डीएनडी फ्लाई ओवर ब्रिज सात फरवरी 2001 को बनकर तैयार हुआ और आम आदमी के उपयोग के लिए खोला गया। तब से करीब 15 वर्षों से कंपनी लगातार टोल टैक्स की वसूली कर रही है। याचिका में इस बात पर आपत्ति जताई गई है कि फ्लाई ओवर पर पिछले 15 वर्षों से टोल टैक्स की वसूली की जा रही है। जबकि निर्माण की लागत वसूली जा चुकी है।
प्रोजेक्ट की कुल लागत 407. 64 करोड़ रुपये थी। इसे टोल टैक्स के जरिए वसूला जाना था। करार के मुताबिक कंपनी लागत के साथ ही प्रोमोटर का मुनाफा, ब्याज और डेवलपमेंट चार्ज भी वसूलने की हकदार थी। इस गणना से ब्रिज शुरू होने के पांच साल बाद ही इसकी कीमत बढ़कर 953 करोड़ रुपये पहुंच गई। तथा 31 मार्च 2012 तक लागत कीमत बढ़कर 2339. 07 करोड़ रुपये हो गई। 30 वर्षों की कुल वसूली अवधि में इस लागत के 53000 करोड़ रुपये पहुंचने का अनुमान लगाया गया। करार के मुताबिक यदि कंपनी यह रकम निर्धारित 30 वर्ष की अवधि में न वसूल पाती तो नोएडा अथॉरिटी को इसका भुगतान करना होता।
कोर्ट ने इस संविदा को अवैधानिक और शर्तों के विपरीत करार दिया है। नोएडा टोल ब्रिज कंपनी का कहना है कि उसका नोएडा अथॉरिटी से करार हुआ है। यदि करार रद्द होता है तो प्रमोटर को काफी नुकसान होगा। लागत मूल्य बढ़कर पांच हजार करोड़ पहुंच चुका है। कोर्ट का कहना था बिना विज्ञापन के कंपनी को वसूली का ठेका मिला है। संविदा के आधार पर अनिश्चितकाल तक के लिए जनता से वसूली की इजाजत नहीं दी जा सकती है।