क्या आज की पीढ़ी हरफनमौला बनने के चक्कर में कुछ नहीं बन पाएगी? माता पिता की अपेक्षाओं के बोझ तले दबे बचपन के बीच यह सवाल आज ज्यादा मौजूं हो जाता है। स्कूल जाने के साथ ही मां बाप की अपेक्षाएं भी बच्चे के साथ बड़ी होने लगती हैं।
वह स्कूल से घर लौटता है तो उसे ट्यूशन के लिए भेज दिया जाता है। वहां से घर वापसी होती है तो फिर कम्प्यूटर क्लास, डांस क्लास, कराटे क्लास, एक्स्ट्रा करकुलर एक्टिविटीज में उसे बिजी कर दिया जाता है ताकि इधर उधर दिमाग लगाने के बजाय कुछ 'अच्छी चीजें' सीख सके।
वर्तमान पीढ़ी में पैदा होने वाले बच्चों पर पहले के मुकाबले माता पिता की अपेक्षाओं का बोझ ज्यादा होता है, और इन्हीं अपेक्षाओं के बीच उस पर दबाव रहता है हरफनमौला बनने का। एक ऐसा आलराउंडर जो पढ़ाई में टॉप करने के अलावा खेलों और अन्य इम्तिहानों में भी अव्वल रहे।
मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि इसका सीधा असर बच्चे के दिमाग और उसकी क्षमताओं पर पड़ता है। हालांकि नैसर्गिक प्रतिभा वाले बच्चे इन चीजों में बाजी मारने में सफल रहते हैं लेकिन औसत प्रतिभा वाला बच्चा अक्सर इस रेस में पिछड़ जाता है।
हालांकि यह दबाव सिर्फ अभिभावकों का ही नहीं है, वर्तमान की भागमभाग वाली लाइफस्टाइल में युवा पीढ़ी खुद भी सभी चीजों में अव्वल रहने की होड़ में शामिल हो गई है। उसे लगता है कि अगर वह अपने साथी के मुकाबले पिछड़ गया तो इस रेस में काफी पीछे रह जाएगा।
नतीजा ये होता है कि वह किसी भी चीज पर सही से ध्यान नहीं दे पाता और हर मुकाबले में पीछे छूट जाता है। ऐसे में जरूरी है कि अब सही चीजों पर फोकस करके आगे बढ़ें।