तब अरविंद जी की उमर छियासठ साल थी। वो कितनीअच्छी बात लिखते हैं - "शब्द चलते हैं, शब्द चलाते हैं, शब्द यात्री हैं, शब्द यायावर हैं, वे विस्मृत हो जाते हैं तो कई बार खो जाते हैं, वे स्वयं बदल जाते हैं या उनका अर्थ। नए विचारों, नई जीवन शैलियों, नए अनुसंधानों और परिवर्तनों के कारण भी नई शब्दावली बनती है। प्रत्येक शताब्दी के साथ एक नई भाषा का जन्म होता है , नए नए शब्दों से हमारा परिचय बढ़ता है- तभी थिसारस आवश्यक होता है", आयु के इसी पड़ाव पर उन्होंने कंप्युटर सीखा।
आज दुनिया भर में बिखरे करोड़ों हिंदी प्रेमी अरविंद जी को हिंदी के महान साधक के रूप में सम्मान से देखते हैं। उन्हें राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन के स्मृति दिवस पर हिंदी भवन में हिंदी रत्न का सम्मान दिया गया तो लगा- यह सम्मान का सम्मान है।
सम्मान समारोह में त्रिलोकी नाथ चतुर्वेदी, राजर्षि के पौत्र डॉक्टर अशोक टंडन, जाने माने कवि गोविंद व्यास, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्यातिप्राप्त वन्य प्राणी वृतचित्र निर्माता माइक पांडे, लोकप्रिय कवि लक्ष्मीशंकर वाजपेयी, रचनाकार ममता किरण, अरविंद जी की बेटी मीतालाल तथा मुझ जैसे अनेक हिंदी प्रेमी उपस्थित थे।
माइक पांडे इन दिनों अरविंद जी के कृतित्व पर फ़िल्म बना रहे हैं। एक ज़माने में दूरदर्शन के पर्दे को ख़बर पढ़ते हुए गरिमा से भर देने वाली सरला माहेश्वरी ने कार्यक्रम का संचालन किया ।