दीप पर्व को उत्सवों का मुकुट कहा जा सकता है। यह केवल दीप जलाने का पर्व नहीं, बल्कि अंधकार पर प्रकाश, अज्ञान पर ज्ञान और अधर्म पर धर्म की विजय का संदेश है। प्रेम, करुणा, त्याग और लोककल्याण के इन आदर्शों के केंद्र में हैं- राम।
राम हमारे भीतर का वह प्रकाश हैं, जो निराशा में आशा, भ्रम में विवेक और कठिन परिस्थितियों में कर्तव्यबोध जगाता है। पुत्र, भाई, पति, मित्र और राजा के रूप में उनका जीवन त्याग, प्रेम, पराक्रम और मर्यादा की शिक्षा देता है। तुलसीदास ने कहा है-
“सियाराममय सब जग जानी। करउं प्रणाम जोरि जुग पानी।।”
रामायण के सातों कांड जीवन की आंतरिक यात्रा के प्रतीक हैं।
बालकांड निर्मलता, अयोध्याकांड त्याग, अरण्यकांड संघर्ष, सुंदरकांड साहस और युद्धकांड अधर्म के विरुद्ध खड़े होने की प्रेरणा देता है। राम की वनयात्रा भी हमारे अंतर्मन के संघर्षों का रूपक है। स्वर्णमृग जैसे प्रलोभन विवेक भटकाते हैं और रावण जैसी प्रवृत्तियां अहंकार का प्रतीक बनती हैं।
वाल्मीकि रामायण में राम को धर्म का साकार स्वरूप कहा गया है-
“रामो विग्रहवान् धर्मः।” उनका जीवन सिखाता है कि विजय से अधिक महत्वपूर्ण विजय का मार्ग है। रामराज्य भी इसी आदर्श की कल्पना है, जहां न्याय, समता, करुणा और लोककल्याण सर्वोपरि हों।
दीपावली पर घरों के साथ अंतर्मन को भी प्रकाशित करें। उपनिषद का संदेश है-
“तमसो मा ज्योतिर्गमय।” अर्थात अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। राम को केवल मंदिरों में नहीं, अपने आचरण में खोजें। उनके आदर्शों को जीवन में उतारना ही दीपावली का सच्चा प्रकाश है।