही उपलब्ध होगा। 

इसके तैयार होने के बाद रूस की सरकार का लोगों के इंटरनेट इस्तेमाल करने पर पूरा नियंत्रण होगा। वो इंटरनेट पर क्या देख सकेंगे और क्या पोस्ट कर सकेंगे, हर चीज पर रूस के अधिकारियों की नजर होगी।

इसी तरह चीन में भी इंटरनेट पर बहुत सी पाबंदियां हैं। सरकार या देश विरोधी कंटेंट रोकने के नाम पर चीन ने इंटरनेट पर कई फिल्टर लगा रखे हैं। चीन ने कई वेबसाइट पर भी रोक लगा रखी है। इसीलिए जानकार इसे 'द ग्रेट फायरवॉल ऑफ चाइना' भी कहते हैं।

इंटरनेट का अधिकार भी मानवाधिकार

मार्क जकरबर्ग ने इंटरनेट.ओआरजी (internet.org) लॉन्च करने के दो साल बाद संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपनी पुरानी बात दोहराई की इंटरनेट सबके लिए है।

ऐसा विचार रखने वाले जकरबर्ग अकेले शख्स नहीं हैं। साल  2011 और 2016 की संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद् की रिपोर्ट में इंटरनेट पर लगाई जाने वाली पाबंदियों की आलोचना की गई थी।

दोनों ही बार ये माना गया था कि अभिव्यक्ति की आजादी की तरह ही इंटरनेट का अधिकार भी मानवाधिकार है। सलीम असानी कहते हैं कि इंटरनेट मानव अधिकार है। युवाओं को सोशल मीडिया के इस्तेमाल की आजादी होनी चाहिए। वो इंटरनेट का इस्तेमाल कर के अपना कारोबार भी खडा कर सकते हैं। इसलिए सबको इंटरनेट का इस्तेमाल करने की आजादी मिलनी चाहिए।

लेकिन, 'फादर्स ऑफ द इंटरनेट' के सदस्यों में से एक विंट सर्फ इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते। विंट ने ही इंटरनेट का टीसीपी/आईपी प्रोटोकॉल विकसित किया था।

इंटरनेट के बारे में 2011 की संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट आने के बाद विंट सर्फ ने न्यूयॉर्क टाइम्स में एक संपादकीय लिखा था। इसमें उन्होंने ये तर्क खारिज कर दिया था कि इंटरनेट एक मानवाधिकार है।

विंट सर्फ का कहना है कि तकनीक किसी अधिकार के इस्तेमाल में मददगार होती है और उसे अलग से अधिकार मानना गलत होगा। विंट ने अपने संपादकीय में लिखा कि एक दौर था जब आपके पास घोड़ा न हो तो आपके लिए रोजी कमाना मुश्किल था। इसका ये मतलब हुआ कि आप को रोजी कमाने का अधिकार है, न कि घोडा रखने का। इंटरनेट किसी लक्ष्य को प्राप्त करने का माध्यम है, खुद कोई मंजिल नहीं है।

सुर्खियों से परे, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की सोच भी यही है। साल 2011 और 2016 में जारी इसकी रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया था कि इंटरनेट के माध्यम से लोग अपनी आवाज उठा सकते हैं, जानकारी जुटा सकते हैं और किसी मसले पर राय रख सकते हैं। लेकिन, मानवाधिकार परिषद ने इंटरनेट को एक मानवाधिकार नहीं माना था।

इसमें कोई दो राय नहीं कि सबके फायदे के लिए काम करने वाला इंटरनेट कुछ पाबंदियों के साथ मिलता है। फ्रैंको भी मानते हैं कि मुश्किल हालात में इंटरनेट का उपयोग सीमित करना गलत नहीं है।

वो कहते हैं कि आप को आजादी हासिल है, इसका ये मतलब नहीं कि आप भीड़ भरे ठिकाने पर आग चिल्लाकर वहां भगदड़ मचा दें।

इंटरनेट में अवैध की परिभाषा कैसे तय हो?

