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अंतिम क्षणों में इज्जत से मरने का अधिकार दे सकेंगे डॉक्टर, मसौदे पर हो रहा विचार

Tue, 03 Dec 2019 12:39 AM IST
अमित शर्मा अमित शर्मा, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
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आमतौर पर डॉक्टरों की राय होती है कि अगर किसी व्यक्ति को अचानक दिल का दौरा (हार्ट अटैक) पड़ता है तो उसे जितनी जल्दी हो सके, सीपीआर (मरीज की छाती पर विशेष तरीके से जोर-जोर से दबाने की प्रक्रिया) दी जानी चाहिए। इससे व्यक्ति को हार्ट अटैक के कारण मरने से बचाया जा सकता है। किसी स्वस्थ व्यक्ति को अचानक हार्ट अटैक आने पर यह प्रक्रिया उसे बचाने में बहुत कारगर साबित होती है। 

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डॉक्टर अस्पतालों में अपने मरीजों के साथ यह प्रक्रिया बार-बार दुहराते हैं। लेकिन हो सकता है कि डॉक्टर जल्दी ही ‘विशेष’ प्रकार के मरीज के परिवार से इस बात की इजाजत मांगें कि उनके मरीज को सीपीआर न दी जाए। वह भी इसलिए जिससे कि उनका मरीज शांतिपूर्ण तरीके से मर सके। ऐसा केवल उन मामलों में होगा जिनमें मरीज को मेडिकल सेवाओं के जरिये बचाने की कोई गुंजाइश शेष नहीं बचती। 

इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) इस पर अध्ययन कर रहा है और इसके लिए एक रूपरेखा तैयार कर रहा है। अगर विशेषज्ञ इसके पक्ष में हुए तो भविष्य में इसे डॉक्टरों के लिए एक दिशा-निर्देश की तरह जारी किया जा सकता है। इस निर्देश के बाद व्यक्ति का इलाज कर रहे डॉक्टर अपने स्तर पर यह निर्णय ले सकेंगे कि जिस व्यक्ति को बचाना संभव नहीं रह गया है उसको सीपीआर न दी जाए। आईसीएमआर ने इस विषय पर सभी संबंधित लोगों से राय मांगी है। 

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क्यों पड़ी जरूरत

आईसीएमआर से जुड़ी वरिष्ठ डॉक्टर रोली माथुर ने अमर उजाला को बताया कि सामान्य तौर पर अनुभवी डॉक्टर यह समझ जाते हैं कि उनका कोई मरीज अब इलाज के माध्यम से बचाया जा सकता है या नहीं। अगर व्यक्ति को इलाज के द्वारा ठीक किए जाने की संभावनाएं हैं तो अंतिम क्षण तक उसे बचाए जाने की कोशिश की जानी चाहिए। 

लेकिन जिन मरीजों को इलाज के जरिये नहीं बचाया जा सकता, उन्हें कार्डियो पल्मोनरी रिससिटेशन (Cardio-pulmonary Resuscitation या सीपीआर) नहीं दिया जाना चाहिए क्योंकि अब यह उनके लिए लाभकारी नहीं रह जाता है। उलटे इस अवस्था में सीपीआर दिए जाने से उन्हें दर्द होता है और कई मामलों में यह जानलेवा भी साबित हो जाता है। 

ऐसे मरीजों को सीपीआर न दी जाए, इस पर गहराई से विचार किया जा रहा है। विभिन्न विशेषज्ञ इस पर अपनी राय रख रहे हैं। इस मामले में कानूनी और धार्मिक पहलू भी हैं जिन पर विचार किए जाने की आवश्यकता है। सभी पक्षों की राय आ जाने के बाद इस पर एक मसौदा तैयार किया जा सकता है जिसे चिकित्सकों के लिए जारी किया जाएगा। 
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सीपीआर से क्या नुकसान

इज्जत के साथ जीना किसी मनुष्य का मौलिक अधिकार होता है। डॉक्टरों का कहना है कि ठीक उसी तरह इज्जत के साथ मरना भी किसी व्यक्ति का अधिकार होता है। अगर यह स्पष्ट हो गया है कि किसी व्यक्ति को मेडिकल ट्रीटमेंट देकर बचाया नहीं जा सकता तो उसे इज्जत के साथ मरने का अधिकार दिया जाना चाहिए। डॉक्टरों के मुताबिक, अंतिम क्षणों में सीपीआर देना व्यक्ति के लिए तकलीफदेह होने के साथ-साथ जानलेवा भी साबित हो सकता है। 

डॉक्टरों की राय अलग-अलग

हालांकि इस क्षेत्र में कार्य कर रहे बहुत से वैज्ञानिक डॉक्टरों की राय इस सोच से अलग भी है। डॉक्टर सुमित खरे के मुताबिक एक डॉक्टर होने के नाते किसी व्यक्ति को अंतिम क्षण तक बचाए जाने की कोशिश की जानी चाहिए। अगर डॉक्टरों को सीपीआर रोकने की अनुमति दे दी जाती है तो इसके ‘मिसयूज’ होने की भी संभावनाएं बढ़ जाती हैं जिसको रोकने के लिए कोई उपाय निश्चित कर पाना बेहद कठिन होगा।

दूसरे, कभी-कभी मरीज के इलाज में आने वाले खर्च या परेशानी या किन्हीं अन्य कारणों से परिवार के लोग भी मरीज से छुटकारा पाना चाहते हैं। ऐसी परिस्थितियों में इसका दुरुपयोग किया जा सकता है। सीपीआर रोकने का अधिकार केवल इलाज कर रहे डॉक्टर के विवेक पर निर्भर करेगा। 

उसकी एक गलती किसी व्यक्ति के लिए जानलेवा साबित हो सकती है। ऐसे में डॉक्टर की राय को भी क्रॉस चेक करने का प्रावधान सुनिश्चित किया जाना चाहिए। इसलिए इन तमाम पहलुओं पर विचार करने के बाद ही सीपीआर रोकने सम्बंधी नियम बनाया जाना चाहिए। 
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