मानवाधिकार कार्यकर्ता इरोम शर्मिला की पार्टी पीपल्स रिसर्जेंस एंड जस्टिस एलायंस (प्रजा) ने वाबगाई विधानसभा सीट से 44 साल की नाजीमा बीबी को अपना उम्मीदवार बनाया है। मैतेई पंगल (मणिपुरी मुस्लिम) समुदाय के कुछ मौलवी नाजीमा बीबी के चुनाव में खड़े होने से बेहद नाराज हैं।
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इन मौलवियों ने हाल ही में एक धमकी (फतवा) जारी करते हुए कहा है कि वे नाजीमा को मरने के बाद गांव में 'कब्र' के लिए जमीन नहीं देंगे। पर ये मौलवी इस फरमान को जारी करने का न कोई कारण बताते हैं और न ही इस विषय को लेकर सामने आना चाहते हैं। ऐसा माना जा रहा है कि नाजीमा बीबी का 'प्रजा' के टिकट पर चुनाव में उतरना इन मौलवियों को नागवार गुजरा है।
थौबल जिले की संथैल गांव की रहने वाली नाजीमा ने बीबीसी से कहा, "मैं एक औरत हूं, इसलिए विरोधियों ने मुझे गांव में दरकिनार कर दिया है।" वहीं, मणिपुर के सबसे पुराने मदरसे आलिया के प्रमुख और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य मोहम्मद नूरूद्दीन कासमी ने बीबीसी से कहा कि राजनीति और शरीयत में बहुत फर्क है।
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मुसलमान औरतों को पर्दे के अंदर रहना चाहिए। अगर वे (नाजीमा) पर्दे में नहीं हैं तो मुसलमान नहीं हैं। अगर किसी ने उसे खलीफा बनाया है तो यह कौम की बर्बादी का हुक्म दिया है।
धमकी का नहीं है डर
- फोटो : BBC
कासमी कहते हैं, "जिस कौम ने किसी औरत को उनका सरदार (नेता) बनाया है या फिर राजनीति में खलीफा बनाया तो यह उस कौम की बर्बादी का हुक्म है। मुस्लिम महिला का राजनीति में आना कहीं से भी ठीक नहीं है। इस्लाम में इसकी मनाही है।"
'कब्र' के लिए जमीन नहीं देने की धमकी को लेकर कासमी कहते है कि मौलवियों को ऐसी बात नहीं करनी चाहिए। वे महिला को राजनीति में नहीं जाने की बात समझा सकते हैं। अगर किसी को वोट नहीं देना है तो न दें। लेकिन किसी को धमकी देना या किसी के खिलाफ फतवा जारी करना ठीक नहीं है।" लेकिन नाजीमा ऐसी धमकियों से विचलित नहीं हैं। क्षेत्र में काफी लोग उनका समर्थन कर रहें हैं। 'कब्र' के लिए जमीन नहीं दिए जाने की बात पर वे कहती हैं कि इस तरह की धमकी से डर कर अपना काम बंद नहीं कर सकतीं।
मौलवियों की धमकी के बाद नाजीमा ने पार्टी नेता इरोम शर्मिला के साथ हाल ही में प्रदेश की राज्यपाल नजमा हेपतुल्ला से मुलाकात की हैं। राज्यपाल ने नाजीमा को लिखित शिकायत करने का सुझाव दिया है, ताकि जरूरी कार्रवाई की जा सके। फिलहाल नाजीमा अपने विधानसभा क्षेत्र में लगातार चुनाव प्रचार कर रही हैं। इरोम उनके साथ घर-घर जाकर बदलाव के लिए वोट मांग रही हैं।
नाजीमा कहती है कि साल 2006 में मौलवियों ने लाउडस्पीकर से ऐलान कर महिलाओं के तमाम स्वयं सहायता समूहों पर मजहबी वजहों से प्रतिबंध लगा दिया था। नाजीमा महिलाओं को आर्थिक तौर पर आगे बढ़ने के लिए घर से बाहर निकलने के लिए कहती थी, लेकिन मौलवियों के मुताबिक यह 'औरतों की बर्बादी' थी।
महिलाओं की मदद का इरादा
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ऐसी चेतावनी के बाद भी नाजीमा ने अपना काम कैसे जारी रखा, यह पूछने पर वे कहती है, "हमारे गांव में लोग बेहद गरीब हैं। अधिक से अधिक महिलाएं मेरे पास मदद के लिए आती थी। लिहाजा मैं इन महिलाओं की मदद किए बगैर कैसे रह सकती थी।" लेकिन कुछ दिन बाद कट्टरपंथियों ने एक फतवा जारी कर गांव वालों को नाजीमा और उसके परिवार का बहिष्कार करने को कहा। नाजीमा कहती हैं कि शुरू में इन बातों को लेकर वे बहुत गंभीर नही थीं। लेकिन जब स्थानीय दुकानदार ने उनके बेटे को सामान देने से मना कर दिया, तब उन्हें समझ आया कि लोग सही में उनका बहिष्कार कर रहे हैं।