कई दशकों से नियामक संस्थाएं वेब के बढ़ते जाल पर नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास कर रही हैं। इस बारे में कई कानून बनाए गए हैं ताकि, पाइरेटेड संगीत और फिल्में, ड्रग बेचने, बच्चों की पोर्नोग्राफी, आतंकवादी दुष्प्रचार, नफरत भरे भाषण और अराजकता फैलाने वाले दूसरे अपराधों पर लगाम लगा सकें।

लेकिन, अरबों लोगों की पहुंच वाले नेटवर्क के साथ दिक्कत यही है कि अवैध क्या है, इसकी परिभाषा सबके लिए अलग है। ये केवल दो देशों के बीच का मसला नहीं है।

फ्रैंको कहते हैं कि फेसबुक या किसी और तकनीकी कंपनियों की नीतियों को तो आप संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार घोषणापत्र की जगह नहीं अपना सकते हैं। इंटरनेट के अपने अधिकार मांगने का मतलब ये है कि आप इसे लेकर आक्रामक रवैया रखें। इस काम में एक गैर लाभकारी संस्था वर्ल्ड वाइड वेब फाउंडेशन जुटी हुई है।

इस साल नवंबर में ही बर्लिन में होने वाली इंटरनेट गवर्नेंस फोरम में कॉन्ट्रैक्ट फॉर वेब के नाम से एक घोषणापत्र जारी किए जाने की तैयारी है। वर्ल्ड वाइड वेब फाउंडेशन की पॉलिसी डायरेक्टर एमिली शार्प कहती हैं कि इस कॉन्ट्रैक्ट का लक्ष्य सबको इंटरनेट मुहैया कराना और इसके जरिए हर नागरिक का सशक्तिकरण करना है।

इस दस्तावेज में सबके लिए इंटरनेट मुफ्त में और खुली व्यवस्था के तहत लाने का प्रस्ताव है। हकीकत की दुनिया का विजन रखने वालों के लिए ये इंटरनेट घोषणापत्र जैसा है, जिसके माध्यम से सभी को इंटरनेट से जोडे रखने की कोशिश होगी।

तमाम सरकारें हों या कंपनियां, वो इस पर दस्तखत कर के मुफ्त इंटरनेट का वादा कर सकती हैं।
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लोगों को जोड़ना ही एक मकसद नहीं

एमिली कहती हैं कि इंटरनेट जब नया था, तो इसने मानवाधिकारों का दायरा बढ़ाने में मदद की। लेकिन, जैसा कि हर तकनीक के साथ होता है, इंटरनेट का शुरुआती उत्साह भी ठंडा पड़ गया। इसके नए-नए प्रयोग से हमें इसके खतरों के बारे में भी पता चला।

जोशुआ फ्रैंको कहते हैं कि नफरत भरे भाषण का लोग अलग तरह से दुरुपयोग करते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि लोग नफरत भरी बातें इंटरनेट से फैलाते हैं। महिलाओं के प्रति हिंसक बर्ताव की बहुत सी मिसालें ऑनलाइन दुनिया में मिलती हैं। इसी वजह से कई बार अभिव्यक्ति की आजादी पर भी पाबंदी लगती है। लेकिन, इसी बहाने से सरकारों ने लोगों के बोलने के अधिकार छीनने की भी कोशिश की है। ऑनलाइन पाबंदी लगाकर लोगों की आवाज दबाना अब सरकारों का शगल बनता जा रहा है।

मार्क जुकरबर्ग ने 6 साल पहले इंटरनेट.ओआरजी (internet.org) लॉन्च किया था। लेकिन, पूरी दुनिया को ऑनलाइन करने का ये ख्वाब अब भी अधूरा है। दुनिया भर की संचार कंपनियां लोगों को डेटा प्लान देने की अनिच्छुक हैं, क्योंकि उन्हें मैसेज और फोन की सुविधाओं से ज्यादा मुनाफा मिल रहा है। 2018 में फेसबुक ने भी सबको इंटरनेट सेवा देने के लिए ड्रोन तैयार करने के अपने प्लान अकीला को बंद कर दिया था।

यानी, अभी दुनिया में अरबों लोग ऐसे हैं, जिनकी पहुंच इंटरनेट तक नहीं है। लेकिन, जब तमाम लोग उन्हें ऑनलाइन लाने की कोशिश कर रहे हैं, तो हमें याद रखना होगा कि हम किस तरह के इंटरनेट का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं।

सिर्फ जोड़ना ही काफी नहीं है। हमें याद रखना होगा कि ये लोगों के लिए फायदे का भी सौदा हो।
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