भारतीय राजनीति में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत जितनी रहस्यपूर्ण रही है, उतने ही रहस्यपूर्ण गुमनामी बाबा रहे हैं। अवध के इलाकों में मशहूर रहा है कि गुमनामी बाबा ही नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे। दोनों के रूप और जीवन की कई अद्भुत समानताओं ने आशंकाओं को पुख्ता भी किया।
हालांकि पिछले दिनों मोदी सरकार, पश्चिम बंगाल सरकार और एक ब्रिटिश वेबसाइट ने सुभाष चंद्र बोस से जुड़े कई दस्तावेज जारी किए। कम से कम उन दस्तावेज ये तय नहीं हो पाया कि सुभाष चंद्र बोस और गुमनामी बाबा एक ही शख्स थे। गुमनामी बाबा 'भगवन जी' के नाम से भी मशहूर रहे। ब्रिटिश वेबसाइट के दस्तावेजों के मुताबिक, सुभाषचंद्र बोस की मौत 18 अगस्त 1945 में एक विमान दुर्घटना में हो गई थी। अब तक प्रचलित भी यही रहा है कि सुभाष चंद्र बोस उसी तारीख को मरे थे।
अगर ब्रिटिश वेबसाइट के दावों और प्रचलित तारीख पर भरोसा कर लिया जाए तो ये सवाल और लाजिम हो जाता है कि आखिर गुमनामी बाबा कौन थे? मंगलवार को उनके बक्सों को खोला गया, जिसमें दूरबीन, टेप रिकॉर्डर, ब्रिटिश टाइपराइटर और चीनी मिट्टी के बर्तन मिले। इन समानों से उनकी जिंदगी के राज फाश हो पाएंगे कि नहीं, ये अभी तय नहीं है? फिलहाल पढ़िए, वो तमाम बातें ,जो गुमनामी बाबा के बारे में कही जाती रही हैं-
फैजाबाद में गुमनामी बाबा ने ली थी अंतिम सांस
सुभाषचंद्र बोस
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गुमनामी बाबा कि कहानी उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शहर फैजाबाद से शुरू होती है। यही वह शहर है जहां गुमनामी बाबा ने अपनी अंतिम सांस ली थी और यहीं पर उनकी समाधि भी है। यह समाधि सरयु नदी के किनारे बनाई गई है जिस पर उनके जन्म की तारीख भी दर्ज है। यह तारीख है 23 जनवरी और इसी दिन नेताजी का भी जन्मदिन मनाया जाता है। कुछ लोगों के मुताबिक 23 जनवरी और दुर्गा पूजा के दिन कुछ खास लोग रात के वक्त उनसे मिलने आया करते थे। हालांकि, वे कौन थे, कहां से आते थे? ये किसी को पता नहीं था।
सुभाषचंद्र बोस और गुमनामी बाबा के एक ही व्यक्ति होने के दावों की शुरुआत इसी तारीख से होती है। हालांकि, इस समाधि पर उनके मृत्यु की तारीख की जगह तीन प्रश्न चिन्ह लगे हुए हैं जबकि गुमनामी बाबा की मृत्यु 16 सितंबर 1985 को हुई थी। इन प्रश्न चिन्हों से उन दावों को और पुष्टि मिलती है जो उन्हें ही नेताजी मानते हैं।
गुमनामी बाबा का असली नाम क्या था यह किसी को नहीं पता लेकिन लोग उन्हें एक दूसरे नाम 'भगवन जी' से भी जानते थे। लोगों का मानना था कि नेताजी ने तत्कालीन सरकार की नजरों से छिपने के लिए एक साधु का वेश बनाकर रहते थे।
कहां से आए गुमनामी बाबा, किसी को पता नहीं
सुभाषचंद्र बोस और महात्मा गांधी
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स्थानीय लोगों के मुताबिक फैजाबाद में गुमनामी बाबा का आगमन 1970 के दशक में हुआ था। शुरुआती दिनों में यह अयोध्या की लालकोठी में बतौर किराएदार रहा करते थे, लेकिन कुछ दिनों के बाद ही वह बस्ती चले गए।
बस्ती में कुछ दिनों रहने के बाद गुमनामी बाबा वापस अयोध्या लौट आए और वापस आने के बाद वह पंडित रामकिशोर पंडा के घर में रहने लगे। कुछ दिनों तक रामकिशोर के घर में रहने के बाद वह अयोध्या संब्जी मंडी के बीचोबीच स्थित 'लखनऊवा हाता' चले आए।
गुमनामी बाबा लखनऊवा हाता में काफी समय तक गुप्त तरीके से रहते थे। इस दौरान उनके साथ उनकी एक सेविका भी रहती थी जिसका नाम सरस्वती देवी था। बाबा उन्हें 'जगदम्बे' के नाम से बुलाया करते थे।
गुप्त तरीके से किया गया गुुमनामी बाबा का अंतिम संस्कार
सुभाषचंद्र बोस
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अपने जीवन के अंतिम समय में बाबा ने लखनऊवा हाता भी छोड़ दिया और फैजाबाद के राम भवन के पीछे बने एक मकान में रहने लगे। यहां पर वह करीब दो सालों तक रहे और इसी मकान में उन्होंने 16 सितंबर 1985 में अंतिम सांस ली। उनकी मृत्यु के पश्चात उनको नजदीक से जानने वालों लोगों ने बेहत ही गुप्त तरीके से सरयु नदी के किनारे उनका अंतिम संस्कार कर दिया।
उनकी मृत्यु के बाद उनसे संबंधित सामानों को जब खंघाला गया तो लोगों की आंखे खुली की खुली रह गई। उनके पास ऐसे सामान थे जो कभी भी एक संन्यासी के पास नहीं हो सकते थे। इसकी पुष्टि गुरुवार को खोले गए उनके बक्सों और उसमें से निकले सामानों से होती है। इन सामानों में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान की कई चीजें शामिल हैं।
उनके बक्से में जर्मन सेना की ओर से जारी किया गया दूरबीन, ब्रिटेन में निर्मित टाईपराइटर और चीनी मिट्टी से बने चाय के बर्तन भी मिले। ये वही सामान हैं जो गुमनामी बाबा की मौत के बाद उनके जानने वालों को मिली थी।
नेताजी से जुड़ी हर खबर थी बाबा के पास
सुभाषचंद्र बोस और हिटलर
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गुमनामी बाबा हमेशा अपने आस-पास एक गोपनीयता का घेरा बनाए रखते हैं। वह कभी भी पर्दे के पीछे से ही किसी से बात किया करते थे। उनके साथ समय बीतने वाले भी कभी उनका चेहरा सामने से नहीं देख पाए। ऐसे बहुत कम ही लोग थे जिन्होंने गुमनामी बात का चेहरा देखा था।
उनके नेताजी होने का शक इसी बात से गहरा जाता था। इसके अलावा गुमनामी बाबा एक संन्यासी होने के बावजूद भी फर्राटेदार अंग्रेजी और जर्मन भाषा बोलना जानते थे। यह उस वक्त का दौर था जब शायद ही कोई बाबा इतना पढ़ा लिखा होता था। ऊपर से दो से दिन विदेशी भाषाओं का ज्ञान होना तो इस बात के पुख्ता सबूत थे कि वही सुभाषचंद्र बोस थे।
इसके अलावा गुमनामी बाबा के पास नेताजी के परिवार से जुड़ी तस्वीरें, कई महत्वपूर्ण चिट्ठियां, कई अहम दस्तावेज और लेख भी मिले। उनके पास से दुनिया की कई जाने माने अखबार, पत्रिकाएं, साहिस्यिक पुस्तकें भी मिलीं। इसमें जो सबसे ज्यादा चौंकाने वाली वस्तु थी वो सिगरेट और शराबें थी। आखिर एक संन्यासी को इसकी क्या जरूरत। इतना ही नहीं यह भी एक बड़ा सवाल था कि आखिर उन्हें ये चीजें पहुंचाता कौन था?
ये बातें भी इसी ओर करती हैं ईशारा
सुभाषचंद्र बोस
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गुमनामी बाबा से जुड़ी ये सभी बातें इस ओर ही ईशारा करती हैं कि वे कोई और नहीं बल्कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस ही थे जो गुप्त रूप से अपना भेष बदलकर एक गुमनाम जिंदगी जी रहे थे। उन्होंने कभी भी लोगों के सामने अपने असलियत नहीं आने दी। उनके पास से मिले सामानों से लोगों ने यह मान लिया कि वही नेताजी थे। हालांकि, किसी भी सरकार ने कभी भी इन दावों की आधिकारिक तौर पर पुष्टि नहीं कि।
उनकी मौत के बाद उनके पास से मिले सामानों को तत्कालीन राज्य सरकार नीलाम कराना चाहती थी लेकिन जब नेताजी के परिवार वालों को इस बात का पता चला तो उन्होंने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जिसके बाद कोर्ट ने 1986-87 में गुमनामी बाबा के सामानों को बक्सों में सील करा दिया। गुमनामी बाबा के सामनों में नेताजी के परिवार की दिलचस्पी भी उनके नेताजी होने की ओर ईशारा करती है।
यह बात यहीं खत्म नहीं हो गई। गुमनामी बाबा की सच्चाई जानने के लिए तीन आयोगों का गठन किया गया। इसमें से शाह नवाज कमिटी, खोसला कमीशन और मुखर्जी कमीशन प्रमुख थे। शाह नवाज और खोसला कमीशन ने तो अपनी जांच रिपोर्टों में यह दावा किया था कि नेताजी की मौत 1945 में हुए विमान दुर्घटना में हो गई थी। लेकिन 1999 में गठित हुए मुखर्जी आयोग के दावा इससे उलट था।
क्या कहा मुखर्जी आयोग ने?
सुभाषचंद्र बोस की अस्थियां
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मुखर्जी आयोग ने 17 मई 2006 में तत्कालीन सरकार के सामने अपना रिपोर्ट पेश किया जिसमें यह दावा किया गया था कि नेताजी की मौत विमान दुर्घटना में नहीं हुई थी। कमीशन के मुताबिक ताइवान और जापानी सरकार ने संयुक्त रूप से नेताजी के मौत की अफवाह उड़ाई थी जिससे कि नेताजी आसानी से बिना किसी के जानकारी के गायब हो सकें।
इतना ही नहीं कमीशन ने यह प्रस्ताव पेश किया था कि जापान के रेनकोजी मंदिर में रखा गया अवशेष भी सुभाषचंद्र बोस का नहीं बल्कि उस वक्त ताइवान ने सेना के एक जवान का है जिसकी 1945 में ही मौत हो गई थी। हालांकि, सरकार ने उनके इन सभी दावों को सिरे से खारिज कर दिया।
मुखर्जी आयोग के दावों के बाद नेताजी सुभाषचंद्र बोस की मौत से जुड़ा रहस्य एक बार फिर रहस्य बनकर ही रह गया और शायद आगे भी ऐसा ही रहेगा।