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A Soldier is Never Off Duty: बच्चों की जान बचाते वक्त विंग कमांडर ने गवाईं थी जान; अब AFT ने सुनाया बड़ा फैसला

Sat, 24 Jan 2026 07:05 PM IST
हिमांशु चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंढीगढ़

सार

एएफटी ने बच्चों को डूबने से बचाते हुए जान गंवाने वाले आईएएफ विंग कमांडर दुर्लभ भट्टाचार्य की मौत को सैन्य सेवा से जुड़ा माना। कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी की रिपोर्ट रद्द करते हुए ट्रिब्यूनल ने उनकी पत्नी को विशेष पारिवारिक पेंशन देने का आदेश दिया। आइए इस पूरे मामले को विस्तार से जानते हैं।
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सेना के अधिकारी। (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : ANI
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विस्तार
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सेना की ड्यूटी क्या सिर्फ वर्दी पहनकर तय समय तक ही होती है या फिर यह हर पल निभाई जाने वाली जिम्मेदारी है। इस सवाल का जवाब सशस्त्र बल न्यायाधिकरण ने अपने एक अहम फैसले में दिया है। ट्रिब्यूनल ने बच्चों को डूबने से बचाते हुए जान गंवाने वाले भारतीय वायुसेना के अधिकारी की मौत को सैन्य सेवा से जुड़ा मानते हुए उनकी पत्नी को विशेष पारिवारिक पेंशन देने का आदेश दिया है।

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चंडीगढ़ स्थित एएफटी की बेंच ने भारतीय वायुसेना के दिवंगत विंग कमांडर दुर्लभ भट्टाचार्य की पत्नी अनुराधा भट्टाचार्य की याचिका स्वीकार कर ली। ट्रिब्यूनल ने कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी की उस रिपोर्ट को रद्द कर दिया, जिसमें अधिकारी की मौत को सैन्य सेवा से संबंधित नहीं माना गया था। इस फैसले के साथ अब परिवार को साधारण नहीं बल्कि विशेष पारिवारिक पेंशन मिलेगी।

कैसे हुई थी विंग कमांडर की मौत?
विंग कमांडर दुर्लभ भट्टाचार्य को दिसंबर 2006 में वायुसेना में कमीशन मिला था। 7 फरवरी 2021 को तमिलनाडु की एमराल्ड झील में पारिवारिक पिकनिक के दौरान कुछ बच्चे डूबने लगे। अधिकारी ने बिना देर किए पानी में छलांग लगाई और एक बच्चे की जान बचाई। इसके बाद वह अपनी बेटी को ढूंढने के लिए दोबारा झील में उतरे, लेकिन इसी दौरान उनकी डूबने से मौत हो गई। पुलिस ने इसे दुर्घटनावश मौत बताया था।
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सेना की ड्यूटी को लेकर ट्रिब्यूनल की सोच

  • ड्यूटी को केवल दफ्तर के समय या तय स्थान तक सीमित नहीं किया जा सकता।
  • वर्दीधारी सेवाओं में हर समय तैयार रहना ड्यूटी का हिस्सा है।
  • किसी की जान बचाना सैन्य सेवा की मूल भावना से जुड़ा है।
  • पिकनिक जैसे अनौपचारिक मौके पर मौजूद होना ड्यूटी से अलग नहीं करता।
  • काम की प्रकृति अहम है, न कि जगह या समय।


क्यों रद्द हुई कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी की रिपोर्ट?
एएफटी ने कहा कि कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी ने ऑन ड्यूटी शब्द की बहुत संकीर्ण व्याख्या की। ट्रिब्यूनल के अनुसार, यह मानना गलत है कि अधिकारी उस समय ड्यूटी पर नहीं थे। सैन्य और आपात सेवाओं में कार्यरत कर्मियों की जिम्मेदारी चौबीसों घंटे होती है। इसलिए बच्चों को बचाने जैसा साहसिक कदम सैन्य सेवा से सीधे जुड़ा है।

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पत्नी की दलील और सरकार का पक्ष
याचिका में अनुराधा भट्टाचार्य ने कहा कि उनके पति छुट्टी पर नहीं थे और हर समय सेवा अनुशासन के दायरे में थे। नागरिकों की जान बचाना सेना के मूल सिद्धांतों में शामिल है। वहीं, सरकारी पक्ष ने तर्क दिया कि दुर्घटनावश डूबने की स्थिति में विशेष पारिवारिक पेंशन का प्रावधान नहीं है। लेकिन ट्रिब्यूनल ने इस दलील को अस्वीकार कर दिया।

यह फैसला सिर्फ एक परिवार को न्याय देने तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य में ऐसे मामलों के लिए मिसाल बनेगा। ट्रिब्यूनल ने साफ कर दिया है कि साहस, कर्तव्य और बलिदान का मूल्य समय और स्थान से तय नहीं होता। यह निर्णय उन सभी वर्दीधारी कर्मियों के सम्मान को मजबूत करता है, जो हर हाल में समाज की रक्षा के लिए तत्पर रहते हैं।

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