गांव में समुदाय के लिए बने तालाब से पानी लेने पर रोक लगा दी गई। नाजीमा के पति को भी पीटा गया और जान से मारने की धमकी दी गई। मणिपुर जमात-उल उलेमा, यूनाइटेड मणिपुर मुस्लिम वीमेन डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन और आल मणिपुर मुस्लिम स्टूडेंट्स ऑर्गेनाइजेशन के हस्तक्षेप करने पर नाजीमा पर लगा बहिष्कार वापस लिया गया।
वे कहती हैं, "मैं मौलवियों के खिलाफ नहीं हूं। वे इस्लाम का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और मैं उनकी इज्जत करती हूं।" नाजीमा आगे जोड़ती हैं, "मैं सिर्फ महिलाओं की मदद करना चाहती हूं जो संकट में हैं। ऐसी महिलाओं को आर्थिक रूप से आगे बढ़ाना और उनका विकास करना किसी भी तरह से इस्लाम के खिलाफ नहीं हो सकता।" वे कहती हैं कि अल्पसंख्यक समुदाय में महिलाओं को अपने रोजमर्रा के जीवन में ऐसी कई बाधाओं का सामना करना पड़ता हैं।
यहां तो साइकिल चलाने को लेकर भी लोगों की बुरी बातें सुननी पड़ती हैं। दरअसल महिला सशक्तीकरण के लिए गांव-गांव घूमने वाली नाजीमा के परिवहन का एक मात्र साधन साइकिल ही है।
'साइकिल चलाने पर भी है पाबंदी'
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महिलाओं के साइकिल चलाने की बात पर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य कासमी कहते है कि खुलेआम लड़कियों का साइकिल चलाना सही नहीं है। पर्दे में रहकर ही सारे काम करने चाहिए। इरोम शर्मिला की पार्टी की मीडिया प्रबंधक गीतिका सेहमे कहती हैं कि साल 2001 से नाजीमा मणिपुर के गांवों में महिला अधिकारों के लिए काम कर रही हैं।
गीतिका बताती है कि नाजीमा अपने परिवार की अकेली महिला हैं, जिन्होंने 10 वीं का इम्तिहान पास किया है। वो अपनी क्लास में एकमात्र लड़की थी जिसके कारण कई बार उन्हें स्कूल में ताने और उत्पीड़न झेलना पड़ा था। गीतिका कहती हैं कि हाई स्कूल पास करने के तुरंत बाद परिवार के लोग नाजीमा की जबरन शादी करवाने वाले थे। इस तरह की जबरदस्ती से बचने के लिए नाजीमा ने अपनी मर्जी से एक ऐसे व्यक्ति के साथ शादी कर ली जिससे वह महज दो ही बार मिली थी। यह शादी केवल छह महीने ही चली।
तलाक के बाद नाजीमा को इस बात का अहसास हुआ कि आत्मनिर्भरता और आर्थिक स्वतंत्रता के बगैर समाज में महिलाएं बेहद कमजोर होती हैं।
मणिपुर विधानसभा की कुल 60 सीटों में से वाबगाई और लिलोंग सीट का फैसला मुस्लिम मतदाता करते हैं। इसके अलावा दो और सीटों पर मुस्लिम वोट निर्णायक हैं। मणिपुर की राजनीति में मैतेई मुस्लिम की हमेशा अहमियत रही हैं। प्रदेश की करीब 30 लाख आबादी में दो लाख से अधिक मैतेई मुस्लिम हैं।
प्रदेश की राजनीति में मैतेई मुस्लिम के योगदान का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 1972 में मणिपुर को राज्य का दर्जा मिलने के बाद पहले मुख्यमंत्री मोहम्मद अलीमुद्दीन बने थे। पिछले विधानसभा चुनाव में तीन मैतेई मुस्लिम कांग्रेस की टिकट पर जीत कर विधानसभा पहुंचे थे। लिहाजा इरोम की पार्टी ने नाजीमा को पहली मैतेई पंगल महिला उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतारा है।
मणिपुर में 4 और 8 मार्च को दो चरणों में होने वाले विधानसभा चुनाव में इरोम शर्मिला की पार्टी 'प्रजा' ने पांच उम्मीदवार मैदान में उतारे है